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Friday, 14 May 2021

बन रहे मन तू चंदन वन


 बन रे मन तू चंदन वन

सौरभ का बन अंश-अंश।


कण-कण में सुगंध जिसके 

हवा-हवा महक जिसके

चढ़ भाल सजा नारायण के

पोर -पोर शीतल बनके।


बन रे मन तू चंदन वन।


भाव रहे निर्लिप्त सदा

मन वास करे नीलकंठ

नागपाश में हो जकड़े

सुवास रहे सदा आकंठ।


बन रे मन तू चंदन वन ।


मौसम ले जाय पात यदा

रूप भी न चित्तचोर सदा

पर तन की सुरभित आर्द्रता

पीयूष रहे बन साथ सदा।


बन रे मन तू चंदन वन ।


घिस-घिस खुशबू बन लहकूँ

हर जन का ताप संताप हरूँ 

तन मन से बन श्री खंड़ रहूँ 

दह राख बनूँ फिर भी महकूँ ।।


बन रे मन तू चंदन वन ।।


     कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 12 May 2021

निसर्ग का उलाहना


 निसर्ग का उलहाना


लगता पहिया तेज चलाकर

देना है कोई उलहाना

तुमने ही तो गूंथा होगा

इस उद्भव का ताना बाना ।।


थामे डोर संतुलन की फिर

जड़ जंगम को नाच नचाते 

आधिपत्य उद्गम पर तो क्यों

ऐसा  नित नित झोल रचाते  

काल चक्र निर्धारित करके

भूल चुके क्या याद दिलाना।


कैसी विपदा भू पर आई

चंहु ओर तांडव की छाया

पैसे वाले अर्थ चुकाकर

झेल रहे हैं अद्भुत माया

अरु निर्धन का हाल बुरा है

बनता रोज काल का दाना।।


कैसे हो विश्वास कर्म पर

एक साथ सब भुगत रहे हैं

ढ़ाल धर्म की  टूटी फूटी

मार काल विकराल सहे हैं

सुधा बांट दो अब धरणी पर

शिव को होगा गरल पिलाना।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Monday, 10 May 2021

अटल निश्चय


 अटल निश्चय


कालिमा से नित्य लड़ने

आग आलोकित जगाकर

रश्मियों की ओज से फिर 

जगमगायेगा चराचर।।


श्याम वर्णी मेघ वाहक

जल लिए दौड़े चले जब

बूंद पाकर  सृष्टि सजती

चक्र चलता है यही तब

बीज के हर अंकुरण में

आस जगती दुख भुलाकर।।


बांध कर के ज्ञान गठरी

कौन चल पाया जगत में

बांटने से जो बढ़े धन

सुज्ञ ने गाया जगत में

सुप्त मेधा की किवाड़ीं

सांकलें खोलो हिलाकर।।


कार्य हो आलस्य तजकर

और निश्चय हो अटल जब

रुक न सकता कारवां भी

दूर होते शूल भी तब

सूर्य शशि शिक्षित करें नित

दीप सबके हिय जलाकर।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 8 May 2021

माँ



माँ

जब भी कोई दुविधा आती

याद मुझे माँ की आये।


प्रथम पाठशाला जीवन की

नैतिकता का पाठ दिया।

सुसंस्कार भरकर जीवन में 

सुंदरता से गाठ लिया।

कंक्रीट राह पर चल पाएं

दुख में कभी न घबराये।।


वात्सल्य साथ में अनुशासन

सीख सदा हित की पाई।

हर गलती पर पास बिठाकर

प्यार भरी झिड़की खाई।

ऊंच नीच का भान कराती

घावों पर रखती फाये।।


अपने दुख का भान नही कभी

बच्चों का ही सुख देखा

कभी नही वो कष्ट दिखाती

न भाल चिंता की रेखा।

लिटा गोद में सिर सहलाती

थपकी दे लोरी गाये।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

Wednesday, 5 May 2021

विहान आयेगा


 विहान आयेगा।


रात हो कितनी भी काली

खो चुकी दिवा की लाली

समय पर भानु का उदभव 

रोकना उसको असंभव।।


हो  कभी  जो काल दुष्कर

बनना हो स्वयं धनुष्कर

विजय भी  मिलेगी निश्चित

पुनः सब होगा अधिष्ठित।।


क्यों क्लांत बैठे हार कर

उठ भाव में आवेश भर 

चमन उजड़ा कब रहेगा

हरित हो अंकुर खिलेगा।।


संग्राम है जीवन अगर 

लड़ना ही होगा मगर

जीत तक लड़ते रहेंगे

क्यों पराजय की कहेंगे।।


मनुज कभी रुकता नहीं

बाधाओं से झुकता नहीं

कल नई फिर नींव धरकर 

लायेगा खुशियाँ भरकर।।


       कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 1 May 2021

आई साँझ गुनगुनाती


 आई साँझ गुनगुनाती


वायु का संदेश आया 

झूम कर गाकर सुनाये

आ रहे हैं श्याम घन अब

भूमि की तृष्णा बुझाये।


गा रही है लो दिशाएँ

पाहुना सा कौन आया

व्योम बजती ढोलके जब

राग मेघों ने सुनाया

बाग में लतिका लहर कर

तरु शिखर को चूम आये।


भानु झांका श्याम पट से

एक बदरी छेड़ आई

बूँद बरसी स्वर्ण मुख पर

सात रंगी आभ छाई

साँझ फिर से गुनगुनाती

छाप खुशियों की बनाये।


दिन चला अवसान को अब

घंटियाँ मन्दिर बजी है

दीप जलते देहरी पर

आरती थाली सजी है

आज माता को बुलावा

पात कदली के सजाये।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 26 April 2021

किरणों का क्रंदन।


 किरणों का क्रदंन


तारों की चुनरी अब सिमटी

बीती रात सुहानी सी।

कलरव से नीरव सब टूटा

जुगनू द्युति खिसियानी सी।


ओढ़ा रेशम का पट सुंदर

सुख सपने में खोई थी

श्यामल खटिया चांदी बिछती

आलस बांधे सोई थी

चंचल किरणों का क्रदंन सुन

व्याकुल भोर पुरानी सी।।


प्राची मुख पर लाली उतरी

नीलाम्बर नीलम पहने

ओस कणों से मुख धोकर के

पौध पहनते हैं गहने 

चुगरमुगर कर चिड़िया चहकी

करती है अगवानी सी।।


वृक्ष विवर में घुग्घू सोते

 बातें जैसे ज्ञानी हो

दिन सोने में बीता फिर भी

साधु बने बकध्यानी हो

डींगें मारे ऐसे जैसे

कहते झूठ कहानी सी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'