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Wednesday, 21 July 2021

चाय सुधा रस


 चाय सुधा रस


उठ भगाना भूत आलस

और मन जाये बहल ये।।


आँच पर पानी बिठाया

एक चम्मच कूट अदरक

मुंह से भी भाप निकले

खोल आये जल्द मनलख

चाय के बिन अब कहाँ है

ठंड में जीवन सरल ये।।


बलवती ये सोम रस सी

गात में भर मोद देती

काँच रंगे पात्र में भर

हर घड़ी आमोद देती

इक तरह का है नशा पर

मधुरिमा बहती तरल ये‌।।


हर दिवस का राग प्यारा

मेहमानों को लुभाती

नाथ निर्धन भेद कैसा

रंग बैठक में जमाती

लाल काली दूधवाली

रूप इसका है अचल ये।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 18 July 2021

क्लांत सूरज


  क्लांत सूरज


दिन चला अवसान को अब 

नील  नभ पर स्वर्ण घेरा 

काल क्यों रुकता भला कब 

रात दिन का नित्य फेरा ।।


थक चुका था सूर्य चलकर 

क्लांत मन ढलता कलेवर 

ढ़ांकता कलजोट कंबल 

सो गया आभा  छुपाकर 

ओढ़ता चादर तिमिरमय 

सांझ का मध्यम अँधेरा।।


झिंगुरी हलचल मची है 

दीप जलते घाट ऊपर 

उड़ रहे जुगनू दमकते 

शांत हो बैठा चराचर 

लो निकोरा चाँद आया 

व्योम पर अब डाल डेरा।।


हीर कणिका सा चमकता 

कांति मय है तारिका दल 

पेड़ पत्तो में छुपी जो 

चातकी मन प्राण हलचल 

दूर से निरखे प्रिया बस 

चाव मिलने का घनेरा।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'।

Friday, 16 July 2021

भाव शून्य


 भाव शून्य


क्रूर सोच जगती में बढ़ती

पाप कर्म के मेघ सघन।

अपना ही सब संगम रचते

बने टनाटन कर नाहन ।।


भाव शून्य हैं पाथर जैसे

गर्म तवे ज्यों बूंद गिरी

संवेदन सब सूख गये हैं

मानवता अवसाद घिरी

कण्टक के तरुवर को सींचा

पुष्प महकता कब उपवन।।


मानव और पशु का अंतर 

जिनको समझ नहीं आता

उनसे आशा व्यर्थ पालना 

जिनको निज यश ही भाता

अर्थ नाम लिप्सा में उलझे

अहम समेटे हैं जो मन।।


दान पुण्य का खूब दिखावा

उजली चादर मन काला 

पीठ पलटते ताव दिखाते

हाथ फेरते झूठी माला

अंतस मैला वहीं जमा है

खूब रगड़ते है बस तन।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 10 July 2021

मौसम


 मौसम 


गंध  लेकर पुष्प महके

आ गया मौसम सुहाना

बोल बोले भृंग भोले

कोकिला गाती तराना।।


कल्पना में तीर यमुना

श्याम का आनन सलौना

राधिका थी मानिनी सी

बांसुरी का इक खिलौना

साथ हरि सब नाचते थे

प्रीत का अनुपम खजाना ।।


भूल बैठे उस समय को

गागरी पर साज बजता

बालु के शीतल तटों पर

मंडली का कल्प सजता

चाँद की उजली चमक में

झूम उठता मन दिवाना।।


कंठ से सरगम मचलती

ताल लय सुर भी महकते

कुछ क्षणों में नव सृजन के

भाव मधुरस बन बहकते

आज मुखड़ा ढूँढता है

गीत अपना ही पुराना।।


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Monday, 5 July 2021

पावस गीत


 पावस गीत


बादल चले ठन के

समर को जीत चतुरंगी।

जल भार लादा है

बनी सौदामिनी संगी ।।


चाबुक पवन मारे

सिसकती है घटा काली

रोये नयन सौ भर 

तपन के तेज की पाली

आया बरसके अब

जलद लघु काय बजरंगी।।


पावस सदा आता

करें सब लोग अगवानी

धागे बिना देखो

प्रकृति सिलती वसन धानी

है व्योम भी चंचल

पहनता पाग सतरंगी।।


संगीत है अनुपम

नगाड़े दे धमक बजते 

आषाढ़ अब बरसा

गगन में मेघ भी सजते 

वर्षा मधुर सरगम

बजे ज्यूँ वाद्य सारंगी।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 1 July 2021

हीर कणिकााएं


हीर कणिकााएं
 

ये रजत बूंटो से सुसज्जित नीलम सा आकाश,

ज्यों निलांचल पर हीर कणिकाएं जडी चांदी तारों में,


फूलों  ने भी पहन लिये हैं वस्त्र किरण जाली के,

आई चंद्रिका इठलाती पसरी लतिका के बिस्तर में।


विधु का कैसा रुप मनोहर तारों जडी पालकी है,

भिगोता सरसी हरित धरा को निज चपल चाँदनी में ।


स्नान करने उतरा हो ज्यों निर्मल शांत झील में।

जाते-जाते छोड़ गया कुछ अंश अपना पानी में ।


ये रात है या सौगात है अनुपम  कोई कुदरत की,

जादू जैसा तिलिस्म फैला सारे  विश्व आंगन में।।


              कुसुम कोठारी  'प्रज्ञा'

Monday, 28 June 2021

भाण


 भाण


गीत नव सुंदर रचे हैं

पाण रखना चाहिए।

जब लिखो तुम शब्द कहते 

भाण रखना चाहिए।


एक से बढ़ लेखनी है

काव्य रचती भाव भी

कल्पना की डोर न्यारी

और गहरे घाव भी

गंध को भरले हृदय में

घ्राण रखना चाहिए।।


हो विचारों में गहनता

संयमी जीवन रहे

कामना की दाह पर भी

बाँध से पानी बहे

लालसा बहती सुनामी

त्राण रखना चाहिए।।


नील कंठी शिव प्रभु में

तीक्ष्ण भी  है ओज भी

मनसिजा को भस्म करके

दपदपाया तेज भी

जीत की हर चाह पर कुछ

ठाण रखना चाहिए।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


पाण=अभिनंदन ,भाण=ज्ञान ; बोध, ठाण=ठान घ्राण=सूंघने की शक्ति,मनसिजा =कामदेव

Saturday, 26 June 2021

किरीट सवैया छंद

विधा- किरीट सवैया  

शिल्प विधान :-12,12 वर्णों पर यती ,मापनी 211 211 211 211, 211 211 211 211


१) जग भंगुर

ये जग भंगुर जान अरे मनु, नित्य जपो सुख नाम निरंजन।

नाम जपे भव बंधन खंडित, दूर हटे  चहुँ ओर प्रभंजन।

अंतस को रख स्वच्छ अरे नर, शुद्ध करें शुभता मन मंजन।।

उत्तम भाव भरे नित पावन, सुंदर प्रेषित हो अभिव्यंजन।।


२)सावन

मंजुल रूप अनूप रचे महि, मोहित देख छटा अब सावन।

बाग तड़ाग सभी जल पूरित, पावस आज सखी मन भावन।

मंगल है शिव नाम जपो शुभ, मास सुहावन है अति पावन ।

वारि चढ़े सब रोग मिटे फिर, साधु कहे तन दाहक धावन।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Tuesday, 22 June 2021

कवि का आत्म-मंथन


 कवि का मंथन


उकेर कविता पन्ने पर जब

मोती जैसे भाव जड़े

कितने तभी कलम के योद्धा

हाथ जोड़कर वहां खड़े।


निखरी निखरी लगती मुझको  

नदियाँ निर्मल पानी हो

चित्रकार की रचना मनहर 

रहा न जिसका सानी हो

लिखकर जिसको आत्मवंचना

आहा रचनाकार बड़े।।


गुरु हाथों जब हुआ गवेक्षण

पोल ढोल की दिखा गई

दर्पण जैसी प्रतिछाया में

शिल्प झोल सब सिखा गई

त्रस्त हुई चीत्कार करें फिर

कितने टुकड़े कटे पड़े।।


विनयवान साहित्य रचेगा

अभिमानी को ताव नहीं

रस अलंकार छंदों के बिन

कविता का कुछ भाव नही

मेधा और मनस मिल जाए

बने कल्पना पंख उड़े।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Friday, 18 June 2021

भाव पाखी


 भाव पाखी

खोल दिया जब मन बंधन से

उड़े भाव पाखी बनके 

बिन झाँझर ही झनकी पायल

ठहर-ठहर घुँघरू झनके।


व्योम खुला था ऊपर नीला

आँखों में सपने प्यारे

दो पंखों से नील नापलूँ

मेघ घटा के पट न्यारे

एक गवाक्ष खुला छोटा सा

टँगे हुए सुंदर मनके।।


अनुप वियदगंगा लहराती 

रूपक ऋक्ष खिले पंकज

जैसे माँ के प्रिय आँचल में 

खेल रहा है शिशु अंकज

बिखर रहा था स्वर्ण द्रव्य सा  

बिछा है चँदोवा तनके।।


फिर घर को लौटा खग वापस

खिला-खिला उद्दीप्त भरा

और चहकने लगा मुदित मन

हर कोना था हरा-हरा

खिलखिल करके महक रहे थे 

पात हरति हो उपवन के।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Wednesday, 16 June 2021

मरुभूमि


 मरुभूमि


भार सी मरुभूमि फैली 

सामना कर हौसलों से 

पार जब करना कठिन तब 

दूर कर सब अटकलों से।


रेत प्यासी बूँद चाहे 

बादलों का पात्र खाली 

बीतता मौसम कसकता 

हाथ मलता बैठ माली 

कौन भागीरथ रहा अब

वारि लायेगा तलों से।। 


तम बिखेरे रात काली 

चाँदनी का है कलुष मुख 

छा रहा घनघोर ऐसा 

भाग छूटा है सरस सुख 

पीर की विद्युत कड़कती 

कष्ट के इन बादलों से।।


पेट की ज्वाला बुरी है 

गर्म लावे सी दहकती 

राख हो इस आँच में फिर 

दो निवाले को भटकती 

छोड़ कर निज ग्राम देखो 

दूर कितने अंचलों से।।


  कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 14 June 2021

मैं बदरी कान्हा की सहेली!


मैं बदरी कान्हा की सहेली

बदरी मैं श्याम सलौनी
कान्हा की सहेली
काली फिर भी मन भाती
कैसी  ये पहेली।।

घुमड़ूँ मचलूँ  मैं हिरणी
हाथ कभी न आऊँ ‌
खाली होती भगती फिर
जल सिंधु से लाऊँ
हवा संग खेलूँ कब्ड्डी
लिए नीर अहेली।।

करें कलापि तात थैया
मुझे देख हरसते
याद करे पी को विरहन 
सूने दृग बरसते
मदंग मलंग मतवाली
उड़ूँ छितर कतेली।।

सूर्य ताप करती ठंडा
कृषक आशा बनती
चढ़ हवा हय की सवारी
कुलाचें नभ ठनती
कभी कभी दिखती जैसे 
बिछी गगन गदेली।।

कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Friday, 11 June 2021

मौसम में मधुमासी


 मौसम में मधुमासी


रिमझिम बूँदों की बारातें

मौसम में मधुमासी जागी।

संग मलय पुरवाई लहरी

जलती तपन धरा की भागी।


धानी चुनर पीत फुलवारी

धरा हुई रसवंती क्यारी।

जगा मिलन अनुराग रसा के

नाही धोई दिखती न्यारी‌।

अंकुर फूट रहे कोमल नव

पादप-पादप कोयल रागी।।


कादम्बिनी चढ़ सौदामिनी

दमक बिखेरे दौड़ रही है।

लगी लगन दोनों में भारी

हार जीत की होड़ रही है।

वसुधा गोदी बाल खेलते

छपक नाद अति मोहक लागी।।


बाग सजा है रंग बिरंगा 

जैसे सजधज खड़ी कामिनी।

श्वेत पुष्प रसराज लगे ज्यों

लता छोर से पटी दामिनी।

कली छोड़ शैशव लहकाई

श्यामल मधुप हुआ है बागी।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Wednesday, 9 June 2021

लो आया नया विहान


 लो आया नया विहान ।


प्रकृति लिये खड़ी कितने उपहार, 

चाहो तो समेट लो अपनी झोली में,

अँखिंयों की पलकों में ,

दिल की कोर में ,साँसों की सरगम में ।

लो आया नया विहान।।


देखो उषा की सुनहरी लाली कितनी मन भावन ,

उगता सूरज ,ओस की शीतलता

पंक्षियों की चहक ,फूलों की महक,

भर लो अंतर तक ,कलियों की चटक ।

लो आया नया विहान।।


कोयल की कुहूक मानो कानो में मिश्री घोलती ,

भँवरे की गुँजार ,नदियों की कल-कल,

सागर में प्रभंजन ,लहरों की प्रतिबद्धता ,

जो कर्म का पाठ पढाती बंधन में रह के भी ।

लो आया नया विहान।।


झरनों का राग,पहाड़ों की अचल दृढ़ता ,

सुरमई साँझ का लयबद्ध संगीत ,

नीड़ को लौटते विहंग ,अस्त होता भानु ,

निशा के दामन का अँधेरा कहता।

लो आया नया विहान।।


गगन में इठलाते मंयक की उजास भरती रोशनी ,

किरणों का चपलता से बिखरना ,

तारों की टिम-टिम ,दूर धरती गगन का मिलना,

बादलों की हवा में उडती डोलियाँ ।

लो आया नया विहान।।


बरसता सावन , मेघों का घुमड़ना, 

तितलियों की अपरिमित सुंदरता, 

न जाने क्या-क्या जिनका कोई मूल्य नही चुकाना, 

पर जो अनमोल भी है अभिराम भी ।।

लो आया नया विहान ।।


            कुसुम कोठारी  'प्रज्ञा'

Monday, 7 June 2021

गाँव की स्मृति


 गाँव की स्मृति


दो घड़ी आ पास बैठें 

पीपली की छांव गहरी 

कोयली की कूक सुन कर 

गोखरू की झनक ठहरी ।।


वो दिवस कितने सुहाने 

दौड़ते नदिया किनारे 

बाग में अमियां रसीली 

मोर नाचे पंख धारे 

खाट ढ़लती चौक खुल्ले 

नील नभ पर चाँद फेरी।। 


वात में था प्राण घुलता 

धान से आँगन गमकता 

बोलियाँ मीठी सरस सी 

तेज से आनन दमकता 

दर्द सुख सब साथ सहते 

प्रीत गहरी थी घनेरी।। 


चल पड़े उठ उठ कदम फिर 

खींचता वो कल्प सुंदर 

भूमि के राजा सभी थे 

और सब मन के सिकंदर  

सोचता मन गाँव प्यारा

ये डगर रंगीन मेरी ।।



कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 4 June 2021

डोर आज्ञात के हाथ


 डोर आज्ञात के हाथ।


सागरी पानी उठा कर

झूम कर बदरी घमकती।


चाल चलता कौन ऊपर

डोर किसके हाथ रहती

नाट्य रचता है अनोखे

एक ओझल धार बहती

ताप दिनकर का तपाता

बन धरा कुन्दन चमकती।।


अंकुरित हो बीज नन्हा

चीरता आँचल धरित्री

और लहराके मटकता

कुश बनता है पवित्री

और कितने रंग अद्भुत

पंक में नलिनी गमकती।।


नीर बरसे क्षीर जैसा

बूंद बिन मेघा बरसती

रात की प्यारी सहेली

सूर्य क्रीड़ा को तरसती

पात पलने झूलती वो

ओस मोती सी दमकती।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 29 May 2021

वीर शिरोमणि आल्हा ऊदल और पृथ्वीराज युद्ध


 *वीर शिरोमणि आल्हा ऊदलऔर पृथ्वीराज युद्ध।* 


आल्हा मध्यभारत में स्थित ऐतिहासिक बुन्देलखण्ड के सेनापति थे और अपनी वीरता के लिए विख्यात थे। आल्हा के छोटे भाई का नाम ऊदल था ,वह भी वीरता में अपने भाई से बढ़कर ही था।

ऊदल अपनी मातृभूमि की रक्षा हेतु पृथ्वीराज चौहान से युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए आल्हा अपने छोटे भाई की वीरगति की खबर सुनकर अपना आपा खो बैठे और पृथ्वीराज चौहान की सेना पर मौत बनकर टूट पड़े आल्हा के सामने जो आया मारा गया 1 घण्टे के घनघोर युद्ध की के बाद पृथ्वीराज और आल्हा आमने-सामने थे दोनों में भीषण युद्ध हुआ पृथ्वीराज चौहान बुरी तरह घायल हुए, आल्हा के गुरु गोरखनाथ के कहने पर आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान को जीवनदान दिया ।

बुन्देलखण्ड के ये महा योद्धा अमर हो गये आज तक उनकी वीरता के चर्चे गीतों छंदों में गाए जाते हैं।


 *आल्हा छंद आधारित काव्य सृजन।* 

 

दोहा:-

नीलभुजा माँ शारदे, रखो कलम का मान।

आल्हा रचना चाहती, सम्मुख बैठो आन ।।

वंदन कर गुरु पाद में, श्रीगणेश हो काज।

ओज भरा कर दूँ सृजन, यही भावना आज।।


वे बुंदेला के सेनापति,

आल्हा वीर शिरोमणि एक।

वीर अनुज सम ऊदल भ्राता,

आज लिखूँ उन पर कुछ नेक।।१।। 


दोनों ही थे देश उपाशक,

राजा परमल देते स्नेह । 

दसराज पिता माता देवल,

जिनका दसपुरवा में गेह।।२।।


उनका शोर्य अतुल अनुपम था,

दोनो अवतारी से  वीर। 

भीम युधिष्ठिर कहलाते थे,

रिपु  छाती को देते चीर।।३।।


पृथ्वीराज नृपति अजमेरी,

सैना ले आये चंदेल। 

ऊदल अगवाई कर बढ़ते,

जैसे खेले कोई खेल।।४।। 


पृथ्वीराज बड़े योद्धा थे,

नभ तक फैला उनका नाम।

राव सभी थर्राते उनसे, 

चढ़ आये चंदेला धाम।।५।।


नृप परिमल भयभीत हुए पर,

जोश भरा ऊदल में तेज।

ईंट बजा दूँगा मैं सबकी,

मृत्यु बने रिपुओं की सेज।।६।।


बैरी पर चढ़ने वो दौड़ा,

दल बल पैदल हस्ती घोट।

अस्त्र सुशोभित सौष्ठव दमका,

रण भेरी डंके की चोट।।७।।


युद्ध भयंकर टनटन शायक,

शत्रु रुधिर का करती पान। 

ऊदल में बिजली सी बहती,

खचखच काटे मुंड़ सुजान।।८।।


भाल प्रथम गिरने से पहले,

अन्य उड़े ज्यों अंधड़ पात।

मृत तन  से भूमि टपी सारी,

रक्त भरे  बिखरे थे गात।।९।।

 

बाहु सहस्त्रा चलते भारी,

तन के भाव नही थे क्लांत।

ऊदल जैसे तांडव बनता,

चौहानी सैनिक थे श्रांत।।१०।।


पृथ्वीराज स्वयं फिर आये,

ऊदल तन में रक्त उबाल।

दोनों हाथी से बलशाली,

दोनों चलते मारुति चाल।।११।।


रक्तिम आँखों देख रहे थे,

दोनों ही थे वीर महान।

अल्प क्षणों करवाल रुके से,

सिंह मृगाशन धीर महान।।१२।।


दोहा:-

श्वांसे चलती धोंकनी, आयुध करते शोर ।

तोल रहे लोहित नयन,युद्ध छिड़ा  घनधोर।।


तलवारे झन्नाई भारी, 

गूंजा भीषण आहत नाद।

टूट वहाँ चट्टाने बिखरी, 

अश्व खड़े थे पिछले पाद ।।१३।।


व्योम अवनि तक विद्युत कौंधी,

पाखी उड़कर भागे दूर।

दहला भय से जन-जन का मन,

मेघाक्षादित मिट्टी भूर।।१४।।


दीर्घ रथी चोटों पर चोटें, 

काल थमा था विस्मित आज।

अपनी चेत नहीं दोनों को, 

उनको प्यारा राष्ट्र सुराज।।१५।।


अंतिम निर्णय तक लड़ना था, 

मौत सखी सा रखते भाव। 

चिंता अपने तन की भूले, 

खड्ग करे घावों पर घाव।।१६।।


युद्ध दिखे दावानल जैसा, 

मौत लपकती हर तलवार।

धूं धूं वीर सिपाही जलते, 

अग्नि बिना ही हाहाकार।।१७।।


हार विजय का भेद समझने, 

सूर्य गया ज्यों ढलना भूल।

दो इन्द्रों का साहस देखे, 

कौन मिटेगा जड़ आमूल।।१८।।


ताड़ित टूट गिरी फिर ऐसी, 

गूंजी चौहानी ललकार।

देह धरा पर ऊदल घायल, 

चार दिशा में हाहाकार।।१९


परमल सेना क्लांत दुखी थी, 

शत्रु दिशा में जय जयकार।

पृथ्वीराज नमन सिर करते, 

योद्धा देखा पहली बार।।२०।।


दोह,:-

और साँझ ढल ही गई, रवि अप्रभ निस्तेज ।।

मूक हुई चारों दिशा, वीर शयन भू सेज।।


हरकारा हय पर चढ़ दौडा, 

बात सुनाई रण की खार।

आँख फटी सी जिव्हा जकड़ी, 

खौला रक्त उछाले मार।।२१।।


भ्रात अनुज प्राणों से प्यारा, 

खेत रहा ये कैसी घात।

वीर अजेय महान कहे सब, 

कैसे  मन स्वीकारे बात।।२२।।


क्रोध उठा थर थर थर्राया, 

हाथ उठाली फिर करवाल।

नाम बतादो उस अधमी का,

काटूँगा जा उसका भाल।।२३।।


शांत रहें हे वीर शिरोमणि, 

साँझ समय है युद्ध विराम।

कल का सूरज रण में उतरें, 

रोकें तब तक अपना भाम।।२४।।


घायल नाहर विचलित घूमे, 

काल निशा कब होगी अंत।

घोर व्यथा आलोड़ित तन मन,

टीस उठाव हृदय अभ्यंत।।२५।।


जैसे तैसे रात बिताई, 

शस्त्र लिये निकला बलवीर।

सौ सौ टुकड़े कर डालूंगा,

रक्त बहा दूँ छाती चीर।।२६।।


चढ़ घोड़े पर एड लगाई, 

उड़ता सा पहुँचा रण क्षेत्र।

श्वास मचलती ज्वार सलिल सी,

लोहित से थे दोनों नेत्र।।२७।।


आँखें ढूंढ़ रही पृथ्वी को, 

खच खच काट रहा हर शीश।

कंठ प्रचंड सटाल दहाड़ा, 

ओट छुपा क्यों भीरु अधीश।।२८।।


दोहा:-

आल्हा थे भीषण कुपित, जैसे जलती आग।

सौ-सौ योद्धा मारते, रण भू खेले फाग।।१

कट कट चौहानी गिरे, पृथा हुई थी लाल।

हाथी हय चिंघाड़ते,जैसे घूमें काल।।२।।


सैन्य हुआ निर्बल सा हारा, 

रुक के ठहरी सारी सृष्टि।

ले हुंकार सुभट फिर आये, 

केशी जैसी क्रोधित दृष्टि।।२९।।


दो व्याघ्र समक्ष खड़े निर्भय, 

मार छलाँग प्रथम अब कौन।

सारी सेना निस्तब्ध रुकी, 

और दिशाएँ साधे मौन।।३०।।


भाई का हत्यारा सम्मुख, 

देख जली मन में फिर आग।

आल्हा तलवार उठा दौड़े, 

शत्रु दिखे ज्यों काला नाग।३१।।।


पृथ्वीराज सुभट थे योद्धा, 

तोल रहे बैरी की चाल।

ज्यों उछली आल्हा की काया, 

चौहानी चमकी करवाल।।३२।।


दोहा:-

तेज तान से दो सुभट, खेल रहे ज्यों खेल।

तड़ तड़ तलवारें तड़ित, रक्त रंग थे चेल।।


वार करे आपस में दोनों,

साथ सटकते सौ सौ वीर।

भारी थे दूजे पर योद्धा,

आँखों से भी चलते तीर।।३३।।


रक्त लुहान कलेवर दिखते,

लाल रतन से झूमे आज।

अपनी आन बड़ी दोनों को,

वर्तुल जैसे घूमे आज।।३४।।


और तभी सौ हाथी बल से

एक किया आल्हा ने वार।

हाथों से रजपूत सुभट के 

टूट गिरी भारी तलवार।।३५।।


हाथ उठा आल्हा का ऊपर

तेज प्रवाह उकट दे शीश

वाणी गूंजी ठहरो  बेटे

प्राण दया दो बन तुंगीश।।३६।।


गुरु वाणी सुन वीर रुका जब,

सम्मुख थे गुरु गोरखनाथ।

शूर क्षमा कर दो तुम इनको,

पृथ्वी चाहे पृथ्वी साथ।।३७।।


करने इनको काम बहुत से,

इनके हाथ धरा की लाज।

हो रजपूत सुभट तुम दोनों

देश हितार्थ करो बहु काज।।३८।।


नतमस्तक हो गुरु के आगे,

आल्हा ने फैंकी तलवार।

छोड़ चला वो फिर रण भू को,

त्याग दिया घर नृप संसार।।३९।।


आल्हा वीर अमर कहलाते,

उत्तर भारत में यश गान‌

गाँव नगर में गाथा उनकी,

राज्य महोबा के सम्मान।।४०।।


समापन दोहे:-

अमर हुए इतिहास में, बुंदेला के वीर ।

गाथा गाते भागता, जन जन-मन से भीर।।

आल्हा ऊदल पर किया, छंद वीर रस गान।

भूल चूक करिये क्षमा, अल्प ज्ञान है जान।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 27 May 2021

कांची काया मन अथीरा


 काची काया मन अथिरा



काची काया मन भी अथिरा ,

हींड़ चढा हीड़े जग सारा ।

दिखे सिर्फ थावर ये माया,

थिर थिर डोले है जग सारा ।


रोक हींड़ोला मध्य झाँका ,

अंदर ज्यादा ही कंपन था ।

बाहर गति मंथर हो चाहे,

मानस अस्थिर भूड़ोलन था ।


 गुप्त छुपी विधना की मनसा,

जान न पाये ये जग सारा ।

काची काया मन भी अथिरा ,

हींड़ चढा हींड़े जग सारा ।।


जलावर्त  में मकर फसी है,

चक्रवात में नभचर पाखी

मानव दोनों बीच घिरा है ,

जब तक जल न भये वो लाखी।


कहाँ देश को गमन सभी का ,

जान न पाये ये जग सारा ।

काची काया मन भी अथिरा ,

हींड़ चढा हींड़े जग सारा ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 25 May 2021

ताँका विधा में चाँद


 ताँका विधा में चाँद


चाँद का नूर

बहका-बहका सा

काली घटा से 

झांकता सकुचाया

मुखर चंद्रिकाएं।


 रजत रश्मि

चपल चंद्रिकाएं

श्यामल घटा

चीर कर अंधेरा

निकला कलानिधि।


ऐ चाँद तुम

बिंदी से चमकते

नभ के भाल 

झांकता गोरी मुख

ज्यों घूंघट आड़ से।


नूर यामा का

बहका-बहका सा

स्याह मेघों से 

निकला सकुचाया

चपल कलानिधि ।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 23 May 2021

मेरे मन की ओ कविता


 मेरे मन की ओ कविता।


काव्य सरस सा रचना चाहूँ

प्राची की तू बन सविता।

जाने कैसे हुई तिरोहित,

मेरे मन की ओ वनिता ।


भाव हृदय के मूक हुए हैं

सहचरी मेरी क्यों रुठी।

आज गगरिया छलका दो तुम

गीतों की लय भी टूटी।

टूटे पंखों कैसे लिख दूँ 

बना लेखनी वो कविता ।।


नंदन वन की भीनी सौरभ

मंजुषा में बंद ज्यों है।

काव्य क्षितिज भी सूना-सूना

वर्णछटा फीकी क्यों है।

झरने नीरव रुकी घटाएं

धीमी-धीमी है सरिता।।


अंतर लेख उतर कर नीचे

आज शल्यकी में ढ़ल जा।

ओ मेरे अंतस की गंगा

पावस ऋतु बन कर फल जा।

मंदिर का दीपक बन जलना

करे प्रार्थना ये विनिता।।


भाव सीपिज अवली में बाँधु

सुधा चुरा लूँ चँदा से।

चंचल किरणे रचूँ पत्र पर

करतब सीखूँ वृंदा से।

चटकी कलियाँ फूल खिला दूँ

पनधट बोध लिखूँ भविता।।


       कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 18 May 2021

पीले पत्तों सी परिणति


 पीले पत्ते सी परिणति


आलोड़ित है काल जगत का

थिर-थिर डोले त्रास भरे।

अविदित सी देखो यह विपदा 

कैसे कोई धीर धरे।।


इक हिण्ड़ोले सा ये जीवन

कभी इधर औ कभी उधर‌।

धक्का देता समय महाबलि

कांप उठे भू धरणीधर।

पीले पत्ते जैसी परिणति

संग हवा के दूर गिरे।।


खेल खेलती विधना औचक

मानव बन कंदुक लुढ़के

गर्व टूटके बिखरा ऐसा

इक दूजे का मुंह तके।

मोम बनी है पिघली पीड़ा

ठंडी होकर ओस झरे।।


एक घड़ी की नहीं चेतना

लोभ मोह में भटका है

खाली हाथों ही जाना है

दाम अर्थ क्यों अटका है

श्वासों में अटकी है उलझन

उर्जा प्राणायाम करे।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 14 May 2021

बन रहे मन तू चंदन वन


 बन रे मन तू चंदन वन

सौरभ का बन अंश-अंश।


कण-कण में सुगंध जिसके 

हवा-हवा महक जिसके

चढ़ भाल सजा नारायण के

पोर -पोर शीतल बनके।


बन रे मन तू चंदन वन।


भाव रहे निर्लिप्त सदा

मन वास करे नीलकंठ

नागपाश में हो जकड़े

सुवास रहे सदा आकंठ।


बन रे मन तू चंदन वन ।


मौसम ले जाय पात यदा

रूप भी न चित्तचोर सदा

पर तन की सुरभित आर्द्रता

पीयूष रहे बन साथ सदा।


बन रे मन तू चंदन वन ।


घिस-घिस खुशबू बन लहकूँ

हर जन का ताप संताप हरूँ 

तन मन से बन श्री खंड़ रहूँ 

दह राख बनूँ फिर भी महकूँ ।।


बन रे मन तू चंदन वन ।।


     कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 12 May 2021

निसर्ग का उलाहना


 निसर्ग का उलहाना


लगता पहिया तेज चलाकर

देना है कोई उलहाना

तुमने ही तो गूंथा होगा

इस उद्भव का ताना बाना ।।


थामे डोर संतुलन की फिर

जड़ जंगम को नाच नचाते 

आधिपत्य उद्गम पर तो क्यों

ऐसा  नित नित झोल रचाते  

काल चक्र निर्धारित करके

भूल चुके क्या याद दिलाना।


कैसी विपदा भू पर आई

चंहु ओर तांडव की छाया

पैसे वाले अर्थ चुकाकर

झेल रहे हैं अद्भुत माया

अरु निर्धन का हाल बुरा है

बनता रोज काल का दाना।।


कैसे हो विश्वास कर्म पर

एक साथ सब भुगत रहे हैं

ढ़ाल धर्म की  टूटी फूटी

मार काल विकराल सहे हैं

सुधा बांट दो अब धरणी पर

शिव को होगा गरल पिलाना।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Monday, 10 May 2021

अटल निश्चय


 अटल निश्चय


कालिमा से नित्य लड़ने

आग आलोकित जगाकर

रश्मियों की ओज से फिर 

जगमगायेगा चराचर।।


श्याम वर्णी मेघ वाहक

जल लिए दौड़े चले जब

बूंद पाकर  सृष्टि सजती

चक्र चलता है यही तब

बीज के हर अंकुरण में

आस जगती दुख भुलाकर।।


बांध कर के ज्ञान गठरी

कौन चल पाया जगत में

बांटने से जो बढ़े धन

सुज्ञ ने गाया जगत में

सुप्त मेधा की किवाड़ीं

सांकलें खोलो हिलाकर।।


कार्य हो आलस्य तजकर

और निश्चय हो अटल जब

रुक न सकता कारवां भी

दूर होते शूल भी तब

सूर्य शशि शिक्षित करें नित

दीप सबके हिय जलाकर।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 8 May 2021

माँ



माँ

जब भी कोई दुविधा आती

याद मुझे माँ की आये।


प्रथम पाठशाला जीवन की

नैतिकता का पाठ दिया।

सुसंस्कार भरकर जीवन में 

सुंदरता से गाठ लिया।

कंक्रीट राह पर चल पाएं

दुख में कभी न घबराये।।


वात्सल्य साथ में अनुशासन

सीख सदा हित की पाई।

हर गलती पर पास बिठाकर

प्यार भरी झिड़की खाई।

ऊंच नीच का भान कराती

घावों पर रखती फाये।।


अपने दुख का भान नही कभी

बच्चों का ही सुख देखा

कभी नही वो कष्ट दिखाती

न भाल चिंता की रेखा।

लिटा गोद में सिर सहलाती

थपकी दे लोरी गाये।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

Wednesday, 5 May 2021

विहान आयेगा


 विहान आयेगा।


रात हो कितनी भी काली

खो चुकी दिवा की लाली

समय पर भानु का उदभव 

रोकना उसको असंभव।।


हो  कभी  जो काल दुष्कर

बनना हो स्वयं धनुष्कर

विजय भी  मिलेगी निश्चित

पुनः सब होगा अधिष्ठित।।


क्यों क्लांत बैठे हार कर

उठ भाव में आवेश भर 

चमन उजड़ा कब रहेगा

हरित हो अंकुर खिलेगा।।


संग्राम है जीवन अगर 

लड़ना ही होगा मगर

जीत तक लड़ते रहेंगे

क्यों पराजय की कहेंगे।।


मनुज कभी रुकता नहीं

बाधाओं से झुकता नहीं

कल नई फिर नींव धरकर 

लायेगा खुशियाँ भरकर।।


       कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 1 May 2021

आई साँझ गुनगुनाती


 आई साँझ गुनगुनाती


वायु का संदेश आया 

झूम कर गाकर सुनाये

आ रहे हैं श्याम घन अब

भूमि की तृष्णा बुझाये।


गा रही है लो दिशाएँ

पाहुना सा कौन आया

व्योम बजती ढोलके जब

राग मेघों ने सुनाया

बाग में लतिका लहर कर

तरु शिखर को चूम आये।


भानु झांका श्याम पट से

एक बदरी छेड़ आई

बूँद बरसी स्वर्ण मुख पर

सात रंगी आभ छाई

साँझ फिर से गुनगुनाती

छाप खुशियों की बनाये।


दिन चला अवसान को अब

घंटियाँ मन्दिर बजी है

दीप जलते देहरी पर

आरती थाली सजी है

आज माता को बुलावा

पात कदली के सजाये।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 26 April 2021

किरणों का क्रंदन।


 किरणों का क्रदंन


तारों की चुनरी अब सिमटी

बीती रात सुहानी सी।

कलरव से नीरव सब टूटा

जुगनू द्युति खिसियानी सी।


ओढ़ा रेशम का पट सुंदर

सुख सपने में खोई थी

श्यामल खटिया चांदी बिछती

आलस बांधे सोई थी

चंचल किरणों का क्रदंन सुन

व्याकुल भोर पुरानी सी।।


प्राची मुख पर लाली उतरी

नीलाम्बर नीलम पहने

ओस कणों से मुख धोकर के

पौध पहनते हैं गहने 

चुगरमुगर कर चिड़िया चहकी

करती है अगवानी सी।।


वृक्ष विवर में घुग्घू सोते

 बातें जैसे ज्ञानी हो

दिन सोने में बीता फिर भी

साधु बने बकध्यानी हो

डींगें मारे ऐसे जैसे

कहते झूठ कहानी सी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 21 April 2021

आधुनिकता


 आधुनिकता


कितना पीसा कूटा लेकिन 

तेल बचा है राई में।

बहुओं में तो खोट भरी है

गुण दिखते बस जाई में।


हंस बने फिरते हैं कागा

जाने कितने पाप किये

सौ मुसटा गटक बिलाई

माला फेरे जाप किये

थैला जब रुपयों से भरता

खोट दिखाता पाई में।।


पछुवाँ आँधी में सब उड़ते

हवा मोल  जीवन सस्ता

बैग कांध पर अब लटकी है

गया तेल  लेने बस्ता

अचकन जामा छोड़ छाड़ कर 

दुल्हा सजता  टाई में।।


पर को धोखा देकर देखो

सीढ़ी एक बनाते हैं

बढ़ी चढ़ी बातों के लच्छे

रेशम बाँध सुनाते हैं

परिवर्तन की चकाचौंध ने

आज धकेला खाई में।


गुण ग्राही संस्कार तालिका

आज टँगी है खूटी पर

औषध के व्यापार बढे हैं

ताले जड़ते बूटी पर

सूरज डूबा क्षीर निधी में

साँझ घिरी कलझाई में।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' 


(सूरज प्रतीक है=सामर्थ्यवान का, क्षीर निधी= विलासिता का साँझ =आम व्यक्ति)

Sunday, 18 April 2021

विषधर


 विषधर


वीण लेकर ढूँढ़ते हैं

साँप विषधर भी सपेरे

नाग अब दिखते नहीं हैं

विष बुझे मानव घनेरे।


जोर तानाशाह दिखते

हर गली हर क्षेत्र भरके

पूँछ दाबे श्वान बैठा

कब हिलाए और सरके

काठ की नौका पुरानी

आज लहरों को उधेड़े।।


कौन तूती की सुने जब

बज रहे गहरे नगाड़े।

घोर विस्मय देख लो जी

कोढ़ को अब थूक झाड़े।

है मचा हड़कंप भारी

दूर है उगते सवेरे।।


डूबते हैं अब किनारे

नाव चढ़ कर यान बैठी

तारने का काम प्रभु का

आदमी की जात पैठी

हो भला सबका विधाता

राम धुन मन पर उकेरे।।


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Wednesday, 14 April 2021

नटनागर


 नटनागर


हे  जादूगर  हे  नट  नागर  कैसी मोहनी  डारे  तू,

मैं ग्वालन एक भोरी सीधी पहुँचो हुवो कलंदर तू।


बंसी धुन में कौन सो कामण मोरे मन को बाधें तू,

जग को कोई  काज न  सूझे मोरो चैन चुरायो तू।


मैं बस तूझको ही निहारूँ जग को खैवन हारो तू,

मैं बावरी  बंसी धुन की अपनी धुन में खोयो तू।


मैं  एक नारी  बेचारी  पशु  पाखिन को प्यारो तू,

काज छोड़ सब विधि आई एक नजर न डारे तू।


           कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'।

Saturday, 10 April 2021

औचक विनाश


 औचक विनाश


लुब्ध मधुकर आ गये हैं

ताल पंकज से भरे।

बोझ झुकती डालियों से

पुष्परस बहकर झरे।


मधु रसा वो कोकिला भी

गीत मधुरिम गा रही।

वात ने झुक कान कलि के

जो सुनी बातें कही।

स्वर्ण सा सूरज जगा है

धार आभूषण खरे।।


उर्मि की आलोड़ना से

तान तटनी पर छिड़ी।

कोड भरकर दौड़ती फिर

पत्थरों से जा भिड़ी।

भेक ठुमका ताल देकर

कीट इक मुख में धरे।।


भूमि चलिता रूप लेके

ड़ोलती धसती धरा

नाश होने को सभी कुछ

आज अचला भी चरा

बाँसुरी के राग उलझे

मूक सुर कम्पित डरे।।


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Thursday, 8 April 2021

उल्लाला छंद


 उल्लाला छंद 15/13


मानव ही सबसे श्रेष्ठ है, इस जगती की शान वो ।

यदि करता हो सतकर्म तो मानवता की आन वो।।


बंधन बांधो अब प्रेम के, मन में सुंदर भाव हो ।

जीवन को मानो युद्ध पर, जीने का भी चाव हो।।


लो होली आई रंग ले, बीता फाल्गुन मास भी ।

जी भरकर खेलो फाग सब, बाँधों मन में आस भी।।


गंगा सी निर्मल मन सरित, अनुरागी हो भावना।

सब के हिय में उल्लास हो, ऐसी मंजुल चाहना।।


जब उपवन करुणा का खिले, पावन होते योग हैं।

खिलती कलियाँ मन बाग में, मिटते सारे रोग हैं ।।


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Tuesday, 6 April 2021

गाँव पलायन बेटे


 गाँव से पलायन बेटे


फागुन के महीने में आम के पेड़ मंजरियों या "मौरों" से लद जाते हैं, जिनकी मीठी गंध से दिशाएँ भर जाती हैं । चैत के आरंभ में मौर झड़ने लग जाते हैं और 'सरसई' (सरसों के बराबर फल) दिखने लगते हैं । जब कच्चे फल बेर के बराबर हो जाते हैं, तब वे 'टिकोरे' कहलाते है । जब वे पूरे बढ़ जाते हैं और उनमें जाली पड़ने लगती है, तब उन्हे 'अंबिया' कहते हैं।

अंबिया पक कर आम जिसे रसाल कहते हैं।

                        ~ ~ ~


चंदन  सा बिखरा हवाओं में

मौरों की खुशबू है फिजाओं में

ये किसीके आने का संगीत है

या मौसम का रुनझुन गीत है।


मन की आस फिर जग गई  

नभ पर अनुगूँज  बिखर गई

होले से मदमाता शैशव आया

आम द्रुम सरसई से सरस आया ।


देखो टिकोरे से भर झूमी डालियाँ

कहने लगे सब खूब आयेगी अंबिया

रसाल की गांव मेंं होगी भरमार

इस बार मेले लगेंगे होगी बहार।


लौट आवो एक बार फिर घर द्वारे

सारा परिवार खड़ा है आँखें पसारे

चलो माना शहर में खुश हो तुम

पर बिन तुम्हारे यहाँ खुशियाँ हैं गुम।


           कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Saturday, 3 April 2021

समय पाहुना


 समय पाहुना


सुखद पल सलौने सपन तोड़ सोये।

लिखे छंद कोरे मसी में भिगोये।


घड़ी दो घड़ी मेघ काले भयानक

तड़ित रेख हिय पर गिरी है अचानक।

बहे कोर तक स्रोत उपधान धोये।।


सुना दर्द का मोल किसने न माना।

गई बात मुख से लुटा ज्यों खजाना।

कहीं ठेस खाकर गिरे पर न रोये।।


व्यथा की हवेली अड़ी सी खड़ी हैं।

खुशी की तिजोरी दुखों से जड़ी हैं।

समय पाहुना भी कई राह खोये।।


मचलती रही मीन जल उड़ चला था।

रहित जल नदी एक पोखर भला था।

गले रुंधते से दृगों ने छुपोये।।


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Friday, 2 April 2021

इल्ज़ाम ढ़ूढते हैं


 इल्ज़ाम ढूंढ़ते हो !


ये क्या कि पत्थरों के शहर में 

शीशे का आशियाना ढूंढ़ते हो!


आदमियत  का पता  तक  नही

गज़ब करते हो इन्सान ढूंढ़ते हो !


यहाँ पता नही किसी नियत का

ये क्या कि आप ईमान ढूंढ़ते हो !


आईनों में भी दगा भर गया यहाँ 

अब क्यों सही पहचान ढूंढ़ते हो !


घरौदें  रेत के बिखरने ही तो थे

तूफ़ानों पर क्यूँ इल्ज़ाम ढूंढ़ते हो !


जहाँ  बालपन भी  बुड्ढा  हो गया 

वहाँ मासुमियत की पनाह ढूंढ़ते हो !


भगवान अब महलों में सज़ के रह गये 

क्यों गलियों में उन्हें सरे आम ढूंढ़ते हो। 


              कुसुम कोठारी "प्रज्ञा "

Monday, 29 March 2021

बिना नाव का नाविक चंदा


 बिना नाव का नाविक चंदा


बालू कण सागर के तट पर

चाँदनी में झिलमिलाये।

और हवा के झोंकों से ये

पात कैसे सरसराये।


इस रजनी में कोई जादू

हृदय पपीहा बोल रहा

लहर पालने बैठा चंदा

धीरे धीरे डोल रहा

आती जाती सिंधु उर्मियाँ

तट छूने को लहराये।।


बिना नाव का नाविक चंदा

किरण हाथ चप्पू  थामा

छप छपाक कर तैर रहा वो

तन पर उजियारी जामा

उठते जब पानी में झूमर

 मोती जैसे बरसाये।।


उद्वेग सिंधु में उठा और

निशा कांत थर-थर डोला

भीगा कुर्ता भीगी चादर

भीगा किरणों का झोला

काला पानी उजली साड़ी

रेशम जैसे बलखाये।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 27 March 2021

होली पर कुंडलियाँ


 होली पर कुंडलियाँ


आया अब मधुमास है, बीत गया है शीत ।

होली मनभावन लगे, चंग बजाए मीत ।

चंग बजाए मीत, गीत मोहक से गाना ।

घर लौटे हैं कंत,  सजा है सुंदर बाना ।

जगा कुसुम अनुराग, प्रीत का उत्सव लाया ।

नाचो गाओ आज, रंग ले मौसम आया ।।


यादें

महके यादें फूल सी, सुरभित जीवन बाग ।

होली रंग गुलाल ज्यों, छाया मन में फाग ।

छाया मन में फाग, विगत बातें मधु रस थी ।

मुख पर लाती हास, रसा मकरंद   सरस थी ।

कुसुम बोध की शाख, पपीहा बैठा चहके।

खोल के रखूँ द्वार, याद का पौधा महके।।


आँचल

फहराता आँचल उड़े, मधु रस खेलो फाग ।

होली आई साजना,  आज सजाओ राग ।

आज सजाओ राग, कि नाचें सांझ सवेरा ।

बाजे चंग मृदंग, खुशी मन झूमे मेरा ।

रास रचाए श्याम, गली घूमे लहराता।

झुकी लाज सेआंख, पवन आँचल फहराता।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Thursday, 25 March 2021

फाग पर ताँका


 फाग पर ' ताँका 'विधा की रचनाएँ ~


१. आओ री सखी

       आतुर मधुमास

       आयो फागुन

       बृज में होरी आज

       अबीर भरी फाग। 


२. शाम का सूर्य 

       गगन पर फाग 

       बादल डोली 

      लो सजे चांद तारे

      चहका मन आज। 


३. उड़ी गुलाल 

       बैर भूलादे मन

       खेलो रे खेलो

       सुंदर मधुरस

       मनभावन फाग ।

             कुसुम कोठारी  'प्रज्ञा'


ताँका (短歌) जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य विधा है। इस विधा को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी के दौरान काफी प्रसिद्धि मिली। उस समय इसके विषय धार्मिक या दरबारी हुआ करते थे। हाइकु का उद्भव इसी से हुआ।


इसकी संरचना ५+७+५+७+७=३१ वर्णों की होती है।

Tuesday, 23 March 2021

चौपाई अष्टक।


 विधा चौपाई छंद


१चंदन वन महके महके से

पाखी सौरभ में बहके से

लिपट व्याल बैठे हैं घातक

चाँद आस में व्याकुल चातक।।


२रजनी आई धीरे धीरे

इंदु निशा का दामन चीरे

नभ पर सुंदर तारक दल है

निहारिका झरती पल पल है।।


३निशि गंधा से हवा महकती 

झिंगुर वाणी लगे चहकती

नाच रही उर्मिल उजियारी

खिली हुई है चंपा क्यारी ।।


४नवल मुकुल पादप पर झूमे

फूल फूल पर मधुकर घूमे।

कोयल बोल रही उपवन में

हरियाली छाई वन वन में ।।


५बागों में बहार मुस्काई

पुष्पों पर रंगत सी छाई।

सौरभ फैली हर इक कण में

भरलो झोली पावन क्षण में।


६शाख सुमन के हार पड़े हैं

माणिक मोती लाल जड़े हैं।

लो तितली आई मन भावन

फैले सुंदर दृश्य  लुभावन।।


७विषय मोह में उलझा प्राणी

कौन मिलेगा शीतल त्राणी

गलत राह पर बढ़ता आता

उर से कभी न लालच जाता।।


८पतन राह का जो अनुरागी 

तृष्णा की बस चाहत जागी

दहक रहा दावानल जैसा

शीतलता देता बस पैसा।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 21 March 2021

बहे समसि ऐसे


 बहे समसि ऐसे


आखर आखर जोड़े मनवा 

आज रचूँ फिर से कविता।

भाव तंरगी ऐसे बहती 

जैसे निर्बाधित सविता।


मानस मेरे रच दे सुंदर 

कुसमित कलियों का गुच्छा

तार तार ज्यों बुने जुलाहा 

जैसे रेशम का लच्छा

कल-कल धुन में ऐसे निकले

लहराती मधुरम सरिता।।


अरुणोदयी लालिमा रक्तिम 

अनुराग क्षितिज का प्यारा 

झरना जैसे झर झर बहता

शृंगार प्रकृति का न्यारा 

सारे अद्भुत रूप रचूँ मैं 

बहे वात प्रवाह ललिता ।


निशि गंधा की सौरभ लिख दूं 

भृंग का श्रुतिमधुर कलरव 

स्नेह नेह की गंगा बहती 

उपकारी का ज्यों आरव 

समसि रचे रचना अति पावन 

 रात दिन की चले चलिता।।


         कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 19 March 2021

मुनिया और गौरेया


 बाल कविता।

 

मुनिया और गौरेया


आँगन में नीम एक

देता छाँव घनेरी नेक

हवा संग डोलता

मीठी वाणी बोलता

गौरेया का वास

नीड़ था एक खास

चीं चपर की आती

ध्वनि मन भाती

हवा सरसराती 

निंबोलियाँ  बिखराती

मुनिया उठा लाती

बड़े चाव से खाती

कहती अम्मा सब अच्छे हैं

पर ये पंछी अक्ल के कच्चे हैं

देखो अनपढ़ लगते मोको

कहदो इधर उधर बीट न फेंको

सरपंच जी तक बात पहुंचा दें

इनके लिये शौचालय बनवा दें

अगर करे ये आना कानी

जहाँ तहाँ करे मन-मानी

साफ़ करो खुद लाओ पानी

तब इन्हें भी याद आयेगी नानी।


(मुनिया एक देहाती लड़की जो आंगन में झाड़ू लगाती है हर दिन।) 


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

विराट और प्रकृति


 विराट और प्रकृति।


ओ गगन के चँद्रमा , मैं शुभ्र ज्योत्सना तेरी हूँ ,

तू आकाश भाल विराजित, मैं धरा तक फैली हूँ।


ओ अक्षुण भास्कर, मै तेरी उज्ज्वल प्रभा हूँ ।

तू विस्तृत नभ आच्छादित, मैं तेरी प्रतिछाया हूँ।


ओ घटा के मेघ शयामल, मैं तेरी जल धार हूँ,

तू धरा की प्यास हर , मैं तेरा तृप्त अनुराग हूँ ।


ओ सागर अन्तर तल गहरे , मैं तेरा विस्तार हूँ,

तू घोर रोर प्रभंजन है, मैं तेरा अगाध उत्थान हूँ।


ओ मधुबन के हर सिंगार, मैं तेरा रंग गुलनार हूँ ,

तू मोहनी माया सा है, मैं निर्मल बासंती बयार हूँ।


             कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 16 March 2021

सतरंगी होली


 सतरंगी होली


नव बसंत नव मधुबन है

नया नया  ऋतुराज।

नव अंकुर को आस जगी है 

प्रस्फुटन की आज।।


नवल टेसू से पादप शोभित

सजने लगी रंग होली 

चंग झनक चौपाल बजे

थिरके मिल हमजोली।


नव्य सुमन मुस्कान लिए

फुनगी चढ़ बल खाये

मधुप रसी रस ढूंढ रहे

भर-भर लेकर जाये।


नव गुलाल अबीर बसंती

धानी वसना हुई धरा 

बहु रंगी शृंगार किए हैं 

लता गुल्म नव ओज भरा।


केसर रंग छलका नभ से

भर-भर रखो कटोरी

गुलनारी सौरभ तो जैसे

ले उड़ी नवल चटोरी।


जा रही है फाग खेलने

नव युवको की टोली

शुभ्र वसन कुमकुमी छींटे

पाग बँधी है मोली।


आज नवेली उड़ी चले

हाथ लिए पिचकारी

अंग रंगे गुलाबी आभा

सतरंगी रंग रंगी सारी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 14 March 2021


 धर्म क्या है मेरी दृष्टि में 


*धर्म* यानि जो धारण  करने योग्य हो

 क्या धारण किया जाय  सदाचार, संयम,

 सहअस्तित्व, सहिष्णुता, सद्भाव,आदि


धर्म इतना मूल्यवान है...,

कि उसकी आवश्यकता सिर्फ किसी समय विशेष के लिए ही नहीं होती, अपितु सदा-सर्वदा के लिए होती है ।

बस सही धारण किया जाय।


गीता का सुंदर  ज्ञान पार्थ की निराशा से अवतरित हुवा ।

कहते हैं कभी कभी घोर निराशा भी सृजन के द्वार खोलती है। अर्जुन की हताशा केशव के मुखारविंद से अटल सत्य बन

 करोड़ों शताब्दियों का अखंड सूत्र बन गई।


विपरीत परिस्थितियों में सही को धारण करो, यही धर्म है।

 चाहे वो कितना भी जटिल और दुखांत हो.....


पार्थ की हुंकार थम गई अपनो को देख,

बोले केशव चरणों में निज शीश धर

मुझे इस महापाप से मुक्ति दो हे माधव

कदाचित मैं एक बाण भी न चला पाउँगा ,

अपनो के लहू पर कैसे इतिहास रचाऊँगा,

संसार मेरी राज लोलुपता पर मुझे धिक्कारेगा

तब कृष्ण की वाणी से श्री गीता अवतरित हुई ।

कर्म और धर्म के मर्म का वो सार ,

युग युगान्तर तक  मानव का

मार्ग दर्शन करता रहेगा ।

आह्वान करेगा  जन्म भूमि का कर्ज चुकाने का

मां की रक्षा हित फिर देवी शक्ति रूप धरना होगा

केशव संग पार्थ बनना होगा ,

अधर्म के विरुद्ध धर्म युद्ध

लड़ना होगा।


               कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'



Thursday, 11 March 2021

प्राबल्य अगोचर



प्राबल्य अगोचर


सृष्टि निर्माण रहस्य भारी

अद्भुत दर्शन से संवाहित

रिक्त आधार अंतरिक्ष का

प्राबल्य अगोचर से वाहित।


सत्य शाश्वत शिव की सँरचना 

आलोकिक सी है गतिविधियाँ

छुपी हुई है हर इक कण में

अबूझ अनुपम अदीठ निधियाँ

ॐ निनाद में शून्य सनातन 

है ब्रह्माण्ड समस्त समाहित।। 


जड़ प्राण मन विज्ञान अविचल

उत्पति संहारक जड़ जंगम

अंतर्यामी कल्याणकार

प्रिय विष्णु महादेव संगम

अन्न जल फल वायु के दाता

रज रज उर्जा करे  प्रवाहित।।


आदिस्त्रोत काल महाकाल  

सर्व दृष्टा स्वरूपानंदा

रूद्र रूप तज सौम्य धरे तब

काटे भव बंधन का फंदा

ऋचाएं तव गाए दिशाएं

वंदन करें देव मनु माहित ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'



Wednesday, 10 March 2021

क्षणिकाएं


 तीन क्षणिकाएं


मन

मन क्या है एक द्वंद का भँवर है

मंथन अनंत बार एक से विचार है

भँवर उसी पानी को अथक घुमाता है

मन उन्हीं विचारों को अनवरत मथता है।


अंहकार 

अंहकार क्या है एक मादक नशा है

बार बार सेवन को उकसाता रहता है

 मादकता बार बार सर चढ बोलती है

अंहकार सर पे ताल ठोकता रहता है।


क्रोध 

क्रोध क्या है एक सुलगती अगन है

आग विनाश का प्रति रुप जब धरती है

जलाती आसपास और स्व का अस्तित्व है

क्रोध अपने से जुड़े सभी का दहन करता है।


                कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 7 March 2021

मधुमास


 मधुमास


मधुबन में मधुमास मगन है

रंग व्योम से बरसे

धरा ओढ़कर नवल चुनरियाँ 

पिया मिलन को तरसे।


बारिश बूँद मन मीत क्षिति का

कब सुध लेगा आकर 

पीले पात झरे शाखा से 

नवल कोंपलें  पाकर 

खेतों में अब सरसों फूली

मिंझर डाली निरसे।।


सुरभित मधुर वात आलोडित

पात नाचते खर खर 

जंगल में दावक से दिखते

सुपर्ण गिरते झर झर

शरद बीत बसंत की बेला

निसर्ग झूमे हरसे।।


पंकज दल आच्छादित सर में

ढाँक दिये पानी को

सिट्टे भी घूंघट से झांके

सहृदय ऋतु दानी को

बसंत है ऋतु ओं का राजा

चैत्र मास में सरसे ।।


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Thursday, 4 March 2021

निसर्ग महा दानी


 छंद मुक्त


निसर्ग महा दानी


ओ पंछी तू बैठ हथेली 

चुगले दाना पानी

आज सुनाऊं मैं तुझ को

मन की एक कहानी।


तुम कितने नाजुक सुंदर हो

खुश आजाद परिंदे

अपने मन का खाते पीते

उड़ते रहते नभ में

अमोल कोष लुटाता रहता

है निसर्ग महा दानी।।


ओ पंछी तू बैठ हथेली 

चुगले दाना पानी।


नही फिक्र न चिंता करते

नीड़ कभी जो रौंदा

तिनका-तिनका जोड़ बनाते 

फिर एक नया घरौंदा

करते रहते कठिन परिश्रम

तुम सा मिला न ध्यानी।।


ओ पंछी तू बैठ हथेली 

चुगले दाना पानी।


आज चाहिए उतना लेते 

संग्रह कभी न करते

प्रसन्न मन कलरव करते

चिंता मुक्त चहकते

सब कुछ जग में है नश्वर

एक बात तूने जानी।।


ओ पंछी तू बैठ हथेली 

चुगले दाना पानी।


काश मनु भी तुम से 

सीख कोई ले पाता

चारों ओर अमन रहता

गीत खुशी के गाता

प्रीत चुनरिया फिर लहराती 

रंग धरा का धानी।।


ओ पंछी तू बैठ हथेली 

चुगले दाना पानी।


न दंगा न बलवा होता

लूटपाट न डाका

न कोई शासित होता

सब अपने अपने राजा

बैठ बजाते चैन बांसुरी

हठी न कोई होता मानी।।


ओ पंछी तू बैठ हथेली 

चुगले दाना पानी।


लेकिन ऐसा नही है प्यारे

राग द्वेष से भरा ज़माना

चहुं दिशा अफरातफरी है

नही शांति का ताना बाना

सब कुछ छोड़ जगत से जाना

क्यों न समझे अज्ञानी।।


ओ पंछी तू बैठ हथेली 

चुगले दाना पानी।


चल उड़ जा नील गगन में

संदेश अमन का गा तू

मधुर-मधुर अपनी तानों से

प्रेम सुधा बरसा तू

सरस सुकोमल भाव तुम्हारे

समता रस के ज्ञानी।।


ओ पंछी तू बैठ हथेली 

चुगले दाना पानी।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Wednesday, 3 March 2021

किंशुक दहके


 विज्ञात योग छंद आधारित गीत।


किंशुक दहके ।


महके चंदन वन  

बंसत आया

लो सौरभ फैला 

सब को भाया।।


ऋतु हर्षित हर पल 

फैली आभा

पाया अनंत सुख 

बरसे शोभा   

भाव रखो मुखरित 

उत्तम काया ।।


रात ढ़ली काली 

पाखी चहके

जंगल में देखो 

किंशुक दहके 

आलस अब भागा 

मन इतराया।।


शंख ध्वनि गूंजी 

मंदिर जागे 

वट पर भक्तों ने 

बांधे धागे 

हर ओर खुशी है 

प्रभु की माया।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'