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Saturday, 13 January 2024

सूरज की संक्रांति


 मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।


रवि ने ओढ़ी आज रजाई

मुंह ढाप कर सोए।

कितने दिवस बाद कश्यप सुत

सुख सपने में खोए।


पोष मास में सूर्य देव जब

मकर राशि में आते

सरिता में नाहन होता है

पर्व मनाए जाते

त्याग शीत का भय भक्तों ने

पाप गंग में धोए।।


ठंडी ठंडी चले हवाएं

पादप पात गिराते

गुड़  तिल के मिष्ठान अनूठे

सभी चाव से खाते

तभी ठंड फिर करवट लेती

गंगा चीर भिगोए।


दान स्नान का लाभ कमाए

आस्था सह नर नारी

अलग-अलग प्रांतों में मनता

मेले लगते भारी

पुण्य मिले संक्रांति काल में

शुभ दाने जो बोए।


किया अगर शुचिता परिवर्तन 

फिर क्यों भव-भव रोए।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 12 January 2024

युवा दिवस


 राष्ट्रीय युवा दिवस पर समस्त युवा शक्ति को हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹

युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद जी की शिक्षाएं 


उठो युवाओं नींद से, बढ़ो चलो हो दक्ष।

जब तक पूरा कार्य हो, लगे रहो प्रत्यक्ष।।


जीवन में संयम रखो, रखो ध्यान पर ध्यान।

दृष्टि रखो बस चित्त पर, तभी बढ़ेगा ज्ञान।।


अनुभव जग में श्रेष्ठ है, यही शिक्षक महान।

अनुभव से सब सीख लो, यहीं दिलाता मान।।


उद्यम धैर्य पवित्रता, तीन गुणों को धार।

जग में हो सम्मान भी, यही आचरण सार।।


निज पर हो विश्वास तो, पूरण होते काम।

निज पर निज अवलंब ही, कार्य सरे अविराम।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 3 January 2024

मदी जा रही निशा

गीतिका:मदी जा रही निशा


लहर आ करे खेल तट पर उछल कर।

कभी सिंधु हिय में बसे फिर मचल कर।।


हवा कर रही क्यों यहाँ छेड़खानी।

लगे आ रही अब दिशाएँ बदल कर।।


बजे रागिनी ये मधुर वृक्ष डोले।

सरस गा रहा है पपीहा बहल कर।।


धरा पर नमी है उधर चा़ँद भीगा।

झटक वो गिरी चाँदनी भी सँभल कर।।


किरण सो रही है लता पर पसर अब।

मदी जा रही है निशा भी खजल कर।।


गगन आँगने में चमक जो बिखेरे‌

कई एक तारे जगे हैं पटल कर।।


स्वरचित 

कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Tuesday, 19 December 2023

स्वार्थी मतियाँ

स्वार्थी मतियाँ


पौढ़ शिखर के तुंग 

खरी थी पावन निर्मला

सिंधु से मिली गंग

बनी खारी सकल अमला


गोद भरा अब गाद

हमारी मूढ़ मतियों ने

सदा किया था गर्व

अनोखी वीर सतियों ने

बन बहती वरदान

कभी था रूप भी उजला।।


मनुज बड़ा ही ठूंठ 

पहनकर स्वार्थ की पट्टी

खेले भारी खेल

उथलकर काल की घट्टी

दलदल बनाता और

निशाना भी बने पहला।।


गहरे हैं अवगाह

भयानक आपदा होगी

होंगे सकल अनिष्ट 

निरपराधी भुगत भोगी

पिघल रहे मुख ज्वाल

पत्थर हृदय नहीं दहला।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Thursday, 30 November 2023

सूरज के बदलते रूप


 सूरज के बदलते रूप (सवैया छंद)


यामा जब आँचल नील धरे, सविता जलधाम समाकर सोता।

आँखे फिर खोल विहान हुई, हर मौसम रूप पृथक्कृत होता।

गर्मी तपता दृग खोल बड़े, पर ठंड लगे तन दे सब न्योता। 

वर्षा ऋतु में नभ मेघ घने, तब देह जली अपनी फिर धोता।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 16 November 2023

कुछ जो शाश्वत है

कुछ जो शाश्वत है 

खार ही खार हो अनंत सागर के अपरिमित अंबू में।
मोती हृदय में धारण करके शीपियाँ तो मुस्कुराएँगी।

तुषार पिघले कितना भी धीरे मौनी साधक सा चाहे।
अचल की कंकरियाँ तो सोत संग सुरीले गीत गाएँगी।

चाहे साँझ सुरमई सी चादर बिछा दे विश्व आँगन पर।
तम की यही राहें उषा के सिंदूरी आँचल तक जाएँगी।

भग्न हृदय की भग्न भीती पर उग आई जो कोंपलें।
जूनी खुशियों के चिर परिचित गीत तो गुनगुनाएँगी।

नाव टूटी ही सही किनारे बंधी हो चाहे निष्प्राण सी।
फिर भी सरि की चंचल लहरें तो आकर टकराएँगी।

दीप है तेल और बाती भी पर प्रकाश नहीं दिखता।
जलती अंगारी ढूंढ लो जो बातियों में जीवन लाएँगी।

स्वरचित
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'
 

Wednesday, 8 November 2023

दुर्दिन

दुर्दिन


काले बादल निशि दिन छाये

चाबुक बरसाता काल खड़ा।

सूखी बगिया तृण तृण बिखरी

आशाओं का फूल झड़ा।।


चूल्हा सिसका कितनी रातें

उदर जले दावानल धूरा

राख ठँडी हो कंबल माँगे

सूखी लकड़ी तन तम्बूरा

अंबक चिर निद्रा को ढूंढ़े

धूसर वसना कंकाल जड़ा।।


पोषण पर दुर्भिक्ष घिरा है

खंखर काया खुडखुड़ ड़ोले

बंद होती एकतारा श्वांसे 

भूखी दितिजा मुंँह है खोले

निर्धन से आँसू चीत्कारे

फिर देखा हर्ष अकाल पड़ा।।


आर्द्र विहिन सूखा तन पिंजर

घोर निराशा आँखे खाली

लाचारी की बगिया लहके

भग्न भाग्य की फूटी थाली

अहो विधाता कैसा खेला

पके बिना ही फल शाख सड़ा।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'