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Wednesday, 30 December 2020

नव वर्ष नव उत्कर्ष


 .       नव वर्ष नव उत्कर्ष


           कोरी किताब 

आज नई कोरी किताब खरीद लूँगी

कल सभी कडवी यादों को विदा कर 

पहले पन्ने पर सभी सुखद क्षणों को

सहेज कर रख लूँगी

अगला पन्ना प्यार स्नेह से भर दू़ँगी 

सभी अपनों को निमंत्रण 

अगले पन्ने पर दूँगी

आके सभी लिख देना

साथ बिताई अपनी अच्छी यादें

सुखद क्षण  कुछ अच्छे विचार

फिर उस किताब की कुछ प्रतिलिपि

बनवा भेज दूँगी सभी अपनों को

मैं सहेज कर रख लूंगी अपनी किताब को।‌


          कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 29 December 2020

जीवन चक्र यूँ ही चलते हैं


 जीवन चक्र यूँ ही चलते हैं


साल आते हैं जाते हैं

हम वहीं खड़े रह जाते हैं


सागर की बहुरंगी लहरों सा

उमंग से उठता है मचलता है

कैसे किनारों पर सर पटकता है

जीवन चक्र यूँ ही चलता है

साल आते है... 


कभी सुनहरे सपनो सा साकार

कभी टूटे ख्वाबों की किरचियाँ

कभी उगता सूरज भी बे रौनक

कभी काली रात भी सुकून भरी

साल आते हैं....


कभी हल्के जाडे सा सुहाना

कभी गर्मियों सा  दहकता

कभी बंसत सा मन भावन

कभी पतझर सा बिखरता

साल आते हैं....


कभी चांदनी दामन मे भरता

कभी मुठ्ठी की रेत सा फिसलता

जिंदगी कभी  बहुत छोटी लगती

कभी सदियों सी लम्बी हो जाती

साल आते हैं....


         कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 28 December 2020

पिया की पाती


 पिया की पाती


दुल्हन सा विन्यास विभूषण

नंदन वन सी धरा नवेली।


कैसे  कहूँ बात अंतस की 

थिक थिरकन हृदय में उमड़ी।

घटा देख कर मोर नाचता 

हिय हिलोर सतरंगी घुमड़ी।

लगता कोई आने वाला

सखी कौन है बूझ पहेली।।


पद्म खिले पद्माकर महका

मधुकर मधु के मटके फोड़े।

सखी सुमन सौरभ मन भाई

पायल पल पल बंधन तोड़े।

कोयल कूकी ऊँची डाली 

बोल बोलती मधुर सहेली।।


अंग अंग अब नाच नाचता

आज पिया  की पाती आई

मन महका तो फूला मधुबन

मंजुल मोहक ऋतु मनभाई

उपवन उपजे भांत-भांत रस

चंद्रमल्लिका और चमेली।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Saturday, 26 December 2020

रूठी प्रिया


 हास परिहास


रूठी प्रिया।


अब लाए उपहार बलम जी

कैसे तुम से बोलूं

जन्म दिवस तक भूल गये हो

क्यों निज  मुख अब खोलूँ ।।


वादे कितने लम्बे चौड़े

तारे नभ के लाऊँ

तेरे लिए गोर गजधन

एक ताज बनवाऊँ

लेकर हाथ फूल की अवली

आगे पीछे डोलूँ ।।


एक बना दूँ स्वर्ण तगड़िया

हाथों  कंगन भारी

लाके दूँ मोती के झुमके 

हो तुम पर बलिहारी

टीका नथनी माणिक वाली

तुम्हे हीर से तोलूँ।।


इक हिण्ड़ोला नभ पर डालूँ

उड़ने वाली गाड़ी

परियों जैसा रूप सँवारूँ

बिजली गोटा साड़ी

मेरे मन प्राणों की रानी

जीवन में मधु घोलूँ ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 24 December 2020

अंधों के शहर आईना


 अँधों के शहर आइना बेचने


फिर से आज एक कमाल करने आया हूँ

अँधों के शहर में आइना बेचने आया हूँ।


सँवर कर सूरत तो देखी कितनी मर्तबा शीशे में

आज बीमार सीरत का जलवा दिखाने आया हूँ।


जिन्हें ख़्याल तक नही आदमियत का।

उनकी अकबरी का परदा उठाने आया हूँ।


वो कलमा पढते रहे अत्फ़ ओ भल मानसी का।

उन के दिल की कालिख़ का हिसाब लेने आया हूँ।


करते रहे उपचार  किस्मत-ए-दयार का 

उन अलीमगरों का लिलार बाँचने आया हूँ।

         

                कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


अकबरी=महानता  अत्फ़=दया

किस्मत ए दयार= लोगो का भाग्य

अलीमगरों = बुद्धिमान

लिलार =ललाट(भाग्य)

प्रपंच त्यागो


 प्रपंच त्याग


दो घड़ी आत्मप्रवंचना से दूर हो बैठते हैं

कब तक यूं स्वयं को छलते रहेंगे 

आखिर जीवन का उद्देश्य क्या है 

बस धोखे में जीना प्रपंच मेंं जीना

आकाश कुसुम सजाने भर से

घर की बगिया कहां हरी होती है

कुछ पौध तो बाग सजाने के

लिए धरातल पर लगानी होती है

तो कुछ बीज रोप के देखा जाए

शायद धरा इन्हें अपनी गोद में

प्रस्फुटित कर प्रतिदान दे दे 

कुछ फूल कुछ हरितिमा 

धरा भी लहकेगी घर सजेगा

और मन झूठे छल से बाहर आयेगा।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 21 December 2020

भोर विभोर


 भोर विभोर


उदयांचल पर फिर से देखो  

कनक गगरिया फूटी 

बहती है कंचन सी धारा 

चमकी मधुबन बूटी 


दिखे सरित के निर्मल जल में 

घुला महारस बहता 

हेम केशरी फाग खेल लो 

कल कल बहकर कहता 

महारजत सी मयूख मणिका 

दिनकर कर से छूटी।।


पोढ़ रही हर डाली ऊपर 

उर्मि झूलना झूले 

स्नेह स्पर्श जो देती कोरा 

बंद सुमन भी फूले 

रसवंती सी सभी दिशाएं 

नीरव चुप्पी टूटी।।


नील व्योम पर कलरव करती 

उड़े विहग की टोली 

कितनी मधुर रागिनी जैसी 

श्याम मधुप की बोली 

कुंदन वसन अरुण ने पहने 

बीती रात कलूटी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 17 December 2020

कदाचार


 कदाचार


एक लालसा में लिपटा है

किसे बुलाता कर मंथन।

मोद झूठ है पल दो पल का 

देता तमस औ अचिंतन ।


जब जब चढ़ता नशा क्रोध का

आंखों में उफने लोहित 

बान समझ कर अकबक बकता 

विकराल काल ज्यों मोहित

करे धोंकनी सा धुक धुक फिर

बढ़ता उर में फिर स्पंदन।।


प्रवंचना का जाल बिछाकर

मनुज मनुज को ठगता है

छल प्रपंच का खोदा गड्ढा

रात दिवस फिर भगता है

कदाचार में आसक्त रहे

सदभावों का हुआ हनन।।


विषय मोह में उलझा प्राणी

पतन राह को गमन करे

समय रहते सँभल जो जाये

विनाश पथ का शमन करे

लोभ कपट अब व्यसन रोग से

मुक्ति युक्ति का कर चिंतन।।


       कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 16 December 2020

अप्रतिम सौंदर्य


 अप्रतिम सौन्दर्य 


हिम  से आच्छादित 

अनुपम पर्वत श्रृंखलाएँ

मानो स्फटिक रेशम हो बिखर गया

उस पर ओझल होते 

भानु की श्वेत स्वर्णिम रश्मियाँ 

जैसे आई हो श्रृँगार करने उनका 

कुहासे से ढकी उतंग चोटियाँ 

मानो घूँघट में छुपाती निज को

धुएँ सी उडती धुँध

ज्यों देव पाकशाला में

पकते पकवानों की वाष्प गंध

उजालों को आलिंगन में लेती

सुरमई सी तैरती मिहिकाएँ 

पेड़ों पर छिटके हिम-कण

मानो हीरण्य कणिकाएँ बिखरी पड़ी हों

मैदानों तक पसरी बर्फ़ जैसे

किसी धवल परी ने आंचल फैलया हो

पर्वत से निकली कृष जल धाराएँ

मानो अनुभवी वृद्ध के

बालों की विभाजन रेखा

चीङ,देवदार,अखरोट,सफेदा,चिनार 

चारों और बिखरे उतंग विशाल सुरम्य 

कुछ सर्द की पीड़ा से उजड़े 

कुछ आज भी तन के खड़े 

आसमां को चुनौती देते

कल कल के मद्धम स्वर में बहती नदियाँ 

उनसे झांकते छोटे बड़े शिला खंड 

उन पर बिछा कोमल हिम आसन

ज्यों ऋषियों को निमंत्रण देता साधना को

प्रकृति ने कितना रूप दिया  कश्मीर  को

हर ऋतु अपरिमित अभिराम अनुपम

शब्दों  में वर्णन असम्भव।


              कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


   " गिरा अनयन नयन बिनु बानी "

Friday, 11 December 2020

हिमालय पर वर्ण पिरामिड


 हिमालय पर चार वर्ण पिरामिड रचनाऐं। 

मैं
मौन
अटल
अविचल
आधार धरा
धरा के आँचल
स्नेह बंधन पाया।

ये
स्वर्ण
आलोक
चोटी पर
बिखर गया 
पर्वतों के पीछे
भास्कर मुसकाया।

हूँ
मैं भी
बहती
अनुधारा
अविरल सी
उन्नत हिम का
बहता अनुराग।

लो
फिर
झनकी
मधु वीणा
पर्वत राज
गर्व से हर्षया 
फहराया तिरंगा।

Wednesday, 9 December 2020

अवमानना


 अवमानना


बंधन तोड़ निर्बाध उड़ता

पखेरूंओं सा मन भटकने।


छेड़ तान गाता कोई कब 

साज सभी जब बिखरे टूटे।

इक तारे की राग बेसुरी

पंचम के गति स्वर भी छूटे।

सभी साधना रही अधूरी

लगी सोच पर थाप अटकने।।


चुप चुप है सब आज दिशाएँ

अवमानना के भाव मुखरित।

भग्न सभी निष्ठा है छिछली

प्रश्न सारे रहे अनुत्तरित।

पस्त हुआ संयम हरबारी

मौन लगा फिर देख खटकने।।


अबोध गति अंतर की भागे

चाबुक ख़ाके जैसे घोड़ा

बहती है अविराम वेदना 

निहित कहीं तो स्नेह थोड़ा

डोर थामली सूंत सुघड़ तब

लगे विचारों को झटकने।।


     कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Tuesday, 8 December 2020

असर अब गहरा होगा।


 असर अब गहरा होगा
फ़क़त खारा पन न देख, अज़ाबे असीर होगा
मुसलसल  बह गया तो फिर बस समंदर होगा । 

दिन ढलते ही आँचल आसमां का सुर्ख़रू होगा।
रात का सागर लहराया न जाने कब सवेरा होगा।

तारों ने बिसात उठा ली असर अब  गहरा होगा ।
चांद सो गया जाके, अंधेरों का अब पहरा होगा ।

छुपा है परदों में कितने,जाने क्या राज़ गहरा होगा ।
अब्र के छटते ही बेनक़ाब  चांद का चेहरा होगा । 

साये दिखने लगे  चिनारों पे, जाने अब क्या होगा।
मुल्कों के तनाव से चनाब का पानी ठहरा होगा ।
                   
                    कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 3 December 2020

निसर्ग को उलाहना


 निसर्ग को उलाहना

लगता पहिया तेज चलाकर
देना है कोई उलाहना
तुमने ही तो गूंथा होगा
इस उद्भव का ताना बाना ।।

थामे डोर संतुलन की फिर
जड़ जंगम को नाच नचाते 
आधिपत्य उद्गम पर तो क्यों
ऐसा  नित नित झोल रचाते  
काल चक्र निर्धारित करके
भूल चुके क्या याद दिलाना।

कैसी विपदा भू पर आई
चंहु ओर तांडव की छाया
पैसे वाले अर्थ चुकाकर
झेल रहे हैं अद्भुत माया
औ निर्धन का हाल बुरा है
बनता रोज काल का दाना।।

कैसे हो विश्वास कर्म पर
एक साथ सब भुगत रहे हैं
ढ़ाल धर्म की  टूटी फूटी
मार काल विकराल सहे हैं
सुधा बांट दो अब धरणी पर
शिव को होगा गरल पिलाना।।

कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Saturday, 28 November 2020

अप्सरा सी कौन


 अप्सरा सी कौन 


अहो द्युलोक से कौन अद्भुत

हेमांगी वसुधा पर आई।

दिग-दिगंत आभा आलोकित

मरुत बसंती सरगम गाई।।


महारजत के वसन अनोखे 

दप दप दमके कुंदन काया

आधे घूंघट चन्द्र चमकता

अप्सरा सी ओ महा माया

कणन कणन पग बाजे घुंघरु

सलिला बन कल कल लहराई।।


चारु कांतिमय रूप देखकर  

चाँद लजाया व्योम ताल पर

मुकुर चंद्रिका आनन शोभा

झुके झुके से नैना मद भर

पुहुप कली से अधर रसीले

ज्योत्सना पर लालिमा छाई।‌।


कौमुदी  कंचन संग लिपटी 

निर्झर जैसा झरता कलरव

सुमन की ये लगे सहोदरा

आँख उठे तो टूटे नीरव

चपल स्निग्ध निर्धूम शिखा सी

पारिजात बन कर  लहराई।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 27 November 2020

दर्पण दर्शन


 दर्पण दर्शन


आकांक्षाओं के शोणित 

बीजों का नाश 

संतोष रूपी भवानी के

हाथों सम्भव है 

वही तृप्त जीवन का सार है।


"आकांक्षाओं का अंत "। 


ध्यान में लीन हो

मन में एकाग्रता हो 

मौन का सुस्वादन

पियूष बूंद सम 

अजर अविनाशी। 


शून्य सा, "मौन"। 

 

मन की गति है 

क्या सुख क्या दुख 

आत्मा में लीन हो 

भव बंधनो की 

गति पर पूर्ण विराम ही।


परम सुख,.. "दुख का अंत" । 


पुनः पुनः संसार 

में बांधता 

अनंतानंत भ्रमण 

में फसाता 

भौतिक संसाधन।

 यही है " बंधन"। 


स्वयं के मन सा 

दर्पण 

भली बुरी सब 

दर्शाता 

हां खुद को छलता 

मानव।

" दर्पण दर्शन "।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 24 November 2020

भाव पाखी


 भाव पाखी


खोल दिया जब मन बंधन से

उड़े भाव पाखी बनके 

बिन झांझर ही झनकी पायल

ठहर ठहर घुँघरू झनके।


व्योम खुला था ऊपर नीला

आँखों में सपने प्यारे

दो पंखों से नील नाप लूँ

मेघ घटा के पट न्यारे

खुला एक गवाक्ष छोटा सा

टँगे हुए सुंदर मनके।।


अनुप वियदगंगा लहराती 

रूपक ऋक्ष खिले पंकज

जैसे माँ के प्रिय आँचल में 

खेल रहा है शिशु अंकज।

बिखर रहा था स्वर्ण द्रव्य सा  

बिछा है चँदोवा तनके।।


फिर घर को लौटा खग वापस

खिला खिला उद्दीप्त भरा।

और चहकने लगा मुदित 

हर कोना था हरा हरा।

खिलखिल करके महक रहे थे 

पात हरति हो उपवन के।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Saturday, 21 November 2020

सुधि वरण


सुधि वरण
 

ढलती रही रात 

चंद्रिका के हाथों

धरा पर एक काव्य का

सृजन होता रहा

ऐसा अलंकृत रस काव्य

जिसे पढने

सुनहरी भास्कर

पर्वतों की उतंग

शिखा से उतर कर

वसुंधरा पर ढूंढता रहा

दिन भर भटकता रहा

कहां है वो ऋचाएं

जो शीतल चांदनी

उतरती रात में 

रश्मियों की तूलिका से

रच गई

खोल कर अंतर

दृश्यमान करना होगा

अपने तेज से

कुछ झुकना होगा

उसी नीरव निशा के

आलोक में

शांत चित्त हो

अर्थ समझना होगा

सिर्फ़ सूरज बन

जलने से भी

क्या पाता इंसान

ढलना होगा

रात  का अंधकार

एक नई रोशनी का

अविष्कार करती है

वो रस काव्य सुधा

शीतलता का वरदान है

सुधी वरण करना होगा ।।


        कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 19 November 2020

प्रारब्ध और पुरुषार्थ


 प्रारब्ध और पुरुषार्थ


भूखी भूख विकराल दितिजा 

जीवन ऊपर भार बनी।

मीठी नदियाँ मिली सिंधु से

बूंद बूंद तक खार बनी।


बिन ऊधम तो जीवन देखा

रुकी मोरी का पंक है 

मसक उड़ाते पहर आठ जब

लगता तीक्ष्ण सा डंक है 

लद्धड़ बन जो बैठे उनकी

फटकर चादर तार बनी ।।


निर्धन दीन निस्हाय निर्बल

कैसा प्रारब्ध ढो रहे

अकर्मण्य भी बैठे ठाले 

नित निज भाग्य को रो रहे

टपक रहा था श्रम जब तन से 

रोटी का आधार बनी।


प्यासे को है चाह नीर की

कुआं खोद पानी लाए 

टूट जाते नीड़ पंछी के

जोड़ तिनके घर बनाए 

सफलता उन्हें मिली जिनकी

हिम्मत ही आधार बनी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 17 November 2020

कवि के स्वर पन्नों पर


 कवि के स्वर पन्नों पर


नयन मुकुर हो आज बोलते

बंद होंठ में गीत हुए।।


अव्यक्त लेखनी में रव है

कौन मूक ये शब्द पढ़े

जब फड़फड़ा बुलाते पन्ने

मोहक लेख मानस गढ़े

फिर उभरती व्यंजनाएं कुछ

भाव शल्यकी मीत हुए।।


रूखे मरू मधुबन बनादे

काव्य सार बह के बरसे

खिले कुसुम आकाश मधुरिमा

तम पर चंदनिया सरसे

मृदुल थाप बादल पर बजती

मारुत सुर संगीत हुये।।


कविता जो रुक जाये तो फिर

कल्पक कब जीवित रहता

रुकी लेखनी द्वंद हृदय में

फिर कल्पना कौन कहता

मौन गूँजते मन आँगन में

कंपित से भयभीत हुये।।


   कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 11 November 2020

दीपमाला


 दोहा छंद- दीप माला

1

नीले निर्मल व्योम से, चाँद गया किस ओर।

दीपक माला सज रही, जगमग चारों छोर।


2 दीप मालिका ज्योति से, झिलमिल करता द्वार।

आभा बिखरी सब दिशा, नही हर्ष का पार।


3 पावन आभा ज्योति का, फैला  पुंज प्रकाश।

नाच रहा मन मोर है, सभी दिशा उल्लास।। 


4दूर हुआ जग से तमस छाया है उजियार।

जन जन में बढ़ता रहे, घनिष्ठता औ प्यार।


5 स्वर्ण रजत सा दीप है, माँ के मंदिर आज।

 रिद्धि-सिद्धि घर पर रहे, करना पूरण काज।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 8 November 2020

आज नया एक गीत लिखूं


 आज नया एक गीत लिखूँ मैं । 


           वीणा का गर

           तार न झनके 

           मन  का कोई

           साज लिखूँ मैं।

आज नया एक गीत लिखूँ मैं।


            मीहिका से

        निकला है मन तो 

          सूरज की कुछ

          किरण लिखूँ मैं।

 आज नया एक गीत लिखूँ मैं।


              धूप सुहानी

            निकल गयी तो  

               मेहनत का

           संगीत  लिखूँ मैं।

   आज नया एक गीत लिखूँ मै।


             कुछ खग के

           कलरव लिख दूँ

           कुछ कलियों की

           चटकन लिख दूँ

   आज नया एक गीत लिखूँ मैं।


           क्षितिज मिलन की

                मृगतृष्णा है 

               धरा मिलन का

              राग लिखूँ मैं ।

  आज नया एक गीत लिखूँ मैं ।


                 चंद्रिका ने

              ढका विश्व को 

              शशि प्रभा की

            प्रीत  लिखूँ मैं ।

    आज नया एक गीत लिखूँ मैं।


            कसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Thursday, 5 November 2020

ऐ चाँद


 ऐ चाँद तुम...


ऐ तुमचाँद

कभी किसी भाल पर

बिंदिया से चमकते हो 

कभी घूँघट की आड़ से

झाँकता गोरी का आनन 

कभी विरहन के दुश्मन 

कभी संदेश वाहक बनते हो

क्या सब सच है 

या है कवियों की कल्पना 

विज्ञान तुम्हें न जाने 

क्या क्या बताता है

विश्वास होता है 

और नहीं भी 

क्योंकि कवि मन को  

तुम्हारी आलोकित 

मन को आह्लादित करने वाली 

छवि बस भाती 

भ्रम में रहना सुखद लगता

ऐ चांद मुझे तुम 

मन भावन लगते 

तुम ही बताओ तुम क्या हो

सच कोई जादू का पिटारा 

या फिर धुरी पर घूमता 

एक नीरस सा उपग्रह बेजान।।

ऐ चांद तुम.....


      कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 3 November 2020

अनासक्त निर्झर

 अनासक्त निर्झर


शैल खंड गिर चोटिल होते

फिर भी मोती झरते जैसे

चोट लगे कभी हृदय स्थल पर

सह जाते सब पीड़ा ऐसे।


किस पर्वत की ऊंची चोटी

बर्फ पसर कर लम्बी सोती

रेशम जैसे वस्त्र पहनती

धूप मिले तो कितना रोती

जन्म तुम्हारा हुआ पीर से

और बने निर्झर तुम तैसे।।


पथरीले सोपान उतरकर

रुकता नही निरंतर चलता

प्रचंड़ कभी गंभीर अथाह

धूप ताप में हरपल जलता

पर्वत का आँसू है झरना

नदी हर्ष की गाथा कैसे ।।


झील पोखरा सरिता बनकर

निज आख्या तक भी छोड़ जिये

एक पावनी गंगा बनकर 

फिर जाने कितने त्याग किये

लेना चाहे ले सकता है

नही नीर के कोई पैसे ।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


Sunday, 1 November 2020

एक ऐसा गीत

 कोई ऐसा गीत सुना दूँ

सुन के जिस को हर दिल झूमें

एक ऐसा गीत सुना दूँ।


बंद कली घूंघट पट खोले

भँवरे भी घायल हो डोले

कुहुक उठे  कोयलिया

ठहरी पायल बोले।


कोई ऐसा गीत सुना दूँ। 


जिन होठों से गीत हैं छूटे

उन पर तान सजा दू़

जिन आँखों से सपने रुठे

सपने सरस सजा दूँ।


कोई ऐसा गीत सुना दूँ ।


 


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Wednesday, 28 October 2020

लालसा

 लालसा


है छलावा हर दिशा में 

धुंध के बादल उमड़ते 


दिन सजाता कामनाएं 

वस्त्र बहु रंगीन पहने 

श्याम ढ़लते लाद देते 

रत्न माणिक हीर गहने 

स्वप्न नित बनकर पखेरू 

बादलों के पार उड़ते।


बाँध कर के पाँख मोती 

मन अधीरा फिर भटकता 

नापता है विश्व सारा 

मोह जाले में अटकता 

भूलता फिर सब विवेकी 

ज्ञान के तम्बू उखड़ते।।


लालसा का दास मानव 

नाम की बस चाह होती 

अर्थ के संयोग से फिर 

भावना की डोर खोती 

द्वेष की फिर आँधियों में 

मूल्य के उपवन उजड़ते।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


Thursday, 22 October 2020

कर्तवय उनमुक्त

 कर्तव्य उन्मुक्त


नीलम सा नभ उस पर खाली डोलची लिये 

स्वच्छ बादलों का स्वच्छंद विचरण

अब  उन्मुक्त  हैं कर्तव्य  भार से 

सारी सृष्टि  को जल का वरदान 

 मुक्त हस्त दे आये सहृदय 

अब बस कुछ दिन यूं ही झूमते घूमना 

चाॅद  से अठखेलियां हवा से होड

नाना नयनाभिराम रूप मृदुल श्वेत 

चाँद  की चाँदनी में चाँदी सा चमकना

उड उड यहां वहां बह जाना फिर थमना

धवल शशक सा आजाद  विचरन करना

कल फिर शुरू करना है कर्म पथ का सफर

फिर  खेतों में खलिहानों में बरसना

फिर पहाडों पर नदिया पर गरजना

मानो धरा को सींचने स्वयं को न्योछावर होना। 


               कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


Sunday, 18 October 2020

जीवन संतुलन

 जीवन संतुलन


चलो भूल जाओ अब सब कुछ

गाँठ खोल दो मन की

डर लगता क्यों देख रहे हो

तीर दृष्टि चितवन की।।


परायापन दुश्वार लगता

अलगाव भाव प्रतीति

अन्जाने हो जाती गलती 

जग की है यही रीति

आज छोड़ कर मतभेदों को

बात करें अर्जन की।।


जीवन की बीहड़ राहों पर

हाथ थाम कर चलना

अपनी राह कभी जो बदलो 

सूरज जैसे ढलना

नयी प्रभाती लेकर आना

रंगत चंपक वन की।।


मानव मन दुर्बल है जानों

कच्ची माटी फिसलन 

ढ़ोर हांकते चरवाहे सी

ढुलमुल डांडी डगमग

सदा प्रीत को मन संजोना

गुणवत्ता जावन की।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


Sunday, 11 October 2020

अवगुंठन में बालाएं

 अवगुंठन में बालाएं

कोख कैद से बच आई ,

अवगुंठन लाचारी

कितना अभी सफर लम्बा,

लिए  वेदना भारी ।।


नैन में मोती समेटे

ऊपर से दृढ  दिखती

रात दिवस अन्यचित्तता

भाग्य लेखनी लिखती

कितने युगों तक करेगी

फटे हुए को कारी।।


उड़े नापले नीला नभ

कितनी आशा पाली

बंद आँखे सपनों भरी

खूली तिक्ता खाली ‌

मन से गढ़ती काष्ठ महल

स्वयं चलाती आरी।।


भय समेटेअस्मिता का

सहित वर्जना जीती

भरती है जग आँगन को

रह जाती है रीती

पत्ते ऊपर झरी ओस 

खाली होती झारी।।


 कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


Friday, 9 October 2020

पनिहारी

 पनिहारी


चल सखी ले घट पनघट चलें 

राह कठिन बातों में निकले


अपने मन की कह दूं कुछ तो

कुछ सुनलूं तुम्हारे हृदय की

साजन जब से परदेश गये

परछाई सी रहती भय की

कुछ न सुहाता है उन के बिन

विरह प्रेम  की बस हूक जले।।


अब कुछ भी रस नहीं लुभाते

बिन कंत पकवान भी फीके

कजरा गजरा मन से उतरे

न श्रृंगार लगे मुझे नीके

 रैन दिवस नैना ये बरसते

श्याम हुवे कपोल भी उजले।।


कहो सखी अब अपनी कह दो

अपने व्याकुल मन की बोलो

क्या मेरी सुन दृग हैं छलके

अंतर रहस्य तुम भी खोलो

खाई चोट हृदय पर गहरी

या फिर कोई विष वाण चले।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


Thursday, 8 October 2020

क्या लिखे लेखनी

 क्या लिखें लेखनी


पीड़ा कैसे लिखूँ

दृग से बह जाती है

समझे कोई न मगर

कुछ तो ये कह जाती है

तो फिर हास लिखूँ

परिहास लिखूँ

नहीं कैसे जलते

उपवन पर रोटी सेकूँ

मानवता रो रही 

मैं हास का दम कैसे भरूँ

करूणा ही लिख दूँ

बिलखते भाग्य पर

अपनी संवेदना 

पर कैसे कोई मरहम

होगा मेरी कविता से

कैसे पेट भरेगा भूख का

कैसे तन को स्वच्छ 

वसन पहनाएगी 

मेरी लेखनी

क्या लू से जलते 

की छाँव बनेगी 

किसी के सर पर छत

या आश्वासनों का 

कोरा दस्तावेज

नहीं ऐसी कहानी 

क्यों लिखूँ मैं

जो रोते को दहलादे

हँसते की हँसी चुराले

कविता दो निवाले 

खिला दो मानवता को

सिर्फ रोटी ही बन जाओ

नमक का जुगाड़

तो क्षुधा से व्याकुल 

कर ही लेगा ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


Friday, 2 October 2020

विश्व के छाले सहला दो

 


 

विश्व के छाले सहला दो!

ओ चाँद कहां छुप बैठे हो

ढ़ूंढ़ रही है तुम्हें दिशाएं

अपनी मुखरित उर्मियाँ

कहाँ समेट कर रखी है

क्या पास तुम्हारे भी है 

माँ के जैसा कोई प्याला

जिसमें स्नेह वशीभूत हो

वो छुपा दिया करती थी

सबकी नजरों से बचाकर

मेरे लिए नवनीत चूरमा

पर वो होता था मेरे लिए

तुम किसके लिए सहेज रहे

ये रजत किरणें दीप्त सी

खोलदो उन्हें आजाद करदो

बिखेर दो तम के साम्राज्य पर

साथ ही अमि सुधा की कुछ बूंदें

टपकादो विश्व के जलते छालों पर।।


    कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 1 October 2020

रव में नीरव

 रव में नीरव


नाव गर बँधी हो तो भी 

नदिया का बहना 

नाव तले रहता है 

जाना हो गर पार तो 

डालनी होती है

कश्ती मझधार में 

साहिलों पर रहने वालों को 

किनारों का कोई 

आगाज नही होता 

लड़ते भंवर से वो ही जाने 

किनारे क्या होते हैं

जो ढूंढ़ते एकांत 

स्वयं को खोजने

भटकते हैं बियावान में

कुछ नही पाते

स्वयं की तलाश में 

उतरते निज के जो अंदर

वो रव में भी नीरव पा जाते ।


    कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


Monday, 28 September 2020

 मेधा और मन


द्रोह उपजता प्रज्ञा में पर

कहलाता कोमल मन काला

छोटी छोटी बातों रचता

नया नया फिर फिर घोटाला।।


मनन पथिक विस्मृत भूला सा

होके अविवेकी फिर फँसता

चाहे सामने सभी प्रिय हो

पिछे जगत पर सारा हँसता

मति की पीछे क्या क्या भुगते

लगा बड़ा है गड़बड़ झाला ।।


कुछ अवधि तक रहे कृतज्ञता

मर कर फिर सदगति को पाती

उसे समझ कर्तव्य किसीका 

भावों की मति मारी जाती

करते हैं विद्रोह वहीं क्यों

उम्मीदों ने जिनको पाला।।


जीवन यात्रा कैसी अबूझ

कौन इसे समझा है अब तक

चक्र चले ये चले निरन्तर 

मेधा सृष्टि रहेगी जब तक

मतभेद अवसाद साथ रहे

चले सदा भावों का भाला।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


Thursday, 24 September 2020

तिश्नगी

 


 


तिश्नगी में डूबे रहे राहत को बेक़रार हैं

उजड़े घरौंदें जिनके वे ही तो परेशान हैं ।


रात के क़ाफ़िले चले कौल करके कल का

आफ़ताब छुपा बादलों में क्यों पशेमान है ।


बसा लेना एक संसार नया, परिंदों जैसे

थम गया बेमुरव्वत अब कब से तूफ़ान है ।


आगोश में नींद के भी जागते रहें कब तक

क्या सोच सोच के आखिर अदीब हैरान है ।


शज़र पर चाँदनी पसरी थक हार कर 

आसमां पर माहताब क्यों गुमनाम है ।


             कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


पशेमान - लज्जित, शर्मिन्दा। 

बेमुरव्वत - सहानुभूतिहीन  या अवसरवादी।

अदीब - रचनाकार, कलाकार या साहित्य कार।

Tuesday, 22 September 2020

काव्य सिरोमणि

 रामधारी सिंह दिनकर जी के जन्मदिवस पर 


कवि शिरोमणि कवि श्रृंगार।


ओज क्रांति विद्रोह भरा था

कलम तेज तलवार सम 

सनाम धन्य वो दिनकर था

काव्य जगत में भरता दम

सिरमौर कविता का श्रृंगार।।


कवि शिरोमणि,कवि श्रृंगार


स्वतंत्रता की हूंकार भरी

राष्ट्र कवि सम्मान मिला

आम जन का वो सूर्य बना

हलधर को चाहा हक दिला

नीरस में भर के रस श्रृंगार।।


कवि शिरोमणि कवि श्रृंगार


कुरुक्षेत्र कालजयी रचना

प्रणभंग, रश्मिरथी खण्डकाव्य 

संग्रह कविता के धार दार

लेखक ,कवि,औ साहित्यकार

उर्वशी काव्य नाटक श्रृंगार।।


कवि शिरोमणि,कवि श्रृंगार


भावों की सुरसरि थे पावन

कलम के धनी अभिराम

वीर ,श्रृंगार रस चरम उत्कर्ष

लिखे अद्भुत से भाव अविराम

नमन तूझे है काव्य श्रृंगार।।


कवि शिरोमणि,कवि श्रृंगार


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।


Friday, 18 September 2020

भावों के चंदन

 भावों के चंदन


भावों के चंदन जब महके

पतझर हो जाते मधुबन

स्निग्ध होते पाषाण भी जब

चीर फूटते स्रोत सघन।।


दृग राघव के पंकज सदृश्य

कालिमा में श्याम दिखते

भौरें की गुंजन सरगम सी

पात शयन मुक्ता करते 

अनुराग झरता मोद अंतस

सुवासित होता मन चमन।।


तारे तोड़ धरा पर लाता  

दिग-दिगंतों में भटकता 

आडोलित हो सरि तंरग सा

हर चहक में फिर अटकता

कोरे पृष्ठों पर कोरी सी

नित्य पढ़े कविता ये मन।।


हवा हिण्ड़ोले मेघ रमते 

झिलमिलाती दीप मणियाँ 

मुकुर सलिल छवि चंदा निरखे

उर्मियों से हीर कणियाँ

बिन आखर शुभ्र श्वेत पन्ने 

अभिवृत्तियाँ करती रमन।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।


डमरू घनाक्षरी पनघट

 डमरू घनाक्षरी  

पनघट


पनघट घट भर, न टहल चल पड़।

चरण कमल धर, मटक कमर चल।।

ठहर कलश रख, दम भर कर पद।

भटक डगर मत, परख दरश खल।।

हलचल मत कर, मगर परण चख।

नयन वरण कर, भरकर रख जल।।

नशवर जन तन, भरम जगत सब

भजन अगर कर, सकल करम टल ।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


Wednesday, 16 September 2020

सुन मनुज

 सुन मनुज


कदम जब रुकने लगे 

तो मन की बस आवाज सुन

गर तुझे बनाया विधाता ने

श्रेष्ठ कृति संसार में तो

कुछ सृजन करने होंगें 

तुझ को विश्व उत्थान में

बन अभियंता करने होंगें नव निर्माण

निज दायित्व को पहचान तू

कैद है गर भोर उजली

हरो तम बनो सूर्य

अपना तेज पहचानो

विघटन नही जोडना है तेरा काम

हीरे को तलाशना हो तो

कोयले से परहेज भला कैसे करोगे

आत्म ज्ञानी बनो आत्म केन्द्रित नही

पर अस्तित्व को जानो

अनेकांत का विशाल मार्ग पहचानो

जियो और जीने दो, 

मै ही सत्य हूं ये हठ है

हठ योग से मानवता का

विध्वंस निश्चित है

समता और संयम

दो सुंदर हथियार है

तेरे पास बस उपयोग कर

कदम रूकने से पहले

फिर चल पड़।।


 कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


Sunday, 13 September 2020

हिंदी हमारा अभिमान

 हिन्दी दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं।


हिन्दी और भारत


मेरे भारत देश का, हिन्दी है श्रृंगार । 

भाषा शीश की बिंदी, देवनागरी  सार ।

देवनागरी सार, बनी है मोहक भाषा ‌।

बढ़े सदा यश कीर्ति, यही मन की अभिलाषा।

अंलकार का वास, शब्द के अभिनव डेरे,

हिन्दी मेरा मान , ह्रदय में रहती मेरे ।।


              कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


Wednesday, 9 September 2020

यादों का पपीहा

 यादों का पपीहा 


शज़र-ए-हयात की शाख़ पर 

कुछ स्याह कुछ संगमरमरी 

यादों का पपीहा। 


खट्टे मीठे फल चखता गीत सुनाता 

उड़-उड़ इधर-उधर फुदकता 

यादों का पपीहा। 


आसमान के सात रंग पंखों में भरता 

सुनहरी सूरज हाथों में थामता 

यादों का पपीहा


चाँद से करता गुफ़्तगू बैठ खिडकी पर 

नींद के बहाने बैठता बंद पलकों पर

यादों का पपीहा।


टुटी किसी डोर को फिर से जोड़ता 

समय की फिसलन पर रपटता 

यादों का पपीहा।


जीवन राह पर छोड़ता कदमों के निशां

निड़र हो उड़ जाता थामने कहकशाँ 

यादों का पपीहा।


              कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'




अंधेेेरी रात में झील का सौंदर्य


घुप अंधेरी रातों दिखता

काला सा सरसी पानी।

तट पर प्रकाशित कुमकुमें लो

बनी आज देखो दानी‌।


समीर के मद्धिम बहाव में

झिलमिलाता नीर चंचल।

जैसे लहरा बंजारन का 

तारों जड़ा नील अंचल।

अधीर अनंत उतरा क्षिति पर

छुप गया है इंद्र मानी।


हिरण्य झुमका हेमांगी का

मंजुल शुभ रत्न जड़ा है।

रात रूपसी रूप देखकर

जड़ होके समय खड़ा है।

है  निसर्ग सौंदर्य बांटता

ज्ञान बांटता ज्यों ज्ञानी।।


दिशा सुंदरी चुप चुप लगती 

मौन झरोखे बैठी है‌ ।

गहन तमशा है शरवरी भी

मुंह मरोड़े ऐंठी है। 

जीवन वापिका में मचलता 

तम अचेत सा अभिमानी।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Saturday, 5 September 2020

वीर उद्यमी

 वीर उद्यमी


उद्यमी सदा निज प्रयत्न से

जय विजय पताका हाथ धरे

पर्वत का सीना चीर वीर

सुरतरंगिणी भू गोद झरे ।।


कौन रोक पाया मारुत को

अपने ही दम पर बहता है 

नही मेघ में क्षमता ऐसी 

सूरज कहाँ छुपा रहता है 

अलबेलों की शान आन का

डंका अंबर तक रोर भरे ।।


तुंग अंगुली धारण करले

शीला खंड वहन कर लाये

तोड़ा आसमान का सीना 

चाँद भूमि को छूकर आये

बाँध उर्मियाँ फिर सागर की 

नलनील सेतु निर्माण करे ।।


लोह पुरुष हुंकार लगाये 

वसुधा थर्रा उठती सारी

टंकार एक जो चाप लगी 

सदृश हुवे दो दो अवतारी

महिमा किसकी लिखे लेखनी

सहस्त्रों वीर क्षिति पर उतरे ।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


Tuesday, 1 September 2020

पथ के दावेदार नहीं हम

 पथ के दावेदार नहीं हम 

राही हैं हम एक राह के 

रह गुजर का साथ सभी का

लक्ष्य सभी का एक कहाँ है 

चलना है जब साथ समय कुछ

क्यों ना हंसी खुशी से चल दें

कुछ सुन लें, कुछ कह दें, 

अपनी भूली बिसरी यादें 

इन राहों से कितने गुजरे

डगर वही पर राह नयी हैं।।


पथ के दावेदार नही हम..

      कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'


Monday, 24 August 2020

प्रारब्ध

 प्रारब्ध


चंचल चाँद रजत का पलना 

 मंदाकिनी गोद में सोता ।


राह निहारे एक चकोरी  

कब अवसान दिवस का होगा

बस देखना प्रारब्ध ही था

सदा विरह उसने है भोगा

पलक पटल पर घूम रहा है

एक स्वप्न आधा नित रोता।।


विधना के हैं खेल निराले 

कोई इनको कब जान सका

जल में डोले शफरी प्यासी 

सुज्ञानी  ही पहचान सका

है भेद कर्म गति के अद्भुत 

वही काटता जो है बोता।।


सागर से आता जल लेकर 

बादल फिरता मारा मारा‌

लेकिन पानी रोक न पाता

चोट झेलता है बेचारा

प्रहार खाकर मेघ बरसता 

बार बार खाली वो होता।‌


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


रात सदा रात होती है

 रात सदा रात होती है।


रोशनी होना ही तो दिन नही है

रात सदा रात होती है,

चाहे चंद्रमा अपने शबाब पर हो 

प्रकाश की अनुपस्थिति अँधेरा है,

पर प्रकाश होना भर ही रात का अंत नही होता ।

निशा का गमन सूरज के आगमन से होता है ।

कृत्रिम रोशनी या चाँद का प्रकाश 

अँधेरे दूर  करते हैं रात नही।


             कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 17 August 2020

समय औचक कोड़ा

 समय औचक कोड़ा


गूंज स्वरों की मौन हुई जब

पाहन हुवा धड़कता तन।

मानस से उद्गार गये तो

चमन बना ज्यों उजड़ा वन।


नित नव सरगम रचता अंतस

हर इक सुर महका महका।

हिया सांरगी मौन हुई तो

गीत बने बहका बहका।

कैसे कोई तान छेड़ दे

फूट रहा हो जब क्रन्दन।।


मन की धुनकी धुनके थम थम

तान तार में सुर अटका।

टूट गया जो घिसते घिसते

बुझता अंगारा चटका।

कौन करेगा बातें कल की

आज अभी कर लो वंदन।।


समय दासता करता किसकी

औचक ही कोड़ा लगता। 

सिर ताने चलने वाला भी

ओधे मुंह गिरा करता।

मौका रहते साज साध लें

गीत महकते बन उपवन।।


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Sunday, 16 August 2020

बस एक मुठ्ठी आसमां

 बस एक मुठ्ठी आसमां


आकर हाथों की हद में सितारे छूट जाते हैं

हमेशा ख़्वाब रातों के सुबह में टूट जाते हैं। 


मंजर खूब लुभाते हैं, वादियों के मगर,

छूटते पटाखों से भरम बस टूट जाते हैं । 


चाहिए आसमां बस एक मुठ्ठी भर फ़कत,

पास आते से नसीब बस रूठ जाते हैं । 


सदा तो देते रहे आम औ ख़ास को मगर,

सदाक़त के नाम पर कोरा रोना रुलाते हैं।


तपती दुपहरी में पसीना सींच कर अपना,

रातों को खाली पेट बस सपने सजाते हैं।

            

           कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'।

Friday, 14 August 2020

तिरंगे की शान में

14/14 तिरंगे की शान में  सिर्फ अब न वादे होंगे  जीत की आशा फलेगी। ठान ले हर देश वासी रात तब गहरी ढलेगी।  लाखों की बलिवेदी पर  तिरंगे का इतिहास है। खोये कितने ही सपूत  जाकर मिला ये हास है। हर दिल में अब शान और मान की होली जलेगी।  मर्म तक कोई न भेदे   अब भी समय है हाथ में। हर दिशा में शत्रु फैले कर सामना मिल साथ में। आजादी की कीमत जब हर एक जन में पलेगी।  दुष्कर करदो जीना अब जो अमन को घायल करे। जीना वो जीना जानों हित देश के जीये मरे । ध्वज तिरंगा हाथ लेकर, इक हवा फिर से चलेगी।।  कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'












         तिरंगे की शान में


सिर्फ अब न वादे होंगे

 जीत की आशा फलेगी।

ठान ले हर देश वासी

रात तब गहरी ढलेगी।


लाखों की बलिवेदी पर

 तिरंगे का इतिहास है।

खोये कितने ही सपूत 

जाकर मिला ये हास है।

हर दिल में अब शान और

मान की होली जलेगी।


मर्म तक कोई न भेदे  

अब भी समय है हाथ में।

हर दिशा में शत्रु फैले

कर सामना मिल साथ में।

आजादी की कीमत जब

हर एक जन में पलेगी।

 

दुष्कर करदो जीना अब

जो अमन को घायल करे।

जीना वो जीना जानों

हित देश के जीये मरे ।

ध्वज तिरंगा हाथ लेकर,

इक हवा फिर से चलेगी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 12 August 2020

हरि कब आवोगे

 



जन्म दिवस तो नंद लाल का

हर वर्ष हम मनाते हैं,
पर वो निष्ठुर यशोदानंदन
कहां धरा पर आते हैं ,
भार बढ़ा है अब धरणी का
पाप कर्म इतराते हैं,
वसुधा अब वैध्व्य भोगती
कहां सूनी मांग सजाते हैं,
कण कण विष घुलता जाता
संस्कार बैठ लजाते हैं,
गिरावट की सीमा टूटी
अधर्म की पौध उगाते हैं,
विश्वास बदलता जाए छल में
धोखे की धूनी जलाते हैं,
मान अपमान की बेड़ी टूटी 
लाज छोड़ भरमाते हैं,
नैतिकता और सदाचार का
फूटा ढ़ोल बजाते हैं,
शरम हया के गहने को
बीते युग की बात बताते हैं,
चीर द्रोटदी का अब छोटा
दामोदर कहां बढ़ाते हैं,
काम बहुत ही टेढ़ा अब तो
भरे सभी के खाते हैं,
सर्वार्थ लोलुपता ऐसी फैली
भूले रिश्ते और नाते हैं,
ढोंग फरेब का जाल बिछा 
झुठी भक्ति जतलाते हैं,
मंच चढ़े और हाथ में माइक
शान में बस इठलाते हैं,
त्रसित है जग सारा अब तो
दर्द की चरखी काते है
आ जाओ करूणानिधि
अब हाथ जोड़ बुलाते हैं ।।
कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Sunday, 9 August 2020

विसंगतियाँ

विसंगतियाँ


कहीं उजली,  कहीं स्याह अंधेरों की दुनिया ,

कहीं आँचल छोटा, कहीं मुफलिसी की दुनिया। 


कहीं  दामन में चाँद और  सितारे भरे हैं ,

कहीं ज़िन्दगी बदरंग धुँआ-धुआँ ढ़ल रही है ।


कहीं हैं लगे हर ओर रौनक़ों के रंगीन मेले ,

कहीं  मय्यसर नही  दिन  को भी  उजाले । 


कहीं ज़िन्दगी महकती खिलखिलाती है

कहीं टूटे ख्वाबों की चुभती किरचियाँ है । 


कहीं कोई चैन और सुकून से सो रहा  है,

कहीं कोई नींद से बिछुड़ कर रो रहा है।


कहीं खनकते सिक्कों की  खन-खन है,

कहीं कोई अपनी ही मैयत  को ढो रहा है । 


              कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 7 August 2020

सीप की व्यथा

 सीप की व्यथा


हृदय में लिये बैठी थी

एक आस का मोती,

सींचा अपने वजूद से,

दिन रात हिफाजत की

सागर की गहराईयों में,

जहाँ की नजरों से दूर,

हल्के-हल्के लहरों के

हिण्डोले में झूलाती,

साँसो की लय पर

मधुरम लोरी सुनाती

पोषती रही सीप

अपने हृदी को प्यार से

मोती धीरे-धीरे

शैशव से निकल

किशोर होता गया,

सीप से अमृत पान

करता रहा तृप्त भाव से

अब यौवन मुखरित था

सौन्दर्य चरम पर था

आभा ऐसी की जैसे

दूध में चंदन दिया घोल

एक दिन सीप

एक खोजी के हाथ में

कुनमुना रही थी

अपने और अपने अंदर के

अपूर्व को बचाने

पर हार गई उसे

छेदन भेदन की पीडा मिली

साथ छूटा प्रिय हृदी का 

मोती खुश था बहुत खुश

जैसे कैद से आजाद

जाने किस उच्चतम

शीर्ष की शोभा बनेगा

उस के रूप पर

लोग होंगे मोहित

प्रशंसा मिलेगी

हर देखने वाले से 

उधर सीपी बिखरी पड़ी थी

दो टुकड़ों में

कराहती रेत पर असंज्ञ सी

अपना सब लुटा कर

व्यथा और भी बढ़ गई

जब जाते-जाते

मोती ने एक बार भी

उसको देखा तक नही,

बस अपने अभिमान में

फूला चला गया

सीप रो भी नही पाई

मोती के कारण जान गमाई

कभी इसी मोती के कारण

दूसरी सिपियों से

खुद को श्रेष्ठ मान लिया

हाय क्यों मैंने!! 

स्वाति का पान किया ।।


         कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'