चंग मृदंग ढ़ोल ढमकत चंहू और
फाल्गुन आयो मास सतरंगी
श्वास श्वास चंदन विलसत
नयनों मे केसर घुलत सुरंगी
ऋतु गुलाब आई, मन भाई
धानी चुनरी ओढ सखी चल
होरी खेलन की मन आई
अंबर गुलाल छायो चहूं और
तन मन भीगत जाए
आली मिल फाग रस गाऐं
होली मनाऐं ।
कुसुम कोठारी ।
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Wednesday, 28 February 2018
मास सतरंगी
ना खेरूं होली
ना खेरूं होली तोरे संग
सावंरीया
बिन खेले
तोरे रंग रची मै
कुछू नाही
मुझ मे अब मेरो
किस विधि
च्ढ्यो रंग छुडाऊ
तूं कैसो रंगरेज
ओ कान्हा
कौन देश को
रंग मंगायो
बिन डारे मै
हुई कसुम्बी
तन मन सारो ही
रंग ड़ारयो
ना खेरूं होरी तोरे संग
सांवरिया।
कुसुम कोठारी ।
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