सूरज नीचे उतरा आहिस्ता
देखो संध्या इठलाके आई
रूप सुनहरा फैला मोहक
शरमा के फिर मुख छुपाया
रजनी ने नीलांंचल खोला
निशि गंधा भी महक चला
भीनी भीनी सौरभ छाई
हीमांशु गगन भाल चमका
धवल आभा से चमके तारे
निशा चुनरी पर जा बिखरे
रात सिर्फ़ अंधकार नही है
एक सुंदर विश्राम भी है
तन,मन का औ जीवन का
एक नया सोपान भी है ।
कुसुम कोठारी।
देखो संध्या इठलाके आई
रूप सुनहरा फैला मोहक
शरमा के फिर मुख छुपाया
रजनी ने नीलांंचल खोला
निशि गंधा भी महक चला
भीनी भीनी सौरभ छाई
हीमांशु गगन भाल चमका
धवल आभा से चमके तारे
निशा चुनरी पर जा बिखरे
रात सिर्फ़ अंधकार नही है
एक सुंदर विश्राम भी है
तन,मन का औ जीवन का
एक नया सोपान भी है ।
कुसुम कोठारी।






