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Friday, 13 September 2019

हिंदी दिवस

आज हिंदी दिवस पर विशेष ।

हिंदी तो बस हिंदी, हिंदी सम बस हिंदी,
देवनागरी , देवताओं द्वारा रचित
सुंदर अक्षर माला,
सरल, सरस, शाश्वत
विश्व की किसी भाषा में नही
गुणवत्ता हिंदी  सम ,
अलंकार और उपमा,
सांगोपांग शब्दकोश
खोजने से भी ना मिले कहीं,
इतनी  विराट, अनंत, गहराई समेटे ,
किसी और भाषा के लिये
है कल्पनातीत।
हिंदी  तो बस  हिंदी ।

कुसुम कोठारी।

Wednesday, 11 September 2019

नंदन कानन

नंदन कानन

नंदन कानन महका आज मन में
श्वेत पारिजात महके तन मन में ।
फूल कुसमित,सुरभित चहुँ दिशाएं
द्रुम  दल  शोभित वन उर,  मन में ।
मलय सुगंधित  उडी पवन संग ,
देख घटा, पादप विहंसे निज मन में ।
कमल कुमुदिनी हर्षित हो सरसे ,
धरा हरित चुनर ओढ़, मुदित है मन में।
जल प्रागंण निज रूप संवारे लतिका,
निरखी निरखी लजावे मन में ।
कंचन जैसो नीर सर  सरसत
आज सखी नव राग है मन में ।

         कुसुम  कोठारी।

Saturday, 7 September 2019

हौसले की पतवार

हौसले की पतवार

जो फूलों सी ज़िंदगी जीते कांटे हज़ार लिये बैठे हैं,
दिल में फ़रेब और होंठों पर झूठी मुस्कान लिये बैठें हैं।

खुला आसमां ऊपर,ख्वाबों के महल लिये बैठें हैं
कुछ, टूटते अरमानों का ताजमहल लिये  बैठें  हैं।

सफेद  दामन वाले भी दिल दाग़दार  लिये बैठे हैं
क्या लें दर्द किसी का कोई अपने हज़ार लिये बैठें हैं।

हंसते  हुए चहरे वाले दिल लहुलुहान लिये बैठे हैं
एक भी ज़वाब नही, सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं।

टुटी कश्ती वाले हौसलों  की पतवार  लिये बैठे हैं
डूबने से डरने वाले  साहिल पर नाव  लिये बैठे हैं।

                  कुसुम  कोठारी।

Friday, 6 September 2019

मन काला तो क्या....व्यंग

मन काला तो क्या....व्यंग।

मन काला तो क्या हुवा उजला है परिधान,
ऊपर से सब ठीक रख अंदर काली खान ।

बालों को खूब संवार दे अंदर जूं का ढेर,
ऊपर  से  रख  दोस्ती मन  में चाहे  बैर ।

बलवानों की कर खुशामद और जी हजूरी ,
कमज़ोरों पर रौब झाड़ रख थोड़ी सी दूरी।

बात बनती जहां दिखे बना गर्दभ जी को बाप,
जहां नहीं निज कारज सरे अपना रस्ता नाप।

मौके का जो  लाभ उठाते वो ही बुद्धिमान ,
अपना कह सब हथियाले न वस्तु पराई मान ।

कुसुम कोठारी।

Saturday, 31 August 2019

शब्दों में ढल जाना~ओ मेरी कविता

ओ मेरी कविता कहां तिरोहित हुई तुम ,
अंतर से निकल शल्यकी में ढलती नहीं क्यूं,
हे भाव गंगे मेरी , सुरंग पावस ऋतु छाई
पावन सलिल बन फिर छलकती नहीं क्यूं ।

क्यों मन सीपिज अवली में गूंथते नहीं ,
क्यों शशि अब सोमरस बरसाता नहीं ,
चंचल किरणें भी मन आंगन उतरती नही ,
कलियां चटकती नहीं, प्रसून खिलते नही ।

मधुबन क्यों है रिक्त सुधा ,बोध पनघट सूना,
हवा में  संगीत नहीं, मां की लोरी अंतर्धान ,
भौंरे तितली सब गये ना जाने कौन दिसावर,
घटाएं बरसती नहीं, कोयल पपीहा मूक सभी ।

नंदन वन की वो भीनी-भीनी मतवाली सौरभ ,
बन मधु स्मृति सी मन मंजुषा में क्यों कैद हुई,
वर्णपट अब सजते नहीं जा काव्य क्षितिज,
पायल भी नीरव ,ओस निरीह ,पाखी उदास ।

मेरे भावों की सहचरी क्यों मूक बने बैठी हो,
आजाओ खोल पटल छलका दो काव्य सरस ,
ओ मेरी कविता, मुझसे विमुख न  होना तुम ,
मेरे गीतों में ढल जाना बन नए बोल नव धुन ।

           कुसुम कोठारी।

दुल्हन का रूप

दुल्हन का रूप

झुमर झनकार, कंगन खनका
जब राग मिला मन से मन का,
मोती डोला, बोली माला बल खाके  ,
अब सजन घर जाना गोरी शरमा के ,
चमकी बिंदिया ,खनकी पायल
पिया का दिल हुवा अब घायल ,
नयनों की यह  "काजल "रेखा
मुड़-मुड़ झुकी नजर से देखा ,
नाक की नथनी डोली ,
मन की खिडकी खोली, 
ओढ़ी चुनरिया धानी-लाल
बदल गई दुल्हन की चाल,
कैसा समय होता शादी का
रूप निखरता हर बाला का ।

         कुसुम कोठारी ।

Thursday, 29 August 2019

चाॉ॓द कटोरा

.          चांद कटोरा

चंचल किरणें  शशि की
झांक रही थी पत्तियों से ,
उतर आई अब मेरे आंगन ,
जी करता इनसे अंजलि भर लूं
या  फिर थाली भर-भर रख लूं ,
सजाऊं घर अपना इन रजत रश्मियों से ,
ये विश्व सजाती ,मन को भाती
धरा पे बिखरी - बिखरी जाती
खेतों, खलिहानों ,पनघट , राहें ,
दोराहे , छत , छज्जे ,पेड़, पौधे
वन-उपवन डोलती फिरती
ये चपल चंद्रिकाऐं बस अंधेरों से खेलती ,
पूर्व में लाली फैलने से पहले 
लौट जाती अपने चॅ॔दा के पास
सिमटती एक कटोरे में चाॅ॔द कटोरे में ।

             कुसुम कोठारी ।