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Tuesday, 5 July 2022

वर्षा ऋतु का सौंदर्य और प्रकृति भिन्न सवैया में।


 वर्षा ऋतु का सौंदर्य और प्रकृति भिन्न सवैया में।


दुर्मिल सवैया /सरसी वसुधा 

अब देख सुधा बरसी नभसे, टप बूँद गिरी धरती पट पे।

सरसी वसुधा हरषाय रही, इक बूँद लगी लतिका लट पे।

झक चादर भीग भई कजरी, रमती सखियाँ जमुना तट पे।

अरु श्याम सखा मुरली बजती, तब गोपन दृष्टि लगी घट पे।।


किरीट सवैया /महि का रूप


मंजुल रूप अनूप रचे महि, मोहित देख छटा अब सावन।

बाग तड़ाग सभी जल पूरित, पावस आज सखी मन भावन।

मंगल है शिव नाम जपो शुभ, मास सुहावन है अति पावन ।

वारि चढ़े सब रोग मिटे फिर, साधु कहे तन दाहक धावन।।


सुंदरी सवैया/ऋतु सावन

ऋतु सावन रंग हरी वसुधा, मन भावन फूल खिले सरसे है।

जल भार भरी ठहरी बदली, अब शोर करे फिर वो बरसे है।

जब बूंद गिरे धरणी पर तो, हर एक यहाँ मनई हरसे है।

बिन पावस मौसम सूख रहे, हर ओर बियावन सा तरसे है।।


मत्तगयंद सवैया/पावस के रंग


आज सुधा बरसे नभ से जब, भू सरसी महके तन उर्वी।

खूब भली लगती यह मारुत, धीर धरे चलती जब पूर्वी।

रोर करे घन घोर मचे जब,भीषण नीरद होकर गर्वी।

कश्यप के सुत झांक रहे जब, कोण चढ़े चमके नभ मुर्वी।।


दुर्मिम सवैया/ऋतु सौंदर्य 


घन घोर घटा बरसे नभ से चँहु ओर तड़ाग भरे जल से।

चमके बिजली मनवा डरपे सरसे जल ताप हरे थल से।

मन मोहक ये ऋतु मोह गई घन ले पवमान उड़ा छल से।

अब फूट गई नव कोंपल है झुक डाल गई लदके फल से।।


प्रज्ञा सवैया/नेह की धार

शोभा कैसी धरा की दिखे मोहक ओढ़ के ओढ़नी मंजुल धानी।

कूके है कोयली बोल है पायल झांझरी ज्यों  बजे वात सुहानी।

मेघा को मोह के जाल फंसाकर व्योम पे मंडरा बादल मानी।

प्यारी सी मोहिनी सुंदरी शोभित, नेह की धार है कंचन पानी।।


गंगोदक सवैया/ऋतु मन भावन

लो बसंती हवाएँ चली आज तो, मोहिनी सी बनी रत्नगर्भा अरे।

बादलों से सगाई करेगी धरा, है प्रतिक्षा उसे मेह बूंदें झरे।

डोलची नीर ले के घटा आ गई, शीश मेघा दिखे गागरी सी धरे।

रंग रंगी सुहावे हरी भू रसा, कोकिला गीत गाए खुशी से भरे।।


गंगोदक सवैया/श्रावणी मेघ

कोकिला कूकती नाचता मोर भी, मोहिनी मल्लिका झूमती जा रही।

आज जागी सुहानी प्रभाती नई, वात के घोट बैठी घटा आ रही।

श्रावणी मेघ क्रीड़ा करें व्योम में, गोरियाँ झूम के गीत भी गा रही।

बाग में झूलती दोलना फूल का, बाँधनी लाल रक्ताभ सी भा रही।।

कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 3 July 2022

द्वेष की अग्नि


 द्वेष की अग्नि


अगन द्वेष की ऐसी भड़की 

शब्द बुझा कर जहर गए।


बीती बातें राख झाड़ कर 

कदम बढ़ाया जीवन में 

एक ग्रंथि पर टीस मारती 

यकबक मन के आँगन में 

चोट पुरानी घाव बन गई 

शूल याद में लहर गए।।


घात लगी कोमल अंतस पर 

आँखें भूल गईं रोना 

मनोवृत्ति पर ठोकर मारी 

दरक गया कोना-कोना 

ठूँठ बनी ज्यों कोई माता 

पूत छोड़ जब शहर गये।।


शांत भाव का ढोंग रचा था 

खोल रखी थी बैर बही 

अवसर की बस बाट जोहता 

अंदर ज्वाला छदक रही 

चक्रवात अन्तस् में उठता 

भाव शून्य में ठहर गए ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 30 June 2022

एक नीड़ बना न्यारा

बाल गीत


एक नीड़ बना न्यारा।


लंकापति की स्वर्ण नगरिया

भरती दिखती पानी।

चिड़िया जी ने नीड़ बनाया

लगती उसकी रानी।


टूटी सी कंदील सजी है

तिनका-तिनका जोड़ा।

नहीं किसीका सदन उजाड़ा

पादप एक न तोड़ा।


ठाठ लगे हैं राज भवन से

राजदुलारे खेले।

माँ बैठी मन मुस्काए

खुशियों के हैं मेले।


चोंच खोल कर नेह जताए

माँ गोदी में लेलो

या तुम भी अब अंदर आकर

साथ हमारे खेलो ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Tuesday, 28 June 2022

विरहन की पाती


 विरहन की पाती


पिव आने की आशा मन में

मृगनयनी छत पर चढ़ आती।

नख सिख तक श्रृंगार रचाए

लेकर हाथ कलम अरु पाती।।


चाँद किरण से बातें करती

खंजन आँखें राह निहारे

थोड़ी सी आहट पर चौंकी

पिया दरश को नैना हारे

बदरी ने आँसू छलकाये

नन्हीं बूँदे आस दिलाती।।


सुनो कलापी मेरे भाई

सजना को दे दो संंदेशा

पत्र लिखूँ कुछ मन की बातें

उपालंभ भी अरु अंदेशा 

पवन झकोरा चला मचल कर

उड़ा ले गया लेख अघाती।।


स्वामी के बागों में जाकर

पीहू पीहू तान सुनाना

नाच नाचना मोहक ऐसे

उन को मेरी याद दिलाना

साथ उन्हें लेकर घर आना

नहीं याद अब मन से जाती।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 26 June 2022

मनोवृतियाँ


 गीतिका (हिंदी गजल) मापनी:-

1212 212 122 1212 212 122.


मनोवृत्तियाँ


धुआँ धुआँ सा गगन हुआ है बुझा बुझा सा प्रकाश दिखता।

न चाँद पूरा दिखे धरा से नहीं कहीं पर उजास दिखता।।


करें अहित के विरुद्ध बातें दिखा रहे हैं महान निज को।

रहस्य खुलने लगे उन्हीं के मलिन हुआ सा विभास दिखता।।


लिखे गए जो कठिन समय में वही लेख अब मिटा रहे हैं।

धरोहरों को उजाड़ने का हुआ कपट ये प्रयास दिखता।।


अलख जगा कर रखा जिन्होंने खरी-खरी की दहाड़ भरते।

दिखावटी ढब अभी खुले हैं छुपा छुपा सा खटास दिखता।।


करे धरे जो नहीं कभी कुछ हरा हरा बस दिखा रहे हैं ।

पड़ा परिश्रम अभी अभी तो उड़ा उड़ा सा निसास दिखता ।।


उन्हें न मुठ्ठी गगन मिला है झुका झुका सिर नयन उदासी। 

श्रमिक रहा है सदा प्रताड़ित थका थका फिर विकास दिखता।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 20 June 2022

उधेड़ बुन


 उधेड़-बुन


श्वास उखड़ती रात ढली है

सोई जाकर कक्ष।

सोन तार से कंबल ओढ़े

खड़ा अभी तक यक्ष।


कान खुजाते पल क्षण बीता

रखता आँखे बंद

और उबासी लेती करवट

नींद बची है चंद

बलध कोहलू जीवन सारा

घूम रहा है अक्ष।


संकेत यंत्र संचालित हैं

भेड़ें खाती चोट

जिस लाठी से गधे हांकते

उसी छड़ी से घोट 

रेंग रही है सबकी गाड़ी

ये हैं चालक दक्ष।


सिंघासन में भारी बल है

उँगली खेले खेल

इंजन ईंधन फूंक रहा है

खड़ी हुई है रेल

पीस रही है घट्टी दाने

सौ सहस्त्र या लक्ष।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 17 June 2022

मरुधरा री बलती।(लू)


 मरुधरा री बलती(लू)


आंख्या भरती बालूड़ी स्यूँ

आसराम भट्टी तपता।

खदबद करता दिवस रैण ज्यूँ

बड़ चुला में छाना खपता।


नैण तरसग्या ऊपरे तकता

काली कलायण दूर न दीसे

आग उगालतो सूर बिरानों

लागे जमड़ो दांती पीसे

अरे राम जी किरपा कर तू

मास गुजरियो माला जपता।।


खड-खड़ बाजे खिड़क किवाँड़्याँ

पोळां तरसे  मिनखा ने

भटक रह्या है पांख डांगरा

ठाँव -छाँव अरु तिनका ने

घिरे न बदली एक पहर भी

मास बितग्यो आँख्याँ टपता।।


हरियाली रा रूँख न दीसे

सूख खेजड़्या खोखा झड़ता

कुण बुहारे निंबोल्याँ ने

लू लपट रा कोड़ा पड़ता

कईंयाँ डालैं धान खेत में

पानी बिकतो सरवा नपता।।


नेह देह सब झुलस रया है

बूढ़ी पीपली पात परोसें

खाली ठिकर ठन-ठन बोले 

हिय पानी री बूंदा ने तरसे।

ताल कुंड तली तक खाली

पगथल्याँ री छाप छपता।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


बालूड़ी/रेत, आसराम/कमरे , बड़ /बड़े, 

छाना/उपला, खपता/ खपजाना, काली कलायण/काले घने बादल, सूर /सूरज, बिरानों/पराया, जमड़ो/ यम, दांती /दांत बत्तीसी, किंवाड़्याँ/ किवाड़, खिड़क/बाहर का दरवाजा, मिनख/आदमी या मनुष्य, पोळां/ हवेली महल के बड़े बड़े द्वार, पांख/पक्षी, डांगरा/पशु, टपता /बिना पलक झुकाए, रूंख /पेड़, खोखा/ परिपक्व सांगरी, सरवा/ घड़े पर रखने वाला लोटा, पात /पत्ते ,ठिकर-बर्तन पगथल्याँ=पगथली।