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Sunday, 15 May 2022

साहिल पर नाँव लिए बैठें हैं


 जो फूलों सी ज़िंदगी जीते काँटे हज़ार लिये बैठे हैं।

दिल में फ़रेब होंठों पर झूठी मुस्कान लिये बैठें हैं। 


ऊपर खुला आसमां ख्वाबों के महल आँखों में।

कुछ टूटते अरमानों का ताजमहल लिये बैठें हैं। 


सफेद दामन दिखते जिनके दिल दाग़दार हैं उनके।

एक भी तो ज़वाब नहीं सवाल बेशुमार लिये बैठें हैं। 


हंसते हुए चेहरों के पीछे छुपे दिल लहूलुहान से।

क्या लें दर्द किसी का अपने हज़ार लिये बैठें हैं। 


टुटी कश्ती वाले हौसलों की पतवार पर सवार।

डूबने से डरने वाले साहिल पर नाव लिये बैठें हैं।


              कुसुम  कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 11 May 2022

कौन पढ़े मेरी कविता।


 कौन पढ़े मेरी कविता


चिर निद्रा के आलिंगन में

उतरेगा थक कर सविता

कह दो इसके बाद जगत में

कौन पढ़े मेरी कविता।


आखर-आखर श्वांस पिरोई

भावों की है रंगोली 

अंतर का आलोक उजासित

ज्यों केसर की है होली 

समतल या पथरीली राहें

रही लेखनी बन भविता।।


कह दो इसके बाद जगत में

कौन पढ़े मेरी कविता।।


पत्राजन रंग श्वेत पाने 

भाग्य अपना बाँचते हैं

मेघा पुर में स्वर्ण कितना

धर्म काँटे जाँचते हैं

ज्यों आँखों से ओझल राही 

जन मानस पट की धविता।।


कह दो इसके बाद जगत में

कौन पढ़े मेरी कविता।।


भाषा का आडम्बर हो या

भावों के माणिक मोती

निज हृदय उदगार अनुपम

गंगा जल से नित धोती

मन की बातें बूझे कोई

बने कौन दृष्टा पविता।‌।


कह दो इसके बाद जगत में

कौन पढ़े मेरी कविता।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 8 May 2022

सुधी सवैया के दो सृजन


 सुधी सवैया दो रचना भावार्थ सहित।


चाँद और उद्धाम लहरें


उतंग तरंग नदीश हिय में, प्रवात प्रवाह बहाता बली।

अधीर हिलोर कगार तक आ, पुकार सुधांशु उठी वो चली।

चढ़े गिरती हर बार उठती, रहे जलधाम सदा श्यामली।

पयोधि कहे प्रिय उर्मि सुनना, कलानिधि है छलिया ज्यों छली।।


सागर की सीख लहर को


तुम्ही सरला नित दौड़ पड़ती, छुने उस चन्द्र कला को चली।

न हाथ कभी लगता कुछ तुम्हें, तपी विरहा फिर पीड़ा जली।

प्रवास सदा मम अंतस रहो, बसो तनुजा हिय मेरे पली।

न दुर्लभ की मन चाह रखना, मयंक छुपे शशिकांता ढली ।।


भावार्थ:-

पूर्णिमा और अमावस्या के आसपास सागर में लहरें कुछ ज्यादा ही तेज और ऊंची होती है । ये दो रचना शुक्ल पक्ष के चांद और लहरों की उद्वेलन को आधार रख लिखी गई है।


सागर के हृदय में ऊँची लहरें उठ रही है, तेज वायु प्रवाह को और बलवान कर रही है।

लहरें अधीर होकर किनारों की और आती है और सुधाँशु यानि चाँद को पुकार कर कहती है कि वो आ रही है अपने चाँद के पास।

चढ़ती हैं फिर गिर जाती हैं हर बार वो श्यामल लहरें सदा समुद्र में ही रह जाती हैं।

सागर कहता है हे प्रिय उर्मि सुन कलानिधि (चंद्रमा तो सदा का छलिया है छली ही उसका नाम होना चाहिए।


दूसरा सवैया

तुम तो सरला हो सरल मन की मोह वश उस चंद्रकला को छुने के लिए दौड़ पड़ती हो।

पर तुम्हारे हाथ कुछ भी तो नहीं आता बस विरह की पीड़ा में तपती हो जलती हो। 

तुम सदा मेरे अंतस में रहो, मेरी प्रिय पूत्री मेरे हृदय में पली हो तुम।

कभी भी दुर्लभ की कामना मन में नहीं करो, सुनो जैसे ही चाँद ढलेगा शशिकांता (चाँदनी) भी ढल जाएगी जिस को देख तुम सम्मोहित हो।

कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 2 May 2022

भावों के मोती


 भावों के मोती


भावों के मोती जब बिखरे

मन की वसुधा हुई सुहागिन


आज मचलती मसी बिखेरे

माणिक मुक्ता नीलम हीरे

नवल दुल्हनिया लक्षणा की

ठुमक रही है धीरे-धीरे

लहरों के आलोडन जैसे

हुई लेखनी भी उन्मागिन।।


जड़ में चेतन भरने वाली

कविता हो ज्यों सुंदर बाला

अलंकार से मण्डित सजनी

स्वर्ण मेखला पहने माला

शब्दों से श्रृंगार सजा कर

निखर उठी है कोई भागिन।


झरने की धारा में बहती

मधुर रागिनी अति मन भावन

सुभगा के तन लिपटी साड़ी

किरणें चमक रही है दावन

वीण स्वरों को सुनकर कोई

नाच रही लहरा कर नागिन।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 21 April 2022

भाव शून्य कैसी कविता!


भाव शून्य कैसी कविता!

बिन रसों के काव्य सूना
टिक सके आदित्व कैसे।
छू न पाये जो हृदय तो
हो सृजन व्याप्तित्व कैसे।

रिक्त जल से गागरी हो
प्यास फिर बाकी रहेगी
बात अंतर की भला वो
लेखनी कैसे कहेगी
भाव से कविता विमुख हो
पा सके अस्तित्व कैसे।

गीत में संगीत होगा
तार झनके वाद्य के जब
बज उठी हो झाँझरे तो
मन मयूरा नाचता तब
रागिनी बिन राग फीका
लेख पर दायित्व कैसे।।

शिल्प खण्ड़ित भाव बिखरे
मुक्त हो उड़ते हुए से
हो विपाकी सा सृजन नित
तार सब जुड़ते हुए से
क्लांत हो जो व्यंजनाएँ
छंद का स्वामित्व कैसे।।

कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 10 April 2022

स्मृतियों की खिड़की


 स्मृतियों की खिड़की


भागते से क्षण निमिष की

डोर थामे कौन पल

याद बहकी वात जैसी

थिर नहीं रहती अचल।।


भूल बैठे जिस समय को

मोह आसन साँधते

टूटते  से तार देखो

हर सिरे को बाँधते

दृष्टि ओझल दृश्य स्मृति पर

नाचते हैं आज कल।।


बीत जाते हैं बरस दिन

इक कुहासा याद का

उर्मि सुधि की एक चमके

तर्क फिर अतिवाद का

होंठ खिलती रेख स्मित

लो महकते पुष्प दल।।


पीर के कुछ पल जगे तो

नैन सीले फरफरा

फिर छिटकता मन उन्हें वो

इक झलक ले लहलहा

जो बरस के शाँत दिखते

नीरधर भी हैं सजल।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 3 April 2022

नेह का झूठा प्रतिदान


 नेह का झूठा प्रतिदान


सच्चे नेह का प्रतिदान भी

मिलता है जब झूठा

मुहँ देखें की बात निराली

पीठ पलटते खूटा।


पहने है लोगों ने कितने

देखो यहाँ मुखोटे

झूठे हैं व्यवहार सभी के

कितने गुड़कन लोटे

वाह री दुनिया कैसे-कैसे

संस्कारों ने लूटा।।


डींगों की सब भरे उड़ाने

कटे पंख का रोना

सरल मनुज को धोखा देते

बातों का कर टोना

तेज आँच में रांधे चावल

कोरा ठीकर फूटा।।


हृदय लगी है ठोकर गहरी

किसने कब है देखा

लेन देन का खेल है सारा

और बनावटी लेखा

अभी नहीं तो पल दो पल में 

पात झरेगा टूटा।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'