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Friday, 7 September 2018

हसरतें खियाबां

हसरतें खियाबां

यूं ही होता जब बंद किताबों के पन्ने पलटते हैं
सफे यादों  के ठहरे रूके फिर - फिर  चलते हैं

गम और खुशी सभी के हिस्सा ए हयात होता है
कभी हंसाता है और कभी बेपनाह रूलाता है

सो जाती है रात जब, सिर्फ ख्वाब ही चलते हैं
हसरतेें  खियाबां की मगर खिज़ा मे भटकते है।

             कुसुम  कोठारी ।

खियाबां  =बगीचा
खिज़ा=पतझर या बैरौनक


10 comments:

  1. वाह!!! बहुत खूब सखी .... बहुत सुन्दर ग़ज़ल।
    हर शेर कमाल

    ग़ज़ल वही जो दिल में उतर जाये
    लाख भूलना चाहो फिर भी याद आए।

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  2. वाहः वाहः बहुत खूब
    बेहतरीन अशआर

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  3. वाह बेहतरीन बहुत सुंदर गजल 👌👌

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 09 सितम्बर 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. अद्भुत अस्सार.

    वाह
    आप की लेखनी कमाल है

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  6. वाह बहुत सुंंदर...गम और खुशी सभी के हिस्सा ए हयात होता है..इसी से सबको जूझना होता है...फिर ये हमारे ऊपर है कि कैसे इसे डील करें

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  7. गम और खुशी सभी के हिस्सा ए हयात होता है
    कभी हंसाता है और कभी बेपनाह रूलाता है
    लाजवाब गजल
    वाह!!!

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  8. यूं ही होता जब बंद किताबों के पन्ने पलटते हैं
    सफे यादों के ठहरे रूके फिर - फिर चलते हैं
    .
    बहुत ख़ूब... अति उत्तम दीदी, बेहद ख़ूबसूरत

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  9. छोटी सी रचना पर बहुत प्रभावी | कुसुम बहन आपका उर्दू में दखल बहुत सराहनीय है |सस्नेह |

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