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Friday, 24 January 2020

नव गीत-दीन का दर्द

नवगीत
१६ १०मात्रा।

सर के ऊपर टूटी टपरी
 नही और दावा
उर की पीड़ा बाहर फ़ूटे
 बहती बन लावा ।।

सारा दिन हाड़ों को तोड़ा
जो भी काम मिला,
कभी कीच या रहे धूल में
मिलता रहा सिला ,
अवसादो के घन गहराते
साथ नही मितवा ।
उर की पीड़ा बाहर फ़ूटे
बहती बन लावा ।।

नियती कैसा खेल खेलती
कैसी  ये माया
कहीं बहारों के हैं मेले
कहीं दुःख छाया
दुनिया ये आनी जानी है
झूठा दिखलावा।
उर की पीड़ा बाहर फ़ूटे
बहती बन लावा ।।

आग सुलगी हृदय में ऐसी
दहके ज्यों ज्वाला
बन बैठी है लाचारी अब
चुभती बन भाला
निर्धन कितना बेबस होता
 सत्य यही कड़वा ।
उर की पीड़ा बाहर फ़ूटे
बहती बन लावा।।

कुसुम कोठारी।

कुसुम की कुण्डलियाँ-८

कुसुम की कुण्डलियाँ

२९ विषय-अनुपम
महकी मँजरी बाग में , छाया सरस स्वरूप।
किल्लोल करे सूर्य से , बिखरा मोहक रूप ।
बिखरा मोहक रूप , डाल बूंटो से निखरी ।
डोली नाची साथ , पवन सुरभित हो बिखरी ‌।
कहे कुसुम ये बात , गूंज मधुकर की चहकी  ।
मँजरी हुई निहाल ,रीझ सौरभ से महकी ।।

३० विषय-धड़कन
पावन ये शृंगार है , धड़कन का संगीत ।
बूझे कोई प्यार से , माँ ही ऐसा गीत ।
माँ ही ऐसा गीत , कंठ में मधुर समाई ।
जीवन का आधार , पूर्व भव पुण्य कमाई ।
कहे कुसुम सँग प्रीत , झूम कर नाचे सावन ।
धात्री सम है कौन , पूर्ण पवित्र औ पावन ।।

३१ विषय - वीणा
वीणा तू तो नाम की , सब तारों का काम ।
काया ज्यों बिन प्राण के ,धरी रहे निष्काम ।
धरी रहे निष्काम , नही कुछ सुर है तुझ में ।
नाम मधुरिमा झूठ , सत्व साधन है मुझ में ।
सुनो कुसुम की बात ,बात सन्मति से गुनणा ।
पड़े तार को चोट , कहें मृदु माया वीणा।।

३२ विषय-नैतिक
गहरे इसके भाव हैं ,अर्थ समेटे गूढ़ ।
नैतिक गहरा शब्द है , समझ न पाए मूढ़ ।
समझ न पाए मूढ़ , हँसी में ठोकर मारी  ।
करता भ्रष्टाचार  , छोड़ नैतिकता सारी ।
कहे कुसुम ये बात  , रहे प्रज्ञा के पहरे ।
सन्मति सद्व्यवहार , रखो अंतस में गहरे ।।

कुसुम कोठारी।

Wednesday, 22 January 2020

आह्वान

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्मदिवस पर देशवासियों को आह्वान ।

विजय शंख का नाद था गूंजा
वीरों की हुंकार भी गरजी
देेशभक्ति का भाव जगाया
मिटा के सब की खुदगर्जी

आह्वान है आज सभी को
उठो चलो प्रमाद को त्यागो,
मां जननी अब बुला रही
वीर सपूतों अब तो जागो ।

आंचल मां का तार हुवा
बाजुु है अब लहुलुहान,
क्या मां की आहुती होगी?
या फिर देना है निज प्राण ।

घात लगाये जो बैठे थे 
खसोट रहे वो खुल्ले आम
धर्म युद्ध तो लड़ना होगा
पीड़ा भोग रही आवाम ।

पाप धरा का हरना होगा ,
आज करो ये दृढ़ उदघोष
जागो तुम और जगा दो
जन-जन के मानस में जोश ।

             कुसुम कोठारी ।

Saturday, 18 January 2020

कुसुम की कुण्डलियाँ-७

कुसुम की कुण्डलियाँ-७

२५विषय :- कोयल
छाया अब मधुमास है , गाये कोयल गीत ,
कितनी मीठी रागिनी ,  घर आए मनमीत ,
घर आए मनमीत , मधुमास मधु भर लाता ,
पुष्पित है हर डाल , भ्रमित भौंरा भरमाता ,
कहे कुसुम ये बात , आज बसंत मुस्काया ,
तरुण हुवा हर पात , बाग पर यौवन छाया।।

२६विषय :- अम्बर
बरसे है शशि से विभा  ,  वल्लरियों के पात ,
अम्बर निर्मल कौमुदी  ,  सजा हुआ है गात ,
सजा हुआ है गात  ,  विटप मुख चूम रही है ,
सरित सलिल रस घोल ,मधुर स्वर झूम रही है,
विधु का वैभव दूर  ,  निरख के चातक तरसे ,
जलते तारक दीप ,  धरा पे ज्योत्स्ना बरसे ।।

२७विषय-अविरल
अविरल घन काले घिरे  ,  छाये छोर दिगंत ,
भ्रम है या जंजाल है  ,  दिखे न कोई अंत ,
दिखे न कोई अंत ,  गूढ़ गहराती मिहिका ,
बची न कोई आस , त्रास में घिरी  सारिका ,
कहे कुसुम ये बात ,  राह कब होगी अविचल ,
सुनें आम की कौन ,  हुआ जग जीवन अविरल ।

२८ विषय-  सागर
सागर में उद्वेग है , सूर्य मिलन की चाह ,
उड़ता बन कर वाष्प वो , चले धूप की राह ,
चले धूप की राह , उड़े जब मारा मारा ,
मृदु होता है फिर , झेल प्रहार बेचारा ,
कहे कसुम ये बात ,सिंधु है जल का आगर ,
कुछ पल गर्वित मेघ , फिर जा मिलता सागर ।।

Thursday, 16 January 2020

अँधा बांटे रेवड़ी

अँधा बांटे रेवड़ी

सर्वेश्वर दयाल पिछले चार साल से कमर कस कर नगरपालिका में ,जन भूमि आवंटन (गरीब तबके के लिए जिनके पास रहने भर को घर नहीं, खेती की जमीन तो दूर की बात ) के लिए ऊपरी संस्थाओं में अर्जी देना चक्कर लगाना नेताओं से बातचीत करना, यहां तक जी हजूरी भी करने में कोई परहेज नही था।
शाम को चौपाल पर सभी जरुरत मंद आ जुटते थे और सर्वेश्वर दयाल जी की खूब वाह वाही होती। उनके इस निस्वार्थ सेवा के लिए सभी गदगद हो उन्हें साधुवाद देते और देवता रूप समझ उनके पांव छूते थे।
आखिर उनकी लगन रंग लाई।ऊपर से आदेश आ गये कि 25 अर्जी स्वीकारी जाएगी ,सभी जरूरत मंद  गवाह के हस्ताक्षर के साथ अपनी अर्जियां डाल दें।
सर्वेश्वर जी ने बढ़ चढ़ कर सभी को अर्जी लिखने में मदद की ।
आज गाँव में कई पक्के मकान दिखने लगे ,कुछ छोटे मकान बड़े हो गये ,छोटे खेत बड़े हो गये ,
आज सर्वेश्वर दयाल का सारा कुनबा गाँव में सबसे प्रतिष्ठित और सबसे स्थापित है ।
आखिर सर्वेश्वर दयाल ने अपनी अथक मेहनत से अपने पच्चीस सम्बंधियों को (जिनमें से कई दूसरे गाँवो से भी बुलाए गये थे)
जमीन दिलवा दी किसी को खेती की और किसी को घर की ।
जो साँझ ढ़ले सर्वेश्वर बाबू के गुणगान करते थे, आज कल माथा पीटते हुए एक आलाप लिए घूम रहे हैं ,आप भी गा सकते हैं "अंँधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपनों को देय"।

पिपासा

पिपासा

कैसा तृष्णा घट भरा-भरा
बूंद - बूंद छलकाता है ,
तृषा, प्यास बस जीवन छल है
क्षण -क्षण छलता जाता है ।

अदम्य पिपासा अँतर तक जो
गहरे उतरी जाती है,
दिखलाती कैसे ये सपने
पूर्ण हुवे भरमाती है,
जीवन मूल्यों से भी गिराता
अकृत्य भी करवाता है,
कैसा तृष्णा घट भरा-भरा
बूंद - बूंद छलकाता है ।।

द्वेष, ईर्ष्या की सहोदर है
उच्च भाव भुलवाती है,
तृष्णा मोह राग की जाई
बंधन जकड़े जाती है ,
निज स्वरूप को जिसने समझा
सत-पथ राह लुभाता है,
कैसा तृष्णा घट भरा-भरा
बूंद - बूंद छलकाता है ।।

  कुसुम कोठारी

Wednesday, 15 January 2020

परिवर्तित जलवायु और पर्यावरण

परिवर्तित जलवायु देखकर,
आज निहत्थे खड़े सभी ।

जो मेघों का सँतुलन बिगड़ा
नदियां हो गई कृष काय
सूरज तपता ब्रह्म तेज सा
धरती पुरी जलती जाय ।

धधक-धधक कर जलते उपवन
कंक्रीटों का जाल अभी
परिवर्तित जलवायु देखकर
आज निहत्थे खड़े सभी।

हिमनद सारे पिघल रहे हैं
दरक रहे हैं धरणीधर
सागर बंधन तोड़ रहे हैं
नीर स्तर भी हुआ अधर ।

क्या होगा जाने जग जीवन
संकट में है जान सभी
परिवर्तित जलवायु देखकर
आज निहत्थे खड़े सभी।

बेमौसम बरसातें ओले
प्रलयंकारी बाढ़  बढ़ी
खेती बंजर सूखी धरती
असंतुलन की धार चढ़ी।

पर्यावरण की हानि होती
सुधरे ना हालात कभी
परिवर्तित जलवायु देखकर
आज निहत्थे खड़े सभी ।।

कुसुम कोठारी।