अथाह सागर में, अनंत प्यास
सब अपनी चाल चले
मध्यम,द्रुत गति,
कोई रुके, ठहरे।
अथाह सागर में
मीन की प्यास की
कोई थाह नही
चले निरन्तर
किसकी तलाश
कोई नही जाने
ढूंढ रही है क्या ?
वो सुधा ! जो
सुर ,सुरपति,
ले के दूर चले
या उत्कर्ष करने
निज प्राण व्याकुल
गरल घट लखे
अनंत में यों डोले
फिर भी मन वेदना
का एक तार ना खोले
कब तक यूंही भटकेगी
प्यास अबूझ लिये ।
कुसुम कोठारी ।
सब अपनी चाल चले
मध्यम,द्रुत गति,
कोई रुके, ठहरे।
अथाह सागर में
मीन की प्यास की
कोई थाह नही
चले निरन्तर
किसकी तलाश
कोई नही जाने
ढूंढ रही है क्या ?
वो सुधा ! जो
सुर ,सुरपति,
ले के दूर चले
या उत्कर्ष करने
निज प्राण व्याकुल
गरल घट लखे
अनंत में यों डोले
फिर भी मन वेदना
का एक तार ना खोले
कब तक यूंही भटकेगी
प्यास अबूझ लिये ।
कुसुम कोठारी ।






