क्षितिज के पार
सौरभ भीनी लहराई
दिन बसंती चार।
मन मचलती है हिलोरें
सज रहें हैं द्वार।
नीले-नीले अम्बर पर
उजला रूप इंदु
भाल सुनंदा के जैसे
सजता रजत बिंदु
ज्यों सजीली दुल्हन चली
कर रूप शृंगार।।
मंदाकिनी है केसरी
गगन रंग गुलाब
चँहु दिशाओं में भरी है
मोहिनी सी आब
चाँद तारों से सजा हो
द्वार बंदनवार।।
चमकते झिलमिल सितारे
क्षीर नीर सागर
क्षितिज के उस पार शायद
सपनों का आगर
आ चलूँ मैं साथ तेरे
क्षितिज के उस पार।।
कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


