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Monday, 25 October 2021

पीड़ा कैसे लिखूँ


 पीड़ा कैसे लिखूँ


पीड़ा कैसे लिखूँ

दृग से बह जाती है,

समझे कोई न मगर

कुछ तो ये कह जाती है,

तो फिर हास लिखूँ,

परिहास लिखूँ,

नहीं कैसे जलते

उपवन पर रोटी सेकूँ।

मानवता रो रही, 

मैं हास का दम कैसे भरूँ,

करूणा ही लिख दूँ,

बिलखते भाग्य पर

अपनी संवेदना, 

पर कैसे कोई मरहम

होगा मेरी कविता से,

कैसे पेट भरेगा भूख का,

कैसे तन को स्वच्छ 

वसन पहनाएगी 

मेरी लेखनी।

क्या लू से जलते 

की छाँव बनेगी

मेरी कविता।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 22 October 2021

'कह मुकरी छंद' कुसुम की शतक मुकरियाँ


 1)बालों में सोना सा चमके

दान्त पाँत मोती सी दमके

सबको करता हक्का-बक्का

हे सखि साजन? ना सखि मक्का।।


2)खिला-खिला सा वो मुस्काए

मेरे उर को सदा लुभाए।

उसको देखूँ खिलता है मन

हे सखि साजन ? ना सखि उपवन।।


3)बाँह लचीली सुंदर काठी 

कभी हाथ की बनता लाठी

हाथों में रखता वो झंडा 

हे सखि साजन? ना सखि डंडा ।।


4)बातें उसकी है मन भाती

दूर देश से लिखता पाती

आया वो गोदी में लेटा 

हे सखि साजन ? ना सखि बेटा।।


5)सुंदर रूप सुकोमल काया

मन मेरा उसमें भरमाया

देखूँ उसे न चलता जोर 

हे सखि साजन? ना सखि मोर।।


6)श्याम वर्ण वो मन को भाये

चले फिरे वो मुझे लुभाये

शोभा उसकी मोहे तन-मन 

हे सखि साजन? ना सखि वो घन।।


7)कैसी किस्मत लेकर आया

कहते हैं सब शीश चढ़ाया।

उसके बिन जीवन है फीका

हे सखि साजन ? ना सखि टीका।।


8)चढ़ता नाक वार त्योहारी  

छेड़-छाड़ करता हर नारी

कैसे कह दूँ उसकी करनी

हे सखि साजन ? ना सखि नथनी।।


9)मन मोहक सुंदर है काया

देखा उसको मन हर्षाया

साथ सदा वो जाता मेला

हे सखि साजन? ना सखि झेला।।


10)दिखता है जो उत्तम न्यारा

सखियों को भी लगता प्यारा।

मूल्यवान वो घर का है धन

हे सखि साजन? ना सखि कंगन।।


11)आगे पीछे डोले झूमें

मुख मोड़ू तो वो भी घूमें

साथ लगाता है वो ठुमका

क्या सखि साजन? ना सखि झुमका।।


12)मिश्री जैसे बोल सुहाने

 एक नहीं वो मारे ताने

बिगड़े तो चीखें ज्यों कुरली

क्या सखि साजन? ना सखि मुरली।।

कुरली=बाज


13)थपकी दे कर जिसे जगाती

शोर करें तो उसे भगाती

मेरे बिन ना उस का मोल

क्या सखि साजन? ना सखि ढोल।।


14)बाँहो में उसको जब भरती 

मीठी-मीठी बातें करती

उमड़े उस पर नेह अपार

हे सखि साजन? न सखि सितार।।


15)कद का छोटा वेश छबीला

बातों में भी है रंगीला

दुनिया से वो बिल्कुल न्यारा

क्या सखि साजन? ना इकतारा।।


16)बल खाता लहराता ऐंठा

चलते चलते बनता ठेंठा।

कई बार बिगड़ा वो आड़ू

क्या सखि साजन? ना सखि झाड़ू।। 


17)डूबकी लेकर बाहर आता

आँगन में फिर लोट लगाता

डोले पहने वो अंगौछा 

क्या सखि साजन? ना सखि पौंछा।।


18))हाथ पकड़ कर खूब नचाऊँ

उसके बिना न रोटी खाऊँ

बार-बार करता वो कट्टी

क्या सखि साजन? ना सखि घट्टी।।


19)रूप सजीला है मन भावन

कभी नहीं होती है अनबन

गले लिपट वो लगता लोना

हे सखि साजन? ना सखि सोना।।


20)गोल मोल पर लगता प्यारा 

 रंग रूप में सबसे न्यारा

 नेह सूत में उसे पिरोती

 क्या सखि साजन?ना सखि मोती।।


21)काला है पर मुझको भाए

साथ सदा खुशहाली लाए

देह लचीली भागे फर-फर

हे सखि साजन? ना सखि जलधर।।


22)प्रेम लुटाए भरा-भरा तन

मोद मुकुल हो जाता मन

देखूँ उसको खड़ी-खड़ी

हे सखि साजन? ना मेघ झड़ी।।


23)गुस्सा ज्यादा चाल है तेज

श्वेत वसन श्यामल है सेज

बदले झट वो जैसे त्रिया

हे सखि साजन? ना घनप्रिया।।


घनप्रिया=बिजली


24)आँख निकाले मुझे सताए

रोद्र रूप कर मुझे डराए

भर दे वो काया में कँपा

हे सखि साजन? ना सखि शँपा।।


शँपा =दामिनी, बिजली।


25)कभी-कभी वो रोष करे जब

घुडकी ऐसी हृदय डरे तब

छुपकर उससे  बैठूँ अंदर

क्या सखि साजन? ना सखि बंदर।।


26)करती हूँ मन से मैं पूजा

उसके जैसा है ना दूजा

वो ही है जीवन का आगर

हे सखि साजन? ना सखि नागर।


27)सिर पर उसको धारण करती

साथ लिए मंदिर पग धरती

शुभता की वो है रंगोली

हे सखि साजन? ना सखि रोली।।


28)हाथ पकड़ उसका मैं रखती

उसके बिना कभी ना रहती

नहीं लगाती उस को पौली

हे सखि साज? ना सखि मौली ।।


पौली  =पगथली, पाँव का नीचे का हिस्सा


29)गोरा तन पानी नहलाती

सोता वो हरियाली पाती

निखरे वो होकर के जूना

क्या सखि साजन? ना सखि चूना।।


30)हरदम ही वो दबकर रहता

मनमानी जो कभी न करता

आदर से पाँवों को छूता

क्या सखि साजन? ना सखि जूता।।


31)जीने का आश्रय है मेरा

जो जीवन मे भरे उजेरा

वो तो है श्वांसों का संबल

हे सखी साजन? ना सखी जल।।


32)नहीं पास तो जी घबराए

चाहत उसकी मन भरमाए

वही आधार वही  है आयु

क्या सखी साजन? न सखी वायु।।


33)अंदर बाहर उसकी पारी

दौड़ भाग लगती है भारी

है सुकुमार वो वन में काँस

हे सखी साजन? न सखी साँस।।


34)सभी भोज में उसे बुलाते

दीन धनी सब प्यार जताते

सखी सब पूछे उसकी जात

क्या वो साजन? ना सखी भात।।


35)दूर भेज कर अंतस रोता

कई बार धीरज भी खोता

कभी उसे मैं भूल न पाई

हे सखि साजन ? ना सखि जाई।।


36)कभी न करता आनाकानी

बात मेरी सदा ही मानी

कान मरोड़ू देता वो फल

क्या सखी साजन? ना सखी नल।।


37)उसकी तो है बात निराली

सौरभ उसकी है मतवाली 

मंजुल से राँगा वो दे भर

क्या सखि साजन? ना सखि केसर।।


38)शीश चढ़ा कर उसको रखती

बड़े प्यार से उस सँग रहती

खरा कभी लगता वो खोटा

क्या सखि साजन ? ना सखि गोटा।।


39)पेट दिखाता इतना मोटा

पर समझो मत मन का खोटा

नहीं कभी वो करता सौदा

क्या सखि साजन? ना सखि हौदा।।


40)दोनों बीच सदा ही पटपट

सभी बात पर होती खटपट

इसी बात से होता घाटा

सखि साजन? ना बेलन पाटा।।


41) कौर तोड़ कर मुझे खिलाता

पानी शरबत दूध पिलाता

करता काम सभी वो सर-सर

क्या सखि साजन? ना सखि ये कर।।


42)हाथ पाँव फैला कर सोता

चूक गया तो बाजी खोता

जीत सदा उसकी वो नौसर

क्या सखि साजन? ना सखि चौसर।।

नौसर =चतुर या चतुराई



43) बातेंं करता गोल मोल सी

कभी सुरीली कभी पोल सी

हठी बड़ा पर मन का सच्चा

क्या सखि बाजा? ना सखि बच्चा।।


44)देखूँ उसको मन ललचाता

पाहूनों में धाक जमाता

प्यारा वो ज्यों सच्चा हीरा

क्या सखि साजन? ना सखि सीरा।।


45) शीत वात में सेवा करता

नव जीवन की आशा भरता

उसको देखे भागे जाड़ा

क्या सखि कंबल? ना सखि काढ़ा।। 


46)सदा शाम खिड़की पर आता

रूप बदल कर मुझे डराता

कभी-कभी दिखता है वो यम

क्या सखि उल्लू? ना सखि वो तम।।


47)चमक दिखाता कुछ ना देता

बातों की बस नावें खेता

उसका तो देखा बस टोटा

क्या सखि नेता? ना सखि कोटा।।


48)उसका जाल कठिन है भारी

खींच करें मारन की त्यारी

दुष्ट बड़ी है उसकी हलचल

क्या सखि डाकू? ना सखि दलदल।।


49)सुंदर निखरा कण-कण न्यारा

रूप सँवारा कितना प्यारा

 करता वो शोभित है खंड 

क्या सखी फूल?न सखी मंड ।।


मंड=सजावट, आभूषण।


50)वो मतवाला चोरी करता

 जीभ चटोरी रस से भरता

डोले घूमें वो भू श्रृंग

क्या सखी ठग?ना सखी भृंग।। 


51)दुनिया में उसकी ही पूजा

 सखा नहीं सम उसके दूजा

उसका मान करें है ध्यानी

क्या सखी देव ?न सखी ज्ञानी।।


52)शीश चढ़ा है खूब नचाया

जाने क्या-क्या उसने खाया

घातक वो जैसे परमाणु

क्या सखि गंधक?न सखि विषाणु।।


53)तन का मोटा कोमल है मन

उसको आदर देता जन-जन

शोभा पाते उससे द्रुम दल

क्या सखि केला? ना सखि श्री फल।।


54)सारी रतिया पीता पानी

चमक दमक देता है दानी

तन पर फैली घोर कारिखी

क्या सखी चंदा? न सखी शिखी।

शिखी=दीपक


55)ये तो तन को खूब सजाते

नये नये रंगों में आते

ठंड ताप बदले ये अस्त्र

क्या सखि चादर? ना सखि वस्त्र।।


56)छोटे बड़े सभी को भाता

तन पर  सजता मान दिलाता

कभी-कभी हरता वो धीर

क्या सखि गहना? ना सखि चीर।।


57)भरी नदी पानी से खाली

हरी मगर सूखी है डाली

 वो यात्रा में बनता मित्र

हे सखि पोथी? न मानचित्र।।


58)पूंछ उठाके मारा धक्का

बुक्का फाड़े रोया कक्का

 मुख से भरता वो तो छागल

हे सखि बैल ? न सखि चापाकल ।। 


59)सब के मन को खुश कर जाता

रूप देख निज का इतराता

अभिमानी वो बनता जेठा

क्या सखि मालिक? ना सखि पेठा।।


60)शीश चढ़े मन में इतराता

हवा लगे हिल-हिल वो जाता 

जल बरसा उसको दूँ खप्पर

क्या सखि पादप? ना सखि छप्पर।।


61)छोटा दिखता है सुखकारी

घर में उसकी महिमा न्यारी

उसे लगा लो काटो खीरा

क्या सखी नमक? न सखी जीरा।।


62)गुड़-गुड़ गुड-गुड़  दौड़ लगाता

हवा लगे तो हाथ न आता

 उपवासी को लगे सुहाना

हे सखि कोदो ? न साबुदाना।। 


63)सुंदर सा वो ढेर लगाता

घर से सारा मैल भगाता

चमका लाता दे दूँ जोभी

क्या सखि चाकर? ना सखि धोबी।।


64)जबसे वो है मुझ से रूठी

उसकी तो किस्मत ही फूटी

कहाँ कहाँ से काटी फाड़ी

क्या सखि दैनिकी? न सखि साड़ी।।


65)शीश चढ़े इतरा वो बैठी

चमक दिखा झिलमिल सी ऐंठी

कभी सजाती भरभर अँगुली

क्या सखि लाली ? ना सखि टिकुली।।


66)सुंदर शोभित हो डोल रही

मन के तारों को खोल रही

उसको हवा दिलाती है भय

क्या सखी लौ? ना सखी किसलय।।


67) ढलते सूरज नभ पर छाती

नहीं मगर वो मन को भाती

डस लेती है सदा लालिमा

ऐ सखि संध्या? न सखि कालिमा।।


68)मन पर उतरी कितनी गहरी

सुबह शाम रहती बन लहरी

गूँजे अंतस बन के नाद

ऐ सखि छाया? ना सखि याद।।


69)जब आता हड़कंप मचाता

जाने क्या-क्या वो खा जाता

भागे सब करते हैं तोलन

क्या सखि चूहा ? न सखि भूडोलन।।


70)शीश ऊपर पाँव है तीजा

और कलेजा मेरा सीजा

बड़े प्यार से मुझे परोसा

क्या सखि खाजा? नहीं समोसा।।


71)चोर सरीखा वो तो आता 

खाना पीना चट कर जाता

चढ़ जा बैठे वो तो पूषक

क्या सखि कौवा ? ना सखि मूषक।।

पूषक=शहतूत का पेड़


72)चाँद रात में बिखर रही है

धरा गिरी सब निखर रही है

उससे तो आलोकित विषमा

ऐ सखि चाँदनी? न सखि सुषमा।।

विषमा =झरबेरी

सुषमा=सौंदर्य


73)मैंने खाई उसने खाई

ना जाने किस किसने खाई

बन बैठी वो सबकी माई

क्या सखि सौगंध? ना दवाई।।


74)रंग सुनहरा खूब लुभाता

वो तो सबके ही मन भाता

उससे खुश हैं छोरी-छोरा

ऐ सखि साजन? ना सखि धोरा।।


75)श्याम वरण पर कितना न्यारा

रूप अनोखा है अति प्यारा

उसको छूती खनके चूड़ा

ऐ सखि साजन? ना सखि जूड़ा


76)पशु पाखी आनंद मनाते

रस उद्यान भोज का पाते

दूर-दूर तक फैला विरण्य

ऐ सखि सिंधु तट? न सखि अरण्य।।

विरण्य=विस्तार


 77)एक रूप लेकर घर आये

लगता जैसे हो माँ जाये

इक बिना दूजा है निष्प्राण

ऐ सखि जुड़वाँ? ना पदत्राण।।


पदत्राण=खड़ाऊ

 

78)मृदुल नरम है उसका छूना

शीत बढ़ाता है वो दूना

रूप बदलता है वो हर क्षण

ऐ सखि झोंका? ना सखि हिमकण।।


79)तेज चाल से घात करे वो

फिर बैरी को मात करे वो

उछला जैसे कोई शावक

ऐ सखि गोली? ना सखि नावक।।


80)कभी रक्षक कभी वो लाठी

लम्बी पतली है कद काठी 

हलवाई के कर ज्यों करछा

ऐ सखि चाकू? ना सखि बरछा।।


81)खुशियाँ लेकर ही घर आती

बच्चें बड़े सभी को भाती

वो तो है बस मीठी गोली

सखि मीठाई ? न सखि ठिठौली।।


82)आँखें लाल जटा है सिर पर

सौ जाता वो भू पे गिर कर

रात जगे पर करें न चोरी

ऐ सखि अक्खड़ ? न सखि अघोरी।।


83)दोनों मिलकर के सँग रहते

इक दूजे को मन की कहते

साँझा रखते सब सम्पत्ति

ऐ सखि सखा? न सखि दम्पत्ति।।


84)रहूँ अकेली मुझे डराता

राम नाम का जाप कराता

कर ना जाए कोई तर्जन

ऐ सखि पनघट? ना सखि निर्जन।।


85)लगे बहुत वो प्यारा-प्यारा

कोमल सुंदर न्यारा-न्यारा

देखूँ जब भी खुश होते दृग

ऐ सखि बेटा? ना सखि वो मृग।।


86)तेज गति से दौड़ा जाता

जाकर फिर जल्दी घर आता

सिर पर बाँधी उसने खोही

सखि शिकारी? न सखि आरोही।।


87)राग छेड़कर मोहित करती 

कानों में ज्यों मिश्री भरती

सुबह उठूँ करती फिर गुनणा

ऐ सखि कोयल?ना सखि वीणा।


88)बहुत जरूरी इसको जाने

इस को ही बस जीवन माने

दुखी रहे जो होता अपचय

ऐ सखि विद्या? ना सखि संचय।।

अपचय=खर्च


89)साथी सँग मिल खूब टहलता

खाता पिता और बहलता

सिर से चलता है वो मोटा

ऐ सखि झाड़ू ? ना सखि घोटा।।


90)भान भुलता निज का थोड़ा

जाने कैसा नाता जोड़ा

मझधार पड़ी है अब बोहित

ऐ सखि पगला? ना सखि मोहित।।

बोहित=नाव


91)इधर उधर में उसको बाँटा

तेरा मेरा टक्कर काँटा

बार-बार देता है झाला

ऐ सखि केरम? ना सखि पाला।।


पाला=खेल में दो पक्षों का निर्धारित क्षेत्र।


92)चिमनी चढ़ के बैठी भोली

मुँह चिढ़ाती कुछ नहीं बोली

देखे उसको गर्वित उजली

हे सखि धुँधला ना सखि कजली।।


93)रंग मनोरम आंखों भाता

जीवन भर उससे है नाता

बड़े काम आता वो दानी

ऐ सखि साजन?ना सखि धानी।।


94)मन को बस में करने वाली

लाल नहीं है ना वो काली

लेकर आती काले धुरवा

ऐ सखि बरखा ? ना सखि पुरवा।।


95)वो तो जग में सबसे प्यारी

महक रही ज्यों केसर क्यारी

मोह बाँधती कैसी ठगिनी

ऐ सखि बेटी ? ना सखि भगिनी।।


96)बहुत जरूरी है ये भाई

लेकर के  सौगातें आई

इसके बिन तो मांगों भिक्षा

ऐ सखि दौलत?ना सखि शिक्षा।।


97)हठी बड़ा कब माने कहना

चाहे जो हो सब कुछ सहना

मान्य उसे पड़ जाए मरना

हे सखि अगुआ ? ना सखि धरना।।


98)अरब करोड़ों की हैं बातें

कितनी ही होती है घातें

इसको ना करना अनदेखा

ऐ सखी धन? ना सखी लेखा।।


99)गोल-मोल माटी पर लोटा

कद उसका तो होता मोटा

ठंडा जैसे गोंद कतीरा

ऐ सखि कद्दू ? सखी मतीरा।।


100)चार खूंट में कसकर बाँधा

कई बार चढ़ता है काँधा

भार उठा कर उसको तोला 

ऐ सखि खटिया ? ना सखि डोला।।


101) मधुर भरा रस मीठी लगती।

डाल-डाल मोती सी सजती। 

भर-कर लाई एक झपोली।

ऐ सखि बेरी? न सखि निबोली।।

कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


Thursday, 21 October 2021

कह बतियाँ

कह बतियाँ


चल सखी ले घट पनघट चलें 

राह कठिन बातों में निकले।


अपने मन की कह दूँ कुछ तो

कुछ सुनलूँ तुमसे भी घर की

साजन जब से परदेश गये

परछाई सी रहती डर की

कुछ न सुहाता है उन के बिन

विरह प्रेम की बस हूक जले।।


अब कुछ भी रस नहीं लुभाते

बिन कंत पकवान भी फीके

कजरा गजरा मन से उतरे

न श्रृंगार लगे मुझे नीके

रैन दिवस नैना ये बरसते

श्याम हुवे कपोल भी उजले।।


कहो सखी अब अपनी कह दो

अपने व्याकुल मन की बोलो

क्या मेरी सुन दृग हैं छलके

अंतर रहस्य तुम भी खोलो

खाई चोट हृदय पर गहरी

या फिर कोई विष वाण चले।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Monday, 18 October 2021

कह मुकरी ...... सहेलियों की पहेलियां ..... कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


                
        

                     शीश चढ़ा कर उसको रखती
                     बड़े प्यार से उस सँग रहती
                    खरा कभी लगता वो खोटा
              क्या सखि साजन? ना सखि गोटा।।
                       कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'
 
                                   👩‍❤️‍👩

                         पेट दिखाता इतना मोटा
                     पर समझो मत मन का खोटा
                      नही कभी वो करता सौदा
                  क्या सखि साजन?ना सखि हौदा।।
                         कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

                                    👩‍❤️‍👩


                       दोनों बीच सदा ही पटपट
                       सभी बात पर होती खटपट
                         इसी बात से होता घाटा
                      सखि साजन?ना बेलन पाटा।।
                            कुसुम कोठारी ' प्रज्ञा '

                                   👩‍❤️‍👩

                    ग्रास तोड़ कर मुझे खिलाता
                      पानी शरबत दूध पिलाता
                    करता काम सभी वो सर-सर
                क्या सखी साजन? ना सखी कर।।
                        कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

                                   👩‍❤️‍👩

                      हाथ पाँव फैला कर सोता
                       चूक गया तो बाजी खोता
                     जीत सदा उसकी वो नौसर
             क्या सखि साजन? ना सखि चौसर।।
                    ( नौसर =चतुर या चतुराई )
                         कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'
                        
                                  👩‍❤️‍💋‍👩👩‍❤️‍👨👩‍❤️‍💋‍👩








Saturday, 16 October 2021

कह मुकरी छंद


 कह मुकरी

1)शीश चढ़ा कर उसको रखती

बड़े प्यार से उस सँग रहती

खरा कभी लगता वो खोटा

क्या सखि साजन? ना सखि गोटा।।


2)पेट दिखाता इतना मोटा

पर समझो मत मन का खोटा

नहीं कभी वो करता सौदा

क्या सखि साजन?ना सखि हौदा।।


3)दोनों बीच सदा ही पटपट

सभी बात पर होती खटपट

इसी बात से होता घाटा

सखि साजन?ना बेलन पाटा।।


4) ग्रास तोड़ कर मुझे खिलाता

पानी शरबत दूध पिलाता

करता काम सभी वो सर-सर

क्या सखी साजन? ना सखी कर।।


5)हाथ पाँव फैला कर सोता

चूक गया तो बाजी खोता

जीत सदा उसकी वो नौसर

क्या सखि साजन? ना सखि चौसर।।

नौसर =चतुर या चतुराई


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 13 October 2021

कवि और सृजन


 कवि और सृजन


जब मधुर आह्लाद से भर

कोकिला के गीत चहके

शुष्क वन के अंत पट पर

रक्त किंशुक लक्ष दहके।


कल्पना की ड़ोर थामें

कवि हवा में चित्र भरता

लेखनी से फूट कर फिर

चासनी का मेघ झरता

व्यंजना के पुष्प दल पर 

चंचरिक सा चित्त बहके।।


जब सुगंधित से अलंकृत

छंद लय बध साज बजते

झिलमिलाते रेशमी से

उर्मियों के राग सजते

सोत बहते रागनी के

पंच सुर के पात लहके।।


वास चंदन की सुकोमल

तूलिका में ड़ाल लेता

रंग धनुषी सात लेकर

टाट को भी रंग देता

शब्द धारण कर वसन नव

ठाठ से नभ भाल महके।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 8 October 2021

अविरल अनुराग


 अविरल अनुराग।


नेह स्नेह की गागरिया में

सुधा लहर सा बहता जाऊँ

खिले प्रीत फुलवारी सुंदर

गीत मधुर से आज सुनाऊँ।


हरित धरा तुम सरसी-सरसी

मैं अविरल सा अनुराग बनूँ

कल-कल बहती धारा है तू

मैं निर्झर उद्गम शैल बनूँ

कभी घटा में कभी जटा में

मनहर तेरी छवि को पाऊँ।।


महका-महका चंदन पीला

सिलबट्टे पर घिसता जाता ‌

तेरे भाल सजा जो घिसकर 

अंतस पुलकित हो लहराता

दीपक की ज्योति तू उज्जवल

मैं बाती बनकर लहराऊँ।।


सूरज की हेमांगी किरणें

वसुधरा को ज्यों रंग जाती 

तमसा के प्रांगण को जैसे

चंदा की चंदनिया भाती

नीली सी  चुनरी फहराना

मैं टिमटिम तारा बन जाऊँ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 4 October 2021

खण्डित वीणा

खण्डित वीणा


क्लांत हो कर पथिक बैठा

नाव खड़ी मझधारे 

चंचल लहर आस घायल

किस विध पार उतारे।


अर्क नील कुँड से निकला

पंख विहग नभ खोले

मीन विचलित जोगिणी सी

तृषित सिंधु में डोले

क्या उस घर लेकर जाए

भ्रमित घूम घट खारे।।


डाँग डगमग चाल मंथर

घटा मेघ मंडित है

हृदय बीन जरजर टूटी

साज सभी खंडित है 

श्रृंग दुर्गम राह रोकते

संग न साथ सहारे।।


खंडित बीणा स्वर टूटा

राग सरस कब गाया

भांड मृदा भरभर काया

ठेस लगे बिखराया 

मूक हुआ है मन सागर

शब्द लुप्त हैं सारे ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा '।

 

Saturday, 2 October 2021

लाल


 लाल


देह छोटी बान ऊंची

वस्त्र खद्दर डाल के

हल सदा देते रहे वो

शत्रुओं की चाल के।


भाव थे उज्ज्वल सदा ही

देश का सम्मान भी

सादगी की मूर्त थे जो

और ऊंची आन भी

आज  गौरव गान गूँजे

भारती के लाल के।


थे कृषक सैना हितैषी

दीन जन के मीत थे

कर्म की पोथी पढ़ाई

प्रीत उनके गीत थे

पाक को दे पाठ छोड़ा

मान भारत भाल के।।


वो धरा के वीर बेटे

त्याग ही सर्वस्व था

बोल थे संकल्प जैसे

देश हित वर्चस्व था

फिर अचानक वो बने थे 

ग्रास निष्ठुर काल के।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 30 September 2021

आज नया इक गीत लिखूँ


 आज नया इक गीत लिखूँ


गूँथ-गूँथ शब्दों की माला 

आज नया इक गीत लिखूँ मैं।।


वीणा का जो तार न झनके 

सरगम की धुन पंचम गाएँ

मन का कोई साज न खनके

नया मधुर सा राग सजाएँ

कुछ खग के कलरव मीठे से

पीहू का संगीत लिखूँ मैं।।


हीर कणों से शोभित अम्बर

ज्यों सागर में दीपक जलते

टिम-टिम करती निहारिकाएं

क्षितिज रेख जा सपने पलते

चंद्रिका से ढकी वसुंधरा

चंद्र प्रभा की प्रीत लिखूं मैं।।


मिहिका से अब निकल गया मन

धूप सुहानी निकल रही है

चटकन लागी चंद्र मल्लिका

नव दुल्हन का रूप मही है

मुखरित हो संगीत भोर का

तम पर रवि की जीत लिखूं मैं।।


             कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

Friday, 24 September 2021

स्मृति पटल पर गाँव

स्मृति पटल पर गाँव 


बैठ कर मन बाग मीठी 

मोरनी गाने लगी है 

हर पुरानी बात फिर से 

याद अब आने लगी है।।


कर्म पथ बढ़ते रहे थे 

छोड़ आये सब यहाँ हम 

बात अब लगती अनूठी 

सोच में अभिवृद्धि थी कम 

स्मृति पटल पर गाँव की वो

फिर गली छाने लगी है।।


भ्रान्ति में उलझे शहर के 

त्याग सात्विक ग्राम जीवन 

यूँ भटकते ही चले फिर 

सी रहे हर जून सीवन 

कैद छूटी बुलबुलें फिर

उड़ वहाँ जाने लगी है।।


कोड़ियों से खेल रचते 

धूल में तन थे महकते 

पाँव में चप्पल न जूते 

दौड़ते बेसुध चहकते 

डूबकर कब रंग गागर  

फाग लहराने लगी है।।


 कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

 

Wednesday, 22 September 2021

निज पर विश्वास

निज पर विश्वास


निजता का सम्मान

निराशा में जिसने खोया।

राही भटका राह

निशा तम में घिरकर सोया।।


रे चेतन ये सोच

जगत में तू उत्तम कर्ता

पर जो खेले खेल 

वही तो होता है भर्ता

भावों का विश्वास 

जहाँ भी टूटा वो रोया।


निज भीतर की शक्ति

अरे जानो तोलो झांको

अज्ञानी मृग कौन

तुम्हीं सृष्टा हो मन आंको

जागेगा अब भाग

विवेकी का दाना बोया।।


दृष्टा बनके देख

अजा का अद्भुत है लेखा

जिसने लेली सीख

बदल ली हाथों की रेखा

उलझा रेशम छोड़

बटे तृण में मोती पोया।।


अजा=प्रकृति


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Saturday, 18 September 2021

नीरव मुखरित


 

नीरव मुखरित


खिलते उपवन पात

महक मकरंदी बहजाती।

फूलों की रस गंध

सखे अलि को लिखती पाती।


शोभा कैसी आज 

धरा ओढ़े चुनरी धानी

मधुमासी है वात

जलाशय कंचन सा पानी

मोहक रूपा काल

बहे नदिया भी बलखाती।।


चंचल मन के भाव

झनक स्वर में बोले पायल 

सुन श्यामा की राग

पपीहा होता है घायल 

मधुरिम  झीना हाथ

हवा धीरे से सहलाती।।


छेड़े मन के राग

सुरों की मुरली बहकी सी

नीरव तोड़े मौन

पुहुप की डाली महकी सी।

घर के पीछे बड़बेर

सुना बेरों से बतियाती।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 16 September 2021

अवसरवादी


 अवसरवादी


अवसर का सोपान बना कर 

समय काल का लाभ लिया। 

रीति नीति की बातें थोथी 

निज के हित का घूँट पिया।


कौन सोचता है औरों की 

अपना ही सिट्टा सेके 

झुठी सौगंध तक खा जाते 

हाथों गंगाजल लेके 

गूदड़ कर्मों की अति भारी 

जाने क्या-क्या पाप सिया।।


क्या होता तो दिखता क्या है 

भरम यवनिका डाल रहे 

लाठी वाले भैंस नापते 

निर्बल अत्याचार सहे 

दूध फटे का मोल लगाया 

ऐसा भी व्यापार किया।। 


पोल ढोल की छुपी रहे है 

लगती जब तक चोट नही  

खुल जाये तो बात बदल दे 

जैसे कोई खोट नहीं 

फटे हुए पर खोल चढ़ाकर 

अनृत आवरण बाँध दिया।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 14 September 2021

उपेक्षिता


एक दिवस हिन्दी लगे, गंगा जल का पान।

सच्चे मन से आँकिए, कहाँ है इसकी आन।।


 उपेक्षिता


देव नागरी भाषा उत्तम

गुणी जनो ने भी गुण गाया।

अनंत शब्द भंडार सुशोभित

अलंकार से निखरी काया।


विविध रंग की रंगोली में

शुभ्र वर्ण लेकर खिलती है

अभ्यागत को गले लगा कर

सागर में गंगा मिलती है

संस्कृत ने जो पौधा सींचा

उस हिन्दी की शीतल छाया।।


दो अक्षर भी भाव समेटे

सौम्य सुघड़ सुंदर गहरे

विश्व कोष में और कौनसी 

भाषा इसके आगे ठहरे 

आंग्ल मोहिनी पाश फसा जन

निजता छोड़ झूठ भरमाया।।

 

दाँव घात में ऐसे उलझी

शैशव से न तरुण हो पाई

प्राची उगते बाल सूर्य पर

काल घटा गहरी लहराई 

देव वंशजा भाषा मंजुल

पूरा मान कहाँ कब पाया।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Saturday, 11 September 2021

स्वयं पर शासन


 

स्वयं पर शासन


निज पर जो शासन करते हैं

क्षुद्र भाव का करते सारण

शुभ्र गुणों को विकसित करते

जिससे सुरभित होते भू कण।


आदर्शों को रखें सँभाले

मणियों जैसे अमूल्य विचार

परंपरा में देते जग को

मंजु शुद्ध समदृष्टि आचार

किंचित लेश मात्र भी विचलित

दृश्य नहीं जो करते धारण।।


स्वार्थ त्याग की करे तपस्या  

राग द्वेष औ माया तजकर 

पुरुषार्थ का करते संकल्प 

आत्मानंद मार्ग में रमकर 

ऐसी संत स्वभावी आत्मा

सभी दुखो का करे निवारण।।


साम्यभाव हो दृष्टिपथ जिनका

परहित अर्पित भाव उच्चतम

वसुधा पर प्रकाश फैलाते 

विदेही युगवीर पुरुषोत्तम

बंधन से वे मुक्त सदा जो

निस्पृहता का करे आचरण।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 7 September 2021

श्याम मोहिनी


 श्याम मोहिनी


रजत चाँद की निर्मल आभा

लो लहर पलक पर लहरी हैं ।


वो झांक रहे हैं इधर उधर

टिमटिम कर अंबक मटकाते

नीलाम्बर की बाहों में घिर

मणिकांत मणी से मनभाते

दौड़ धूप से क्लांत शिथिल अब

निर्निमेष आँखें ठहरी है।।


रजनी कर श्रृंगार निकलती

रुनझुन पायल झनकाती

श्याम मोहिनी वो सुकुमारी

नीले कंगन खनकाती

भ्रमण करे जब निशा सुंदरी

तारक दल जैसे पहरी है।।


अलंकार नित नव घड़वाती

रंग रूप उजला सा भरने 

पर जब तक उजली वो होती 

काल नवल सा लगता झरने

जब चलती है धीरे लगता

चाल चले कोई गहरी है।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 5 September 2021

श्वास रहित है तन पिंजर


 श्वास रहित है तन पिंजर 


तड़प मीन की मन मेरे 

श्याम नही अंतर जाने 

गोकुल छोड़़ जावन कहे

बात नेह की कब माने।


अमर लतिका स्नेह लिपटी

छिटक दूर क्यों कर जाए।

बिना मूल मैं तरु पसरी

जान कहाँ फिर बच पाए।


श्वास रहित है तन पिंजर 

साथ सखी देती ताने।

तड़प मीन की मन मेरे 

श्याम नही अंतर जाने ।।


बिना चाँद चातक तरसे

रात रात जगता रहता

टूट टूट मन इक तारा

सिसक सिसक आहें भरता।


कौन सुने खर जग सारा।

बात बात देता ताने।

तड़प मीन की मन मेरे 

श्याम नही अंतर जाने ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 1 September 2021

कल्पना और कल्पक


 नवगीत मेरा।

कल्पना और कल्पक


कुछ छुपे अध्याय भी है

कह रही है रात ढलती।

क्यों तमस की कालिमा में

भोर की है आस पलती।


नील आँगन खेलते हैं

ऋक्ष अंबक टिमटिमाते

क्षीर की मंदाकिनी में

स्नान  करके झिलमिलाते

चन्द्र भभका आग जैसे

चाँदनी दिखती पिघलती।।


कल्पना कविता बने तो

क्या नहीं कुछ हो सकेगा

सूर्य भी करवट बदलता

रात शय्या सो सकेगा

स्वर्ण काया पर सुनहरी 

धूप की बाँहें मचलती ।।


औघड़ी है रात रानी

जाग के सौरभ लुटाती 

भोर लाली टोहती तो

स्वागतम पाँखें बिछाती

देह से आभूषणों को

ज्यों विरह में वो अहलती ।।


अहलती =हिलना.


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 30 August 2021

कृष्ण कहाँ है!


कृष्ण कहाँ है!

जन्म दिवस तो नंद लाल का

हम हर वर्ष मनाते है।

पर वो निष्ठुर यशोदानंदन

कहाँ धरा पर आते हैं।

भार बढ़ा है अब धरणी का

पाप कर्म इतराते हैं।

वसुधा अब वैध्व्य भोगती

कहाँ सूनी माँग सजाते हैं।

कण-कण विष घुलता जाता

संस्कार बैठ लजाते हैं।

गिरावट की सीमा टूटी

अधर्म की पौध उगाते हैं।

विश्वास बदलता जाए छल में

धोखे की धूनी जलाते हैं।

मान अपमान की बेड़ी टूटी 

लाज छोड़ भरमाते हैं।

नैतिकता और सदाचार का

फूटा ढ़ोल बजाते हैं।

शरम हया के गहने को

बीते युग की बात बताते हैं।

चीर द्रोपदी का अब छोटा

दामोदर कहां बढ़ाते हैं।

काम बहुत ही टेढ़ा अब तो

भरे सभी के खाते हैं।

स्वार्थ लोलुपता ऐसी फैली

भूले रिश्ते और नाते हैं।

ढोंग फरेब का जाल बिछा 

झुठी भक्ति जतलाते हैं।

मँच चढ़े और हाथ में माइक

शान में बस इठलाते हैं।

तृषित है जग सारा अब तो

दर्द की चरखी काते है।

आ जाओ करूणानिधि

हम  हाथ जोड़ बुलाते हैं ।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Sunday, 29 August 2021

नंद बाबा घर बधाई

नंद बाबा घर बधाई।


बाबा नंद घर आनंद बधाई 

माँ यशोदा विलसत न अघाई ।

नलकुबर सो  श्याम  सलौनो 

आज जन्म  लियो सुखदाई ।

अवनि अंबर डोल गयो ,

जगदीश पधारे बन बालाई ।

दसों दिशाऐं नौबत बाजे 

गोकुल बाजे  शंख  सुहाई ।

इंद्र वरूण घन घोरा गरजत

मन ही मन  हरषाई ।

कुबेर निज भंडार खोल्यो

भर भर रत्न राशि बरसाई‌।

मंगल गावे थाल सजावे

नाचे लोग ,बच्चन,  लुगाई ‌।

रेशम डोर स्वर्ण की ड़ंड़ी

रत्न जड़ित ध्वजा फहराई।

छोटो सो झुलनो ड़ारो

झुले कृष्ण  कन्हाई ।

ऐसो भाग्य जग्यो धरा को 

जन जन मन हरखाई ।


       कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 25 August 2021

मौसम में मधुमासी

मौसम में मधुमासी


रिमझिम बूँदों की बारातें

मौसम में मधुमासी जागी।

मलय संग पुरवाई लहरी

जलती तपन धरा की भागी।


धानी चुनर पीत फुलवारी

धरा हुई रसवंती क्यारी।

जगा मिलन अनुराग रसा के

नाही धोई दिखती न्यारी‌।

अंकुर फूट रहे नव कोमल

पादप-पादप कोयल रागी।।


कादम्बिनी पर सौदामिनी

दमक बिखेरे दौड़ रही है।

लगी लगन दोनों में भारी

हार जीत की होड़ रही है।

वसुधा गोदी बाल खेलते

छपक नाद अति मोहक लागी।।


बाग सजा है रंग बिरंगा 

जैसे सजधज खड़ी कामिनी।

श्वेत पुष्प रसराज लगे ज्यों

लता छोर से पटी दामिनी।

कली छोड़ शैशव लहकाई

श्यामल मधुप हुआ है बागी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Monday, 23 August 2021

रजनी


 रजनी


चंदा चमका भाल पर,रजनी शोभित आज।

पूनम के आलोक में,मुख पर लाली लाज।।

मुख पर लाली लाज,चुनर है तारों वाली।

लगे सलौनी रात,कहें क्यों उसको काली।

कुसुम कहे मन भाव, जगत का कैसा फंदा।

क्यों पखवारा एक, चमकता सुंदर चंदा।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Friday, 20 August 2021

तुलसी मानस और साधक


 दुर्मिल सवैया

तुलसी मानस और साधक।


नव अच्युत जन्म लिये जग में, गुरु संत करे अभिनंदन हो।

तुलसी कर से अवतीर्ण हुई, जन मानस भजता छंदन हो।

यह पावन राम कथा जग में, भव बंध निवारण वंदन हो।

घट राम विराज रहे जिन के, उनका महके पथ चंदन हो।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 17 August 2021

बंधन कैसा


 बंधन बंधन क्यों करे, मन के सारे बंध।

आत्म सुधारो हे गुणी, तोड़ मोह के फंद।।

तोड़ मोह के फंद, लगन रख प्रभु  में भाई।

सँवरे दिन भी आज, पटे भव भव की खाई।।

कहे कुसुम सुन बात, रहेगा जीवन गंधन।

इधर उधर मत झांक, लगा ले प्रभु से बंधन।।


गंधन-सोना

कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 14 August 2021

तिरंगे की शान में


 स्वतंत्रता दिवस की अनंत शुभकामनाएं।


तिरंगे की शान में


अब न वादे सिर्फ होंगे

जीत की आशा फलेगी।

ठान ले हर देश वासी

रात तब गहरी ढलेगी।


लाखों की बलिवेदी पर

तिरंगे का इतिहास है।

खोये कितने ही सपूत 

जाकर मिला ये हास है।

फिर दिलों में शान से

इक प्रेम होली जलेगी।


मर्म तक कोई न भेदे  

अब भी समय है हाथ में।

हर दिशा में शत्रु फैले

कर सामना मिल साथ में।

आजादी की कीमत जब

हर एक जन में पलेगी।


दुष्कर करदो जीना अब

जो अमन को घायल करे।

जीना वो जीना जानों

हित देश के जीये मरे ।

ध्वज तिरंगा हाथ लेकर,

इक हवा फिर से चलेगी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 13 August 2021

मेरा देश मेरा सम्मान

स्वतंत्रता दिवस के पूर्व।


मेरा देश मेरा सम्मान।


हर इक वासी के अंतर मन

देश प्रेम अभिमान बने।

ऐसी ज्योत जगे अंतस में

मातृ भूमि का मान बने।


वीरों की यह जननी पावन

ये गौरव है संतों का 

उपनिषदों का ज्ञान अनूठा

वेद पुरातन पंतों का 

शीश झुका सौगंध उठाएँ

नित प्रसस्ति गान बने।।


प्रण प्राण समर्पित जीवन हो

माँ तेरे शुभ चरणों में

कैसे मैं यश गान करूं

स्वल्प ज्ञान कुछ वर्णों में

नैतिकता आदर्श हमारे

भारत की पहचान बने ।।


हुतात्माओं का बलिदान 

जीवन में प्रत्यक्ष रखें ।

स्वार्थ त्यागकर निज प्राणों का

तत्वादर्श समक्ष रखें

विश्व गुरु बन जग में थाती

ऐसा शुभ वरदान बने।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Wednesday, 11 August 2021

सवैया छंद की छटा


 सवैया छंद, छन्दों का एक प्रमुख प्रचलित रूप है। यह चार चरणों का समपाद वर्ण छंद है। वर्णिक छंदों में २२ से २६ अक्षर के चरण वाले  छन्दों को सामूहिक रूप से हिन्दी में सवैया कहने की परम्परा है। इस प्रकार ये सामान्य छंदो से बड़े होते हैं इसलिए सवैया कहलाते हैं। इन में  वर्ण की मात्रा के साथ एक निश्चित माप दण्डों का पालन भी आवश्यक होता है ,यानि लघु और गुरु भी अपने निर्धारित स्थानों पर ही होते हैं। इन में प्रायः गणों की आवृत्ति होती , साथ ही अलग अलग सवैया  आरंभ या अंत में एक दो वर्ण बढ़ा कर बने होते हैं ।


यहाँ मैं अपने कुछ स्वरचित सवैया उदाहरण स्वरूप दे रही हूँ।


*(महाभुजंगप्रयात सवैया* 

मापनी-

१२२  १२२  १२२  १२२,

१२२  १२२  १२२  १२२.

१२/१२वर्ण पर यति।


१)माँ शारदे को समर्पित

सुनो शारदे हाथ आशीष का दो, लिखूँ छंद उत्कृष्ट हे मातृ अत्या।

कृपा आप की पावनी मात मेरी, भगा दो अविद्या तुम्ही आदि  नित्या।

रहे भाव भी उच्च भाषा सलौनी, कहे आज प्रज्ञा बनूँ दास भृत्या।

जले ज्ञान बाती उजाला नया हो, तुम्ही श्रीप्रदा हो तुम्ही रूप सत्या।।


२)कहो कान्हा

कहें क्या अरे ओ मुरारी सुनोजी, तुम्हारे बिना तो थकी श्वास डोले।

गये छोड़ के धाम प्यारा तुम्हारा, यशोदा कहे लाल क्यों प्राण तोले।

कहे गोपियाँ मित्र नैना भिगोते, बसी श्वांस आशा तुम्ही को टटोले।

नहीं सूर्यजा तान कोई सुनाए,  तटों पे अभी बाँसुरी भी न बोले।।


३(कामिनी

लगा बाल में पुष्प गोपी चली है, बड़ी मोहिनी चाल वो झूम गाये।

झुके लाज से नैत्र जो लोग देखे, हुई ओज से लाल बाला लुभाये।

हँसे दंत मोती उजाला समेटे, लगे भोर तारा समाधी रचाये।

कुएँ जा रही सोहिनी गौर वर्णी, भरे गागरी कामिनी नीर लाये।।


४(स्वार्थी

यहाँ एक ही भाव में कौन होता, सदा ही जहाँ लोग संकल्प तोड़े।

करे ज्ञानियों की अवज्ञा हमेशा, चलाते सभी क्षोभ के तेज कोड़े।

रखें नाम मिथ्या रचे रूप झूठे, गया काल तत्काल ही बात मोड़े।

जहाँ स्वार्थ का झूठ का बोलबाला, सरे काज नाता उन्हीं साथ जोड़े।


*सुखी सवैया* 

मापनी:-

११२ ११२ ११२ ११२, 

११२ ११२ ११२ ११२ ११.

१२,१४ वर्ण पर यति।


१)गणपति जी को समर्पित

अवनीश हरो सब विघ्न सदा, नव छंद रचूँ कर मैं पद वंदन।

सिर हाथ रखो तुम भीत भगे, रख लाज सदा प्रभु नाथ निरंजन।

तब शब्द रचूँ जब हे वरदा, भर दो मम काव्य सुधा वन नंदन।

सुख सौरभ से महके महके, करती सब काज तुम्ही मन  छंदन।।


२)ऋतुराज

ऋतुराज बसंत लगा सजनी, महि शोभित है करके अब नाहन।

भँवरा फिरता मधु चोर यहाँ, अँखुआ सकुचा सिमटा मन भावन।

पिक बोल लगे रस कान पड़े, हर ओर धरा लगती छवि सावन।

चल धाम चलें शुभ भाव लिए, स्तुति कीर्ति करें प्रभु की अति पावन।।


३)जीवन निस्सार

अब काम नहीं मन भावन है, कुछ काम करें बस बैठ अनंतर।

सबकी तरणी डिगती चलती, हर ओर यहाँ पर और दिगंतर।

सच झूठ नहीं कुछ भाण रहा, न भले शठ का दिखता अब अंतर।

करना फिर एक गवेषण हो, उपचार मिले बस ढूँढ धनंतर।।


दिगंतर=दिशाओं के बीच

धनंतर=धन्वन्तरि,वैद्य


४)किरणें

नभ भाल सुशोभित चाँद हँसे, किरणें करती वसुधा पर नर्तन।

जल केलि करें विहँसे सरसे, चपला करती तटनी घर नर्तन।

जब चाँद उगे सुलभा करती, पग पायल बांध चराचर नर्तन।

नग शीश चढ़े उतरे रमती, लगता करती प्रभु के दर नर्तन।।


५)तनया

रमती हँसती तनया घर में, लगती कितनी सुंदर मनभावन।

वनिता जिस आलय गौरव हो, सजता महका रहता घर पावन।

जग में सुचिता शुभता वरती, निशि वासर ही करती वह धावन।

निजता हर ठौर प्रमाणित है, फिर क्यों जग में नित का यह दावन।


*सुंदरी सवैया* 

मापनी-

११२ ११२ ११२ ११२,

११२ ११२ ११२ ११२ २.

१२/१३वर्ण पर यति।


१)गुरु देव को समर्पित

कथनी करनी सब एक रखे, सुर सी बहती रस धार बहे है।

हर शिष्य करे बस मान सदा, उनके नयनों अनुराग गहे है

करते सब का पथ दर्शन भी, जिनने हर बोल सु बोल कहे है।

गुरु संजय जी शुभ नाम यही, सुन के सब के हिय अज्ञ दहे है।।


२)ऋतु सावन

ऋतु सावन रंग हरी वसुधा, मन भावन फूल खिले सरसे है।

जल भार भरी ठहरी बदली, अब शोर करे फिर वो बरसे है।

जब बूंद गिरे धरणी पर तो, हर एक यहाँ मनई हरसे है।

बिन पावस मौसम सूख रहे, हर ओर बियावन सा तरसे है।।


३)छंदशाला 

यह आलय सुंदर ज्ञान धरा, नित सीख रहे नव छंद विधाएं ।

लिखते सब प्रीत यहां बहती, रहते मिल के रहती शुभताएं ।

नव ज्ञान सुगंध भरे सब को, मनसा नित बोधित को अपनाएं

स्वरपूरित लेखन मान मिले, मन हर्ष भरा सब ही सुख पाएं।।


४)अवतार

जब भी जगती पर पाप बढ़े, सुनते अवतार लिये तुम आये।

पुरुषर्षभ ने रण अस्त्र रखे, तब श्रीमुख से उपदेश सुनाये।

युग बीत गये गुण गान करे, भगवद् रस भौतिक विश्व सुहाये।

सुनते अब क्यों न पुकार कहो, मुख मोड़ लिया जब भक्त बुलाये।।


५)माधव

मनमोहन माधव मोहक हे, मुरली मधु मोह रही मन मेरा।

बजती सजती यमुना तट पे, रहता सब गोपन का सह डेरा।

पशु खैचर मोहित हैं सब ही, हिय बाँध दिया हरि नेह घनेरा।

सब भ्रांति विभूषित नाच रहे, अवलोकित मुंजुल आनन तेरा ।।


 *मदिरा सवैया:-* 

मापनी २११ २११ २११ २,

११ २११ २११ २११ २.

१०'१२वर्णो पर यति।


१)पनिहारिन

चाल चले मदरी मदरी, भर नीर चली गगरी खनके।

नार नई बनती ठनती, पथ पाँव रखे झँझरी झनके।

साथ सखी सरसी हरषी, खुल भेद रहे तन के मन के।

कंत बसे परदेश अभी, नित याद करे चुड़ियाँ खनके।।


२)मन मोहन

मोह लियो मन मोहन को, ललना दिखती निखरी निखरी।

वो वृषभानु सुता तन की, उजली सरसी मन नेह भरी।

ताक रहे मुरली धर भी, लब रेख रखे मधु हास धरी।

बादल छा कर के गहरे, बरसे नभ से रस बूंद झरी।।


 *सुमुखि सवैया* 

१२१ १२१ १२१ १२,

१ १२१ १२१ १२१ १२.

११,१२वर्णों पर यति.


१)भोर

विभोर हुआ तन मोद उठा, अब नाच मयूर रहा मन से।

प्रवाल खिला नभ सूर्य प्रभा, निकली सुषमा चमकी छन से।

प्रभात जगा तज माद चला, खनकी चुड़ियाँ कर से खन से।।

प्रशांत प्रवात चले मदरी, लट खेल रही अब आनन से।।


२)विवेक

विवेक रखें मन साफ रहे, अरु भाव रहे उजले उजले।

सुमित्र रहे जब साथ सदा, यश भी मिलता सब काज फले।

प्रभात लिए नव आस उठें, मन मंजुल सा अनुराग पले।

प्रशांत रहें मन प्रीत जगे, जग से भय भीत निराश टले।।


 *मत्तगयंद सवैया* 

२११ २११ २११ २११,

२११ २११ २११ २२.

१२,११ वर्णो पर यति।


१) कवि जातक

स्वांत सुखाय लिखे कवि जातक, खोल रहे निज मानस ताला।

बाधित क्यों फिर लेखन हो मन, भाव खिले नव अंकुर माला।

साथ लिखों सब छंद मनोहर, सुंदर शोभित हो हर द्वाला।

विज्ञ बनें यह चाव रहे फिर, सोम बनों बरसो बन ज्वाला।।


२)पावस के रंग

आज सुधा बरसे नभ से जब, भू सरसी महके तन उर्वी।

खूब भली लगती यह मारुत, धीर धरे चलती जब पूर्वी।

रोर करे घन घोर मचे जब,भीषण नीरद होकर गर्वी।

कश्यप के सुत झांक रहे जब, कोण चढ़े चमके नभ मुर्वी।।


३)प्रीति

राघव प्रीति विभूषित होकर, जूठन खा शबरी सुख पाते

लक्ष्मन के मन भाव असुंदर, लेकिन अग्रज मान दिखाते।

आँख झुका कर थाम लिये सब, हाथ धरे फिर दूर हटाते।

बोल अबोल रहे रघुनंदन, चाव लिए बस जूठन खाते।।


४)कल्पक

सुंदर गीत रचो मन भावन, भाव बहे सरिता पय जैसे।

निर्झर पावन धार निरंतर, गंग बहे जस निर्मल ऐसे।

कल्पक का रस धर्म रहे अरु, वाचक मुग्ध रहे पढ़ तैसे।

भाव नहीं जिनके मन सुंदर, स्वाद बिना कविता फिर कैसे।।


 *दुर्मिल सवैया* 

११२ ११२ ११२ ११२, 

११२ ११२ ११२ ११२.

१२,१२ वर्ण पर यति।


१)राम वन गमन 

निकले गृह से कुछ दूर चले, रघुराय चले बनवास लिये।

पग साथ धरे सुकुमार वधू, निज नाथ लखे प्रिय दृष्टि दिये।

सिर पे छलकी कुछ बूँद दिखे, पिय के दृग प्रश्न अपार किये।

फिर मौन रही झुक आँख गई, प्रतिकाश बनी बस ठान हिये।।


२)जमुना तट

खट जाग उठी मन में रुक के, जब पायल बैरन बोल गई।

पग धीर धरे चलती रुकती, जमुना तट आकर डोल गई।

अब श्याम नही दिखते सखि री, मन भेद सभी वह खोल गई।

दिखता हरि रंग सदा मुझ को, दृग बंद रखे सब तोल गई।।


३)सरसी वसुधा

अब देख सुधा बरसी नभसे, टप बूँद गिरी धरती पट पे।

सरसी वसुधा हरषाय रही, इक बूँद लगी लतिका लट पे।

झक चादर भीग भई कजरी, रमती सखियाँ जमुना तट पे।

अरु श्याम सखा मुरली बजती, तब गोपन दृष्टि लगी घट पे।।


४)भव सागर

भव सागर नाव फसी गहरी, अब लाज रखो तुम ही प्रहरी।

सुख दु:ख अधार लिया गुरु का, अब जीवन आस तुम्हार धरी।

करते तुम से विनती प्रभुजी, हरलो जग से रजनी गहरी।

तुम दीनदयाल यही महिमा, पत राख सुनो अब बात खरी।।


५) कोमल भावना

कलियाँ महकी उड़ सौरभ भी, इत वात चली अरु दूर भगी।

महका फिर चार दिशा अचरा, मन भीतर मोहक लग्न लगी।

हर ओर जगा कल राग सखी, जब भोर भई इक चाह जगी।

शिव रूप धरे सब मानुष तो, धरती बन जाय नवेल नगी।।


६)ऋतु का सौंदर्य

घन घोर घटा बरसे नभ से, चँहु ओर तड़ाग भरे जल से।

चमके बिजली मन भी डरपे, सरसे जल ताप हरे थल से।

मन मोहक ये ऋतु मोह गई, घन ले पवमान उड़ा छल से।

अब फूट गई नव कोंपल भी, झुक डाल गई लदके फल से।।


७)मन भावन

ऋतु सावन रंग हरी वसुधा, मन भावन फूल खिले सरसे।

जल भार भरी ठहरी बदली, अब शोर करे फिर वो बरसे।

जब बूंद गिरे धरणी पर तो, हर एक यहाँ मनई हरसे।

बिन पावस मौसम सूख रहे, हर ओर बियावन सा तरसे।।


 *किरीट सवैया* 

मापनी

२११ २११ २११ २११

२११ २११ २११ २११.

१२/१२वर्ण पर यति।


१)भंगुर

ये जग भंगुर जान अरे मनु, नित्य जपो सुख नाम निरंजन।

नाम जपे भव बंधन खंडित, दूर हटे  चहुँ ओर प्रभंजन।

अंतस को रख स्वच्छ अरे नर, शुद्ध करें शुभता मन मंजन।।

उत्तम भाव भरे नित पावन, सुंदर से दृग शोभित अंजन।।


२)महि का रूप

मंजुल रूप अनूप रचे महि, मोहित देख छटा अब सावन।

बाग तड़ाग सभी जल पूरित, पावस आज सखी मन भावन।

मंगल है शिव नाम जपो शुभ, मास सुहावन है अति पावन ।

वारि चढ़े सब रोग मिटे फिर, साधु कहे तन दाहक धावन।।


३)माँ की आराधना

छंद किरीट रचूँ मन भावन ,माँ तुम दो सिर हाथ सदा जब।

गीत लिखूँ गुणगान करूँ नित, जाप जपूँ मन अस्थिर हो तब।

भक्ति करूँ पग वंदन देकर, स्त्रोत लिखूँ शुभ भाव जगे सब।

चामर फूल करूँ निशिवासर, ज्ञान भरो मति विस्तृत में अब।।


४)रवि का अवसान

डूब रहा रवि पुष्कर सागर, मद्धम नील लगे अब अम्बर ।

लोहित रेख पड़ी नभ आँगन, लौट चले खग भी अपने घर।

चाँद खड़ा क्यों धीर धरे अब, आसन डाल रहा तब आकर।

निर्मल आभ जगे उजली फिर मोहित सा हर ओर चराचर।।


*गंगोदक सवैया*

मापनी:-

२१२ २१२ २१२ २१२,

 २१२ २१२ २१२ २१२.

१२,१२वर्ण पर यति।


१)झांझरी

रेशमी बोल बोले बजे झांझरी, नेह के गीत गाती लगे कान में।

तान श्यामा सुरीली लगे माधुरी, बोल मीठे रसीले अनुस्वान में।

वात धीमी बसंती चली मोद से, पेड़ की छाँव जोगी लगे ध्यान में।

गोपिका शीश पे गागरी नीर है, कूप से तोय लेके चली मान में।।


२) ऋतु मन भावन

लो बसंती हवाएँ चली आज तो, मोहिनी सी बनी रत्नगर्भा अरे।

बादलों से सगाई करेगी धरा, है प्रतिक्षा उसे मेह बूंदें झरे।

डोलची नीर ले के घटा आ गई, शीश मेघा दिखे गागरी सी धरे।

रंग रंगी सुहावे हरी भू रसा, कोकिला गीत गाए खुशी से भरे।।


३( राधिका उदास

आज श्यामा किनारे चले आ सखे, राधिका नाम तेरा पुकारे खड़ी।

दर्श की आस ले डोलती साँवरे, झील सी आँख से बूंद मोती झड़ी।

वेणु प्यारी उन्हें मूढ़ मैं क्यों जली, बात बेबात ही श्याम से यूँ अड़ी।

काम खोटा किया जो न मानी सुनी, क्यों अनायास गोपाल से जा लड़ी।।


४(श्रावणी मेघ

कोकिला कूकती नाचता मोर भी, मोहिनी मल्लिका झूमती जा रही।

आज जागी सुहानी प्रभाती नई, वात के घोट बैठी घटा आ रही।

श्रावणी मेघ क्रीड़ा करें व्योम में, गोरियाँ झूम के गीत भी गा रही।

बाग में झूलती दोलना फूल का, बाँधनी लाल रक्ताभ सी भा रही।


*मुक्तहरा सवैया* 

मापनी:-

१२१ १२१ १२१ १२,

११२१ १२१ १२१ १२१.

११,१३ वर्णों पर यति।


१)ॐ निनाद।

ऋचा शिव की भव बंध हरे, करते जड़ता सब नाश महेश।

कृपा जब भी उनकी मिलती, जलता मन में शुभ अंजनकेश।

निनाद उठे जब शून्य हँसे, गृह में निधियाँ भरते अखिलेश।

अबूझ अदीठ अगोचर है, हर वाहित ज्यूँ  रवि तेज ग्रहेश।।


२)अरदास

लगा यह नाद कहे सब ही, अब कौन सुने किसका यह रोर।

मचा दुख त्रास सभी दिशि में, सब भोग रहे विपदा हर ओर।

करो दुख भंजन पीर हरो, प्रभु जाप जपें हम तो निशि भोर।

दिखा किरणें सुख सूरज की, शशि शीतलता बिखरे हर छोर।।


 ३)धीर (धैर्य)

अधीर मना कुछ धीर धरो, मिलता सबको न सभी सुख मान।

विचार रखो सब उत्तम तो, फिर भाव पुनीत रहे हिय आन।

रहे मन में हित त्याग जहाँ, बहता बस पावन निर्झर पान।

सुधीर रहें सब संकट में, सहना सब कष्ट प्रमोद सुजान।।


४(कलहास

बयार बसंत भली बहती, कलहास करे मन अंतर आज।

लगे छलना महकी ऋतु भी, महका रस गंध चराचर आज।

सखी हुलसा हिय नाच रहा, दल पुष्प लगे सजके वर आज।

सुजान बने सब डोल रहे, भँवरे पहुँचे कलिका घर आज।।


*वाम  सवैया*  

१२१ १२१ १२१ १२१, 

१२१ १२१ १२१ १२२.

१२,१२वर्णों पर यति।


१)पुनीत धरा

पुनीत धरा पहने सिर मंजु, किरीट हिमालय तुंग विराजे।

पखाल करे पद दीर्घ जलेश, प्रभात सुनो मधु भैरव बाजे।

द्वि हाथ विशाल नदीश प्रवाह, हरी चुनरी हर अंगज साजे। 

धरा निखरी ऋतु सुंदर चार, छटा निरखे तव द्यौ सम राजे।।


२)बाल कृष्ण

मनोहर मोहन मंजुल मूर्ति, मचान चढ़े घट माखन तोड़े ।

निहार यशोमति क्रोध महेंद्र, झुके दृग खंजन औ कर जोड़े।

लला हरि का यह मोहक रूप, प्रसू मन हर्षित कान मरोड़े।

क्षमा अनुमोद सभी क्षण भूले, प्रसाद चढ़ें नित गागर फोड़े।।


३)नेह पियूष।

रखो जग में कुछ भाव विशाल, सुवास सुगंध प्रसून खिला दो।

करो उपकार समाज सुधार, दुखी जन नेह पियूष पिला दो।

विषाद घिरे जन का हित देख, उन्हें उनका अधिकार  दिला दो।

विहान नवीन लिए दिनमान, दिनेश बनों मृत प्राय जिला दो।।


४)सुधांशु

अनंत ललाट सुधांशु कुमार, धरे नव रूप उजास बिखेरे।

अमा पखवार छिपे सब कोर, कभी घन श्यामल आकर घेरे।

प्रवास किसी नगरी किस देश, लगा रहते नित ही बस फेरे।।

किलोल करे किरणें सुखमाल, नदीश विशाल तरंगिनि डेरे।।


*अरसात सवैया यति* 

२११ २११ २११ २११,

२११ २११ २११ २१२.

१२,१२ वर्णों पर यति।


१)विधिना की विसंगतियाँ

खेल कभी करती विधिना सब, गान वही दिशि पालक गा रहे।

घोर तपे रवि तेज दिखाकर, और कहीं करका बरसा रहे।

शीत लगे मनभावन मोहक, और दिखे उत बादल छा रहे।

ध्वंस विनाश मचा दिखता कित, और कहीं कुछ दृश्य लुभा रहे।।


२)प्रभु नाम सुख कारक

मंगल मंत्र जपो सुख कारक, मंजुल नाम सदा हिय धारणा।

ये मृण का तन टूट बिछे जस, गागर हो क्षण भंगु विचारणा।

घात करे कब काल महाबल, ठोकर मारक घोर प्रतारणा।

जो प्रभु नाम जपे मन से फिर, वो बन तारक ही भव तारणा।।


३) विजया

है विनती विजया वर दो तुम, आज धरो सिर हाथ करो दया।

बुद्धि सदैव सुबुद्धि रहे बस, पूजन भक्ति करूँ नित ही जया।

ज्ञान सदा बन दीप जले फिर, कर्म कठोर उड़े सब अंबया।

उद्यम उच्च रहे मन सुंदर, पावन चिंतन दो वर अक्षया।।


४) राह प्रशस्त

राह मिले जब शूल भरी तब, हो बढ़ना पथ देख सदा वहाँ।

जो मन हार चुका जग में यदि,वो फिर जीत नही सकता यहाँ।

नायक हो बनना जग में चल, मार्ग प्रशस्त बना रुकना कहाँ

दूर प्रमाद करो तन का फिर, काम वहीं कर आदर हो जहांँ।।


*अरविंद सवैया* 

मापनी:-

११२ ११२ ११२ ११२,

११२ ११२ ११२ ११२ १.

१२,१३वर्णों पर यति।


१)धरा के अँकवार

मधुमास लगा अब फूल खिले, सब ओर चली मृदु गंध बयार।

हर डाल सजे नवपल्लव जो, पहने वन देव सुशोभित हार।

अँकवार लिए तृण दूब कुशा, धरणी पहने चुनरी कचनार।।

मन है कुछ चंचल देख रहा, निखरी वसुधा बहती मधुधार।।


२) साँझ

ढलता  रवि साँझ हुई अब तो, किरणें पसरी चढ़ अंबर छोर।

हर कोण लगे भर मांग रहा, नव दुल्हन ज्यों मन भाव विभोर, खग लौट रहे निज नीड़ दिशा, अँधियार रहा कर भूमि अखोर।

तन क्लांत चले निज गेह सभी, श्रम दूर करे अब श्रांन्ति अथोर।।


४)सुधांशु

मन रे अब धीर धरो कुछ तो, तज चंचलता बन शांत सुधांशु।

तपती जगती तपनांशु दहे, हँसती निशि पाकर कांत सितांशु।

जब क्लांत हुआ तन पिंजर तो, नव जीवन सा भरता शिशिरांशु

घटता बढ़ता निज गौरव से, शिव भाल सदा भय क्रांत हिमांशु।।


४)शंख रव

कलियाँ महकी महकी खिलती, अब वास सुगंधित है चहुँ ओर।

जब स्नान करे किरणें सर में, लगती निखरी नव सुंदर भोर।

बहता रव शंख दिशा दस में, रतनार हुआ नभ का हर कोर।

मुरली बजती जब मोहन की, खुश होकर नाच उठे मन मोर।।


*वागीश्वरी सवैया*  

मापनी:-

१२२ १२२ १२२ १२२,

१२२ १२२ १२२ १२.

१२,११ वर्णों पर यति।


१) लेखनी कैसी हो

 बहे गीत भी स्वच्छ मन्दाकिनी ज्यों, रचूँ काव्य मंजू रहे जीत भी।

 रहे जीत भी छंद आनंद दे जो, अलंकार शोभा झरे रीत भी।

झरे रीत भी लेखनी से ऋचाएं, रचे नित्य आशा भरे प्रीत भी। भरे  प्रीत भी नाद संसार में जो, नयी धार गूँजे बहे गीत भी।।


२)विधना के लेख

लिखा भाग्य का लेख देखो प्रतिज्ञा, पिता की बनी है प्रतिष्ठा घड़ी।

चले राम उत्सर्ग व्हे भोग सारे, सुनो पुत्र ये बात है क्यों बड़ी।

तुम्हारे बिना क्षुब्ध हैं तात रोये, महा वेग घेरे दुखों की झड़ी।

न जाने विमाता हुई कैकई क्यों,  नहीं मुंह खोले हठी सी खड़ी।


३)आलोक

लिखो गीत प्यारे भरे मोद आशा, लहा दे उरों में सुधा बोहिनी।

बहादे सुरों की नदी गंग जैसी, लगे जो सदा ही शुभा सोहिनी।

जला दीप आलो करे जो सभी तो, भगेगा अँधेरा निशा मोहिनी।

तभी वास होगा उजाला सदा ही, भरी ही रहे क्षीर की दोहिनी।।


४)न जाओ मुरारी

न जाओ मुरारी सुनो विश्वकर्मा, न बंसी छुपाऊँ लड़ाई करूँ।

विरानी गली गाँव कान्हा तुम्हारी, खड़ी राह में धीरता मैं धरूँ।

अधूरा लगे धाम संसार सारा, दृगों में छुपा नीर बोले झरूँ।

हुई भूल जो नाथ मांगूँ क्षमा भी, कहो तो तुम्हारे पदों मैं परूँ।।


*चकोर सवैया* 

मापनी:-

२११ २११ २१२ २११,

२११ २११ २११ २१.

१२,११वर्णों पर यति।


१)प्रीति विभूषित श्याम

श्याम बढे निज वेणु लिए फिर, एक छड़ी लुटिया रख हाथ।

धूम मची पथ कानन निर्जन, ग्वाल चले अब गौ धन साथ।

दास बने निज भक्त जनो सह, प्रीति विभूषित होकर नाथ।।

नाम जपे भव बंध कटे हर,साधक जाप करें तव गाथ।।

 

२)विहाग

लो बगियाँ महकी मधु सौरभ, आज उमंग भरा हिय राग।

गूंज मिलिंद करें मन मोहित, कंज खिलें सर ताल तडा़ग।

साजन दूर बसे मुझ से सखि, छेड़ रहा मन राग विहाग।।

आस जगी अनुराग भरे मन, बोल रहा छत ऊपर काग।


३)तारे

सुंदर चीर मलीन दिखे अब, रात ढली सब तारक लुप्त।

जाकर बैठ गये कित ओझल, है करना कुछ मंथन गुप्त ।

या अरुणोदय से घबरा कर, कंबल ओढ़ पड़े सब सुप्त।

रैन गये चमके फिर हीरक, अद्भुत से यह नोक अनुप्त।।


नोक अनुप्त =बिना उगाई पौध या अंकुर।


४)उपकारी

जीवन मंत्र यही सब के हित, प्यार करो हर मानव संग।

जीत सदा उस की जग में सुन, हर्ष व्यथा पर कल्प अभंग।

काम करे हर श्रेष्ठ यहाँ वह, अंतस में धर चाव उमंग।

धैर्य रखे मन ही मन धारण, उत्तम ज्यों गुण शील लवंग।।


*सुख सवैया* 

मापनी :-

११२ ११२ ११२ ११२,

११२ ११२ ११२ ११२ १२.

१२,१४, वर्णों पर यति


१)प्रतीक्षा

मन मोहन आकर वेणु बजा, तकती सब गोपिन राह निहारती।

पद पंकज घायल हो न कभी, निज आँचल कंकर शूल बुहारती।

मृदु फूलन को पथ पे धरती, सजती फिर नाम पुनीत पुकारती।

कब श्याम धरे पग राह सखी, बन पूजक श्री पद जन्म सुधारती।।


२)जगत की रीति

यह रीति भली जग की सुन लो, चढ़ते उनको नमते सब ही यहाँ। 

ढलते रवि को कब मान कहो, उगता रवि पूज्य लगे सब को जहाँ।

जब मान नहीं घर में अपने, तब तो जग में फिर मान मिले कहाँ।

प्रतिमान जहाँ रुपया जिन को, न कभी रखना पग भी अपना  वहाँ।।


३)अपने अपने सपने

अपने अपने सपने सबके, मचले दृग में पलकों रमते रहे।

लखना चखना फल भी इनका, इनमें कितने रस भी सजते रहे।

करते रहते नित नेह नया, नित ही दुविधा सँग में बहते रहे।

बसती मन आस सदा फलती, नित ही नव मोद लिए भगते रहे।।


४(गंध निशा)

 रजनी रस गंध बहा सरसा, महकी महकी खिल गंध निशा पली। 

हर डाल रही लहकी लहकी, उजली किरणें कर से लिपटी भली।

रवि आवन आहट जो सुनली, कलिता कलियाँ तब मूर्छित हो ढली।

अब भोर हुई सब टूट गिरी, पसरी पथ पारण ताप लगा जली।


*विज्ञ सवैया* 

मापनी:-

११२ ११२ ११२ ११२,  

११२ ११२ ११२ २२.

१२/११ वर्णों पर यति।


१)प्रभु दयालु

रहना प्रभु आप दयालु सदा, शुभ नाम लिए दुख भी भागे।

करुणा करना करुणानिधि हो, कब साथ रहो विधिना जागे।

जब नाथ रहे सँग ताप हटे, सब टूट गये दुख के धागे।

भव बंध कटे विपदा मिटती, रखना प्रभु जी सुध भी आगे।


२)अवलंब

जड़ मूल मिटे अवलंब हटे, तब नाश विनाश दिखा ही है।

बिन स्तंभ कहां ठहरें कुछ भी, हर ज्ञान किताब लिखा ही है।

जलती मिटती तम को हरती, वह तेजस दीप शिखा ही है।

मिलता जग में कम ही लगता, यह मानव भाव त्रिखा ही है।


 *विदुषी सवैया* 

मापनी:-

२१२ २१२ २१२ २,

१२ २१२ २१२ २१२ २.

१०/१२वर्णों पर यति।


१( विजयी की जय

जीत का नाद भारी सुना है, पराजीत का गान भी कौन गाता।

पूछ होती उसी की धरा में, सदा जो नयी वेषनाएं बनाता।

तोड़ता व्योम की तारिकाएं, उन्हें गर्व प्रागल्भ्यता से सजाता ।

कालिमा से लड़े साहसी ही, 

 प्रजे आग सा ज्योति आभा जलाता ।।


२(प्रतिबद्धता जीवन की

नीर आँखों बहाना न प्यारे, नहीं आज कोई मनोभ्रंश पालो।

रीतियाँ  लोक में है अनूठी, इन्हीं में रहो ज्ञान दीया जलालो।

काम हो आज का आज पूरा, न कोई कभी दूसरे काल टालो ।

खोद के कौन पानी उगाहे, बहे धार गंगा तृषा को बुझालो।।


 *साँची सवैया* 

मापनी:-

२२१ २२१ २२१ ११२,

२२१ २२१ २२१ १२.

 १२/११ वर्णों पर यति।


१(जीवन का सत्य

है नाव धारा किनारा न दिखता, लो नाम स्वामी मिलेगा तट यूँ।

डाली खिले पुष्प है मानव सभी, टूटे झरे तोड़ श्वांसे पट यूँ।

कोई नहीं जो यहां पे अमर हो, जाते सभी ही यहां से झट यूँ।

राहें सभी की रहेगी अलग सी,

झांको भरा पुण्य का हो घट यूँ।।


२(छटा 

लो घोर गर्जी महा रोर करती, काली घटा नीर लेके मचली।

लागे भला काजली नेह बहता, भाने लगी दामिनी आभ भली।

छाई खुशी देख मेघा गगन में, हर्षे लगे प्रांत के द्वार गली।

नाचे कलापी पखौटे कलित हैं, औ मोहिनी चाल लागे बदली।।


 *कोविंद  सवैया* 

मापनी:-

२११ २२२ २११ २२,

२११ २२२ ११२ २२. 

११,११वर्णो पर यति।


१(सुंदर जीवन शैली

जीवन शैली हो सुंदर देखो, काम सभी होंगे फिर तो न्यारे।

मान बढ़ाना है मातृ धरा का, उज्ज्वल भावों के पथ हो प्यारे। 

थावर होगी आधारशिला तो, नाम करेंगे मानव जो हारे।

वांग्मय हो जो साहित्य सुधा भी, चित्र बनेंगे शोभित वो सारे। ।


२(माया का खेल

पूछ न मर्मज्ञों की इस भू में, खेल अनोखे से सब ही खेले ।  

कौन किसी का साथी डग में रे, भीत हुए पीड़ा सब ही झेले।

जाल बिछे जादू के उलझे से, दूर दिखे लो कृत्रिम ही मेले।

भूमि भरी है स्वार्थी जन से ये, लूट रहे जोगी बन के चेले।।


*प्रज्ञा सवैया* 

मापनी:-

२२२ २१२ २१२ २११,

२१२ २१२ २११ २२.

१२/११वर्णों पर यति।


१(शिव धनुष भंग

तोड़ा सारंग टंकार थी भीषण, राज आवास भी डोल रहा था।

पूछे कोई सखी बावली होकर, कौन कोदंड़ को तोल रहा था।

हर्षी सीता खुशी छा रही आलय, घोष उद्घोष भी बोल रहा था।

बाजे है बाँसुरी थाप दे ढोलक, फागुनी रंग सा घोल रहा था।


२(निर्झर

कानों में माधुरी घोलते हैं जब, रागिनी स्रोत के पाहन गाते।

ऊँचे शैलेन्द्र के शीश से पीघल, मोहिनी रूप वो धार लुभाते।

धारा है काँच सी मोहिता भावन, नीर मिश्री भरा ज्यों बरसाते ।

नीचे शैवालिनी मोहती है मन, भू धरा जीवनी धार बहाते।।


३)आ जाओ श्याम जी

आ जाओ श्याम जी नैन देखे पथ, प्रीत के गीत बंसी धुन गाये।।

राधा गोरी तके मुंह लीलाधर, कृष्ण का रूप देखे हरसाये।।

मीठी बोली यशोदा लला मंजुल, रूप चंदा दिखे लौ चमकाये।

कालिंदी कूल आये मुरारी अब, श्याम को देख गोपी मन भाये।।


४)नेह की धार

शोभा कैसी धरा की दिखे मोहक, ओढ़ के ओढ़नी मंजुल धानी।

कूके है कोयली बोल है पायल, झांझरी ज्यों  बजे वात सुहानी।

मेघा को मोह के जाल फंसाकर, व्योम पे मंडरा बादल मानी।

प्यारी सी मोहिनी सुंदरी शोभित, नेह की धार है कंचन पानी।।


*सुधी सवैया* 

मापनी:-

१२१ १२१ १२१ ११२, 

१२१ १२१ १२२ १२.

१२/११ वर्णों पर यति।


१(चाँद और उद्धाम लहरें

उतंग तरंग नदीश हिय में, प्रवात प्रवाह बहाता बली।

अधीर हिलोर कगार तक आ, पुकार सुधांशु उठी वो चली।

चढ़े गिरती हर बार उठती, रहे जलधाम सदा श्यामली।

पयोधि कहे प्रिय उर्मि सुनना, कलानिधि है छलिया ज्यों छली।।


२(सागर की सीख लहर को

तुम्ही सरला नित दौड़ पड़ती, छुने उस चन्द्र कला को चली।

न हाथ कभी लगता कुछ तुम्हें, तपी विरहा फिर पीड़ा जली।

प्रवास सदा मम अंतस रहो, बसो तनुजा हिय मेरे पली।

न दुर्लभ की मन चाह रखना, मयंक छुपे शशिकांता ढली ।।


*राधेगोपाल सवैया* 

मापनी:-

२२१ १२१ १२१ १२,

१ १२१ १२१ १२१ १२२.

११/१३ वर्ण पर यति।


१(सूरज की दहकन

ज्वाला निज की निज ही तपता, रवि पीकर सागर प्यास बुझाता।

क्यों वो  नित ही दहता रहता, फिर पीर लिए भटका वह आता। 

कैसा तप लाल हुआ नभ भी, धरती तक आग लगाकर जाता।

है साँझ ढले कुछ क्लांत रहे, अवसान हुआ खुश होकर गाता।।


२(सूरज के बदलते रूप

यामा जब आँचल नील धरे, सविता जलधाम समाकर सोता।

आँखे फिर खोल विहान हुई, हर मौसम रूप पृथक्कृत होता।

गर्मी तपता दृग खोल बड़ी, पर ठंड लगे तन दे सब न्योता। 

वर्षा ऋतु में नभ मेघ घने, तब देह जली अपनी फिर धोता।।


 *अर्णव सवैया*

 मापनी:-

२२१ २१२ २१२ २१२, 

२१२ २१२ २२१ २२.

१२/११ वर्णों पर यति।


१(दसरथ  पुत्रों का विवाह

वे राजपुत्र कंदर्प से मोहते,चार ही फूल से मंजू लुभाते।

राजा प्रसाद में धूम भारी मची, चार का ब्याह था आदित्य गाते।

कन्या सहोदरा सी सभी सुंदरी, चार को रत्न की डोली बिठाते।

लो ढोलके बजी गीत गाती सखी, चार की राह पुष्पों से सजाते।।


२(मात क्यों हुई विमाता

आगाध स्नेह माँ कैकई का सदा,

क्यों हुई मात निर्मोही न जाने।

थे राम प्राण से भी दुलारे रहे,

रक्षिता अंबिका सी डोर ताने।

है कौन लेख प्रारब्ध यूँ तोलता,

राज छूटा गये निर्वास पाने।

माता कभी प्रसू से दुलारी रही,

विश्व सारा लगा धन्या बुलाने।


*सपना सवैया* 

मापनी:-

२२२ १२२ १२२ १२२,

१२२ १२२ १२२ २२२.

१२/१२ वर्णो पर यति।


१(दाता तुम्ही

हे दाता हमें दो  किनारा सहारा, तुम्हारे बिना घोर छाया है पाला।

है माना तुम्ही विश्व पालो सदा ही, तुम्हारे बिना कौन तोड़ेगा जाला।

रोये दुर्दशा की प्रभाती अनूठी, तुम्हारे बिना काल मारे है भाला।

हारा मैं दयाला बसाके ठिकाना, तुम्हारे बिना है उजाला भी काला।।


२) पावनी गंगा

है गंगा नदी पावनी जो पवित्रा, बहे शूलपाणी जटा से ये न्यारी।

जो हो मान सम्मान तो ये रहेगी, सदा दुग्ध क्षीरा सभी को है प्यारी।

है निर्विघ्न पानी पिलाती धरा को, सुधा साथ लाती न टूटी वो हारी।

है भागी रथी वाहिनी सौम्य मुख्या, रहे उग्र श्री कंठ गंगा के धारी।।


*कुमकुम सवैया* 

मापनी:-

११२ ११२ ११२ ११२,

११२ ११२ ११२ १२.

१२/११ वर्णों पर यति।


१(देश सम्मान

मन गर्व रहे निज भारत का, मम देश रहे अब मान से।

सबके अनुराग जगे हिय में, जय हो जय हो अब तान से।

जब गान यहाँ जन के हित हो, रहना सहना सब आन से।

नित कर्म करें अपना अपना, जग नाम बढ़े फिर ज्ञान से।।


२(निजता

हिय में रखना निजता अपने,रख अंतस गौरव भी यहाँ ।

जब नेह पियूष नहीं मिलता, तब पत्र हटा तरु से वहाँ।

बहती नदिया निज राह सदा, मिलती तब अर्णव हो जहाँ।

धन से सब ही कुछ तो न मिले, प्रतिती बिन उत्तमता कहाँ।


*तेजल सवैया* 

मापनी:-

 ११ ११२ ११२ ११२ १, 

१२ ११२ ११२ ११२ २.

१२/१२ वर्णों पर यति।


१) सुन्दरी

झन झँझरी झनकी झन आज, अहा सुन बोल यहाँ पर बोले।

सज चलदी वह पुष्कर तीर, चली रख के गगरी सिर तोले।

पग रखती जल में चढ़ घाट, उठा कर से निज घूंघट खोले।

अमल मनोरम शोभित रूप, हठी भ्रमरा ललना मुख डोले।।


२)नार नवेली

अब फहरी चलती पवमान, बड़ी मदरी मदरी मन भाई।

नव सपने खिलते हर आज, अरे झुकके बदरी घिर आई।

फिर फहरा सिर आँचल लाल, अहा लट श्यामल सी लहराई।

जल सलिला लगता नव रूप, दिखे जल में छवि वो सकुचाई।।


*विज्ञात बेरी सवैया*

मापनी:-

२२१ १२२ २११ २११,

२११ २११ २२१ २२.

१२,११वर्णों पर यति।


१(केवट का हठ

आनंद घना छाया मन में जब, यूँ तट राम सिया साथ आये।

लो केवट दौड़ा मोद भरा तन, भाग बड़े प्रभु के दर्श पाये।

झूठी वह कैसी रार मचाकर, एक घड़ा भर के अंभ लाये।

माने न किसी की बात हठी वह, हाँ पद धोकर नौका बिठाये।।


२(प्रभु पर उधारी केवट की

नौका चढ़ सीया देख रही मुख, राम ललाट लगे रेख भारी।

ले हाथ अँगूठी हीर रखी कर, नेत्र झुका सब बोली सुनारी।

ये नेह निशानी मित्र रखो तुम, केवट ये अब से है तुम्हारी।

हे राम खिवैया हो तुम पालक, आप रखो प्रभु ये है उधारी।।


 *शान्ता सवैया*

 मापनी :--

२२ ११२ ११२ ११२ ११,

२ ११२ ११२ ११२ २२.

१३/१२वर्णों पर यति।


 १)राधा जी और मयंक

राधे तुम सुंदर रूप धरोहर, मंजुल सी छवि हो अलभा नारी।

राकापति दाह रहा अनुभावन, मोहक सी मन मोह रही प्यारी।

झांके तुम पल्लव ओट निशाकर, स्वांग करे धर नाम सदाचारी।

वो क्यूँ भटका पथ छोड़ सुधाकर, जो लगता नभ में  सुचिता धारी।।


२)राधा जी का सौंदर्य

कान्हा हिय में  रहती नलिनी बन, हे वृषभानु सुता शुभता कोरी।

काले मृग लोचन से दिखते दृग,  लाल रदच्छद औ छवि है गोरी।

चंपा सम बाँह दिखे लचके जब, गोप कहे बृज की ललिता छोरी। 

वो हेम लता लहरी बल खाकर, अच्युत के हिय की करती चोरी।।


*पूजा सवैया* 


२१ ११२ ११२ ११२ १,

१२ ११२ ११२ ११२ १२.

१२,१३वर्णो पर यति।


१)श्री कृष्ण का निवास भवन

है महल सुंदर भव्य विशाल, लगी नव झालर भी मन भावनी।

वो कनक रत्न जड़े हर द्वार, जले नव दीपशिखा गृह पावनी।

माणिक बिछे लगते रतनार, गवाक्ष खुले बह वात सुहावनी।

है सरस पंकज मोहक ताल, लगे बहता झरना जल सावनी।।


२(सुदामा का सत्कार

द्वार पर निर्धन विप्र सुधीर, खड़े मन में अनुराग लिए तहाँ।

निर्गुण कहे वह मित्र विनम्र, कदा मम बाल सखा रहते यहाँ।

दौड़ निसरे प्रभु बाहर द्वार, लगा हिय से फिर अंक भरे वहाँ। 

पात्र जल से पग धावन आप, कहो जग में यह प्रीति रखी कहाँ।।


 *महेश सवैया* 


२२ ११२ ११२ ११२ ११,

२ ११२ ११२ ११२ २.

१३,११ वर्णों पर यति।


१(छंद गीत


हाँ मैं अनुवादित भाव सदा शुभ, गीत कहो कह दो कविता भी।

छंदों बहती सुर के स्वर में जब, जाग उठे खग औ सविता भी।

उन्मुक्त कभी नभ को भरती कर, या फिर बोल कहूँ भविता भी।

पुण्या स्तुति हूँ शुभता रखती वर, पूजन की विधि में स्तविता भी।।


२(छंद कविता

लीला रचती नवता भरती लय, ताल सुरों खनकी बहती है।

ज्यों बूँद गिरे तपती वसुधा पर, बोधित वेद शुभा कहती है।

आभा बन के झरती रवि कंचन, भाव ढहे निज भी ढहती है।

रत्नाकर चंचल चालित उर्मिल, त्यों उठती गिरती रहती है।।


 *एकता सवैया* 

२२१ ११२ ११२ ११२,

११२ ११२ ११२ ११२ २.

१२'१३वर्णों पर यति.


१)निशा

हीरों जड़ित सेज लुभावन सी, रजनी निज के दृग खोल रही है।

तारा पति सजे नव रूप लिए, महकी पुरवा रस घोल रही है।

ज्योत्स्ना रजत सी वसुधा पसरी, हर पादप पादप दोल रही है।

श्रृंगार रचती धरणी नित ही, कर उर्मि लिए तम तोल रही है।


२) शशिकांत

निर्मेघ नभ में शशिकांत जड़ा, चमका दमका दिखता रमता सा।

वो केलि करता नभ सागर में, उजला तन रोप्य धरा गमता सा।

तारों जड़ित नीलम चादर है, चलता रुकता लगता थमता सा।

छाया उदधि में हिलकोर करे, विधु खेल करे झुकता नमता सा।



 *जय सवैया* 

२ २१२ २१२ २१२ २ ,

१२ २१२ २१२ २१२ २ .

११,१२वर्णां पर यति,


१(सत्पुरुष

हो भावना निर्मला पंडिता सी, जटा धारते शूलपाणी सदा ही।

पाते रहें मान भी विश्व में  वो, रखे उच्चता सोच में नित्यदा ही।

भूले न वो कर्म ओछा करेंगे, अकल्याणकारी नहीं अन्यदा ही।

वाणी रहे कोकिला सी लुभाती, खुशी बाँटते  रुष्ट होते कदा ही।


 *सुवासिता सवैया* 

१३,११वर्णों पर यति,

२१२ ११२ १२२ १२१ १, 

२१२ १२२ ११ २११ .


१)बसंत

कोंपले महकी खिले फूल सुंदर, पात पात शोभा बरसे वन।

नाचती मन मोरनी चाल मंजुल, पोर पोर खोया उलझा मन।

ये बसंत सुहावना रूप पावन, पाँव घूँघरू भी झनके झन।

मेदिनी सरसी सुधा नीर पाकर, आज चीर धानी पहने तन।।


*विज्ञात सवैया* 

२१२ २२१ २२१ २२२,

२१२ २११ २२१ २२.

१२,११,वर्णों पर यति।


१(क्यों भाव खोते

मोतियों से गीत पातों सजे हैं जो, है मसी व्याकुल क्यों भाव खोते।

शब्द के सोपान ऊँची चढ़ाई तो, ठान ले जो चढ़ उत्तीर्ण होते।

हो अलंकारों सजा लेख भी प्यारा, व्यंजना को सह लक्ष्णा पिरोते।

मौन तोड़े निर्झरी सी बहाते जो, वो अभिव्यक्त नहीं शब्द सोते।


२(गुरु को समर्पित

छंद भावों के लिखे हैं सवैया भी, आज वो ही गुरु के हाथ देना।

हो गवेक्षा छंद की औ सवैया की, है वही तो निज का शोध लेना।

लेखनी है मान सम्मान की भूखी, साथ हो शोधित सी काव्य धेना।

नाव जो डोले अभी पार भी होगी, साथ जो है गुरु का ज्ञान छेना।


धेना=नदी


 *कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'*

Saturday, 7 August 2021

कष्ट का अँधेरा

कष्ट का अँधेरा


दर्द की झोली भरी है 

नाद के विस्तार तक 

नित्य की इस दौड़ में बस

भूलता अधिकार तक।


दु:ख के प्रतिमान बदले 

भय भयंकर छा रहा 

बीतना कितना कठिन पर 

काल बीता जा रहा 

कष्ट का हँसता अँधेरा

बादलों के पार तक।।


आँधियों की किरकिरी पर 

आँख अब झुकती नही 

शूल से हों पैर घायल 

चाल अब रुकती नही 

पीर तिल तिल में बसी फिर 

भोगना दिन चार तक।।


चार दिन का ये समय भी 

बीतता है श्राप ज्यों  

आदमी पर काल हावी 

यम चढ़े हैं भैंस क्यों 

बाँब पर बैठे अभागे 

नाग की फूत्कार तक।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

 

Tuesday, 3 August 2021

सरसी नागफणी

 

सरसी नागफणी


महक उठे है मधुबन जैसे

पात हृदय के जो लूखे

अक्षि पार्श्व दर्शन जो होते

पतझड़ खिल जाते रूखे।


व्याकुल होकर मोर नाचता

आशा अटकी व्योम छोर

आके नेह घटाएं बरसो

है धरा का निर्जल पोर

अकुलाहट पर पौध रोप दे

दृग रहे दरस के भूखे।।


कैसी तृप्ती है औझड़ सी

तृषा बिना ऋतु के झरती 

अनदेखी सी चाह हृदय में

बंद कपाट उर्मि  भरती

लहकी नागफणी मरुधर में 

लू तप्त न फिर भी सूखे।।


पंथ जोहते निनिर्मेष से

कोई टोह नहीं आती

चाँद रात में दुखित चकोरी

दग्ध कौमुदी तड़पाती

कब  तक होगी शेष प्रतीक्षा

झेले क्यों पीर बिजूखे।।


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Saturday, 31 July 2021

मुंशी जी की जन्म जयंती पर

युग प्रवर्तक ,साहित्य शिरोमणि,

आधुनिक हिंदी कहानी के पितामह, उपन्यास सम्राट

मुंशी प्रेमचंद।

अगर आपके पास थोडा सा हृदय है तो क्या मजाल की मुंशी जी की कृतियां आपकी आँखें ना भिगो पाये, जीवन के विविध रूपों के हर पहलूओं पर उन्होंने जो चित्र उकेरे हैं वो विलक्षण है ।

उन्होंने कथा ,उपन्यासों को मनोरंजन,तिलिस्म और फंतासी से बाहर निकाल सीधे यथार्थ के धरातल पर खडा कर दिया । यथार्थ भी ऐसा जिससे आभिजात्य कहलाने वाला वर्ग अनजान था या कन्नी काट रहा था ।

उनकी रचनाओं में दर्द ऐसे उभर कर आता है कि सारे बदन में सिहरन भर देता है, इस कठोर सत्य को पढने में भी उकताहट  कहीं हावी नही होती, रोचकता से  प्रवाह में बहता लेखन ,सहज व्यंग और हल्का हास्य का पुट पाठक को बाँधे रखता है ।

उन्होनें आम व्यक्ति की समस्याओं भावनाओं और परिस्थितियों का इतना मार्मिक वर्णन किया है कि यह कह सकते हैं उनका साहित्य संसार, हिन्दुस्तान के सबसे विशाल तबके का  संसार है।

प्रेम चंद का साहित्य का महत्व भारत में ही नही विदेशों में भी समादृत है।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'