सावन का मृदु हास
शाख शाख बंधा हिण्डोला
ऋतु का तन भी खिला-खिला।
रंग बिरंगी लगे कामिनी
बनी ठनी सी चमक रही
परिहास हास में डोल रही
खुशियाँ आनन दमक रही
डोरी थामें चहक रही है
सारी सखियाँ हाथ मिला।।
रेशम रज्जू फूल बँधे हैं
मन पर छाई तरुणाई
आँखे चपला सी चपल बनी
गाल लाज की अरुणाई
मीठे स्वर में कजरी गाती
कण-कण को ही गयी जिला।।
मेघ घुमड़ते नाच रहे हैं
मूंगा पायल झनक रही
सरस धार से पानी बरसा
रिमझिम बूँदें छनक रही
ऐसे मधुरिम क्षण जीवन को
सुधा घूंट ही गयी पिला ।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






