कहो तो गुलमोहर
मई जून में भी यूं खिल-खिल
बौराये बसंत हुवे जाते हो ।
कहो तो गुलमोहर कैसे !
गर्मी में यूं मुस्कुराते हो ?
कहो क्या होली पर भटक
कहीं दूर गली जाते हो
चटकिला रंग लिए अब
किससे फाग खेलने आते हो।
छाया घनेरी मन भावन
पथिक को लुभाते हो
धानी चुनरी रेशमी लाल
बूंटों से सज जाते हो ।
रंगत से अपनी सूरज से
तुम होड़ लेते रहते हो
गर्मी से लड़ने को सुर्खरु
तमतमाऐ से रहते हो।
मस्त हो इतराते रहते हो
गुनगुनाते गीत गाते हो
झूम झूम लहरा कर
पाखियों को न्योता देते हो।
पढ़ाते हो पाठ जिंदगी में
कितनी भी धूप हो
एहसासों की रंगत का
कम कभी ना सरूप हो।
कुसुम कोठारी।
मई जून में भी यूं खिल-खिल
बौराये बसंत हुवे जाते हो ।
कहो तो गुलमोहर कैसे !
गर्मी में यूं मुस्कुराते हो ?
कहो क्या होली पर भटक
कहीं दूर गली जाते हो
चटकिला रंग लिए अब
किससे फाग खेलने आते हो।
छाया घनेरी मन भावन
पथिक को लुभाते हो
धानी चुनरी रेशमी लाल
बूंटों से सज जाते हो ।
रंगत से अपनी सूरज से
तुम होड़ लेते रहते हो
गर्मी से लड़ने को सुर्खरु
तमतमाऐ से रहते हो।
मस्त हो इतराते रहते हो
गुनगुनाते गीत गाते हो
झूम झूम लहरा कर
पाखियों को न्योता देते हो।
पढ़ाते हो पाठ जिंदगी में
कितनी भी धूप हो
एहसासों की रंगत का
कम कभी ना सरूप हो।
कुसुम कोठारी।






