कर्तव्य उन्मुक्त
नीलम सा नभ उस पर खाली डोलची लिये
स्वच्छ बादलों का स्वच्छंद विचरण
अब उन्मुक्त हैं कर्तव्य भार से
सारी सृष्टि को जल का वरदान
मुक्त हस्त दे आये सहृदय
अब बस कुछ दिन यूं ही झूमते घूमना
चाॅद से अठखेलियां हवा से होड
नाना नयनाभिराम रूप मृदुल श्वेत
चाँद की चाँदनी में चाँदी सा चमकना
उड उड यहां वहां बह जाना फिर थमना
धवल शशक सा आजाद विचरन करना
कल फिर शुरू करना है कर्म पथ का सफर
फिर खेतों में खलिहानों में बरसना
फिर पहाडों पर नदिया पर गरजना
मानो धरा को सींचने स्वयं को न्योछावर होना।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






