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Thursday, 26 March 2020

क्लांत पथिक

क्लांत पथिक

क्लांत हो कर पथिक बैठा
नाव खड़ी मझधारे ।
लहर चंचल आस घायल
किस विध पार उतारे।

अर्क नील कुँड से निकला
पंख विहग नभ खोले
मीन विचलित जोगिणी सी
तृषित सिंधु में डोले।
क्या उस घर लेकर जाए
भ्रमित घुमी घट खारे।
क्लांत हो कर पथिक बैठा
नाव खड़ी मझधारे।।

डाँग डगमग चाल मंथर
घटा मेघ मंडित है।
हृदय बीन जरजर टूटी
साज सभी खंडित है ।
श्रृंग दुर्गम राह रोके
साथ न कोई सहारे।
क्लांत हो कर पथिक बैठा
नाव खड़ी मझधारे।।

खंडित बीणा स्वर टूटा
राग सरस कब गाया
भांड मृदा भरभर काया
ठेस लगे बिखराया ।
मूक हो गया मन सागर
शब्द लुप्त है सारे।
क्लांत हो कर पथिक बैठा
नाव खड़ी मझधारे।।

कुसुम कोठारी।

Wednesday, 25 March 2020

श्वास रहित है तन पिंजर

गीत।
श्वास रहित है तन पिंजर

तड़प मीन की मन मेरे
श्याम नही अंतर जाने
गोकुल छोड़़ जावन कहे
बात नेह की कब माने।

अमर लतिका स्नेह लिपटी
छिटक दूर क्यों कर जाए।
बिना मूल मैं तरु पसरी
जान कहां फिर बच पाए।

श्वास रहित है तन पिंजर
साथ सखी देती ताने।
तड़प मीन की मन मेरे
श्याम नही अंतर जाने ।।

बिना चाँद चातक तरसे
रात रात जगता रहता
टूट टूट मन इक तारा
सिसक सिसक आहें भरता।

कौन सुने खर जग सारा।
बात बात देता ताने।
तड़प मीन की मन मेरे
श्याम नही अंतर जाने ।।

कुसुम कोठारी।

Sunday, 22 March 2020

कुछ याद उन्हें भी करलें

कुछ याद उन्हें भी करलें

मातृभूमि की बलिवेदी पर,
शीश लिये, हाथ जो चलते थे।
हाथों में अंगारे ले कर,
ज्वाला में जो जलते थे ।
अग्नि ही पथ था जिनका ,
अलख जगाये चलते थे।
जंजीरों में जकड़ी मां को,
आजाद कराना सपना था ।
शिकार खोजते रहते थे ,
जब सारी दुनिया सोती थी ।
जिनकी हर सुबहो ,
भाल तिलक रक्त से होती थी ।
आजादी का शंख नाद जो ,
बिना शंख ही करते थे ।
जब तक मां का आंचल ,
कांटो से मुक्त ना कर देगें।
तब तक चैन नही लेंगे,
सौ सौ बार शीश कटा लेंगे।
दन-दन बंदूकों के आगे ,
सीना ताने चलते थे ।
जुनून मां की आजादी का,
सर बाँध कफ़न जो चलते थे।
न घर की चिंता न मात -पिता,
न भाई  बहन न पत्नी की।
कोई रिश्ता न बांध सका,
जिनकी मौत प्रेयसी थी ।
ऐसे देशभक्तों पर हर एक,
देशवासी को है अभिमान।
नमन करें उनको जो ,
आजादी की नीव का पत्थर थे।
एक विशाल भवन के
निर्माण हेतु हुए बलिदान।
नमन उन्हें हम करते हैं,
नमन उन्हें सब करते हैं ।।
                    कुसुम कोठारी ।

Saturday, 21 March 2020

कांची काया मन अथीरा

नव गीत ।
काची काया मन अथिरा


काची काया मन भी अथिरा ,
हींड़ चढा हीड़े जग सारा ।
दिखे सिर्फ थावर ये माया,
थिर थिर डोले है जग सारा ।

रोक हींड़ोला मध्य झांका ,
अंदर ज्यादा ही कंपन था ।
बाहर गति मंथर हो चाहे,
मानस अस्थिर भूड़ोलन था ।

 गुप्त छुपी विधना की मनसा,
जान न पाये ये जग सारा ।
काची काया मन भी अथिरा ,
हींड़ चढा हींड़े जग सारा ।।

जलावर्त  में मकर फसी है,
चक्रवात में नभचर पाखी
मानव दोनों बीच घिरा है ,
जब तक जल न भये वो लाखी।

कहां देश को गमन सभी का ,
जान न पाये ये जग सारा ।
काची काया मन भी अथिरा ,
हींड़ चढा हींड़े जग सारा ।।

कुसुम कोठारी।

सांसों की लय

सीप की वेदना "सांसों की लय"

हृदय में लिये बैठी थी
एक आस का मोती,
सींचा अपने वजूद से,
दिन रात हिफाजत की
सागर की गहराईयों में,
जहाँ की नजरों से दूर,
हल्के-हल्के लहरों के
हिण्डोले में झूलाती,
"सांसो की लय पर"
मधुरम लोरी सुनाती,
पोषती रही सीप
अपने हृदी को प्यार से,
मोती धीरे-धीरे
शैशव से निकल
किशोर होता गया,
सीप से अमृत पान
करता रहा तृप्त भाव से,
अब यौवन मुखरित था
सौन्दर्य चरम पर था,
आभा ऐसी की जैसे
दूध में चंदन दिया घोल,
एक दिन सीप
एक खोजी के हाथ में
कुनमुना रही थी,
अपने और अपने अंदर के
अपूर्व को बचाने,
पर हार गई उसे
छेदन भेदन की पीडा मिली,
साथ छूटा प्रिय हृदी का ,
मोती खुश था बहुत खुश
जैसे कैद से आजाद,
जाने किस उच्चतम
शीर्ष की शोभा बनेगा,
उस के रूप पर
लोग होंगे मोहित,
प्रशंसा मिलेगी,
हर देखने वाले से ।
उधर सीपी बिखरी पड़ी थी
दो टुकड़ों में
कराहती सी रेत पर असंज्ञ सी,
अपना सब लुटा कर,
वेदना और भी बढ़ गई
जब जाते-जाते
मोती ने एक बार भी
उसको देखा तक नही,
बस अपने अभिमान में
फूला चला गया,
सीप रो भी नही पाई,
मोती के कारण जान गमाई,
कभी इसी मोती के कारण
दूसरी सीपियों से
खुद को श्रेष्ठ मान लिया,
हाय क्यों मैंने
स्वाति का पान किया।।

         कुसुम कोठारी।

Thursday, 19 March 2020

नागफनी

नागफनी

कहो तो नागफनी
मरुस्थल के सीने पर कैसे?

कुदरत को धत्ता बताती,
खिलखिलाती रहती ऐसे।
सूखे गात वाली माँ के ,
आँचल में पल कर जैसे।
कोई बिरावन परवान चढ़ता
अपने ही बल पर ऐसे।।

कहो तो नागफनी
मरुस्थल के सीने पर कैसे?

भूरी भूमि पर लिए हरितिमा,
हृदय ताल में पुष्प खिले।
बाहर कांटे दिखने को ,
अंतर कितनी नमी मिले।
प्यास अपने अंदर सोखे
नीर समेटे बादल जैसे।।

कहो तो नागफनी
मरुस्थल के सीने पर कैसे?

धूप ताप अंधड़ सहती हो
फिर भी सदा हँसती रहती हो
मौसम बदले रूप कई
तुम अमर कथा सी बहती हो
औषध गुण से भरी भरी
अपना अस्तित्व संभाला ऐसे।।

कहो तो नागफनी
मरुस्थल के सीने पर कैसे?

        कुसुम कोठारी।

Tuesday, 17 March 2020

काग और हंस

काग और हंस

मुक्ता छोड़ अब हंस
चुनते फिरते दाना।
रंग शुभ्रा आड़ में
रहे काग यश पाना।

अपनी डफ़ली बजा बजा
सरगम सुनाते बेसुरी
बन देवता वो बोलते
कथन सब होते आसुरी।
मातम मनाते सियारी
हू हू कर झुठ का गाना।
रंग शुभ्रा आड़ में
रहे काग यश पाना।

चमक दमक सब बाहर की
कपड़े उजले, मन काला
तिलक भाल पर संदल का
कर थामे झुठ की माला
मनका फेरत जुग बीता
न फिरा बैर का ताना
रंग शुभ्रा आड़ में
रहे काग यश पाना।।

बिन पेंदी के लोटे जी
गंगा गये  गंगा राम
हां में हां करता रहता
जमुना गया जमुना राम
नाम बदल लो क्या जाता
डाल कबूतर को दाना
रंग शुभ्रा आड़ में
रहे काग यश पाना।

कुसुम कोठारी।