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Friday, 3 May 2019

एक निष्ठ सूरज

एक निष्ठ सूरज

ओ विधाता के
अनुपम खिलौने !

चंचल शिशु से तुम
कभी आसमां
छूने लगते
कभी सिंधु में
जा गोते लगाते
दौड़े फिरते
दिनभर
प्रतिबद्धता
और निष्ठा से
फिर थककर
काली कंबली
ओढकर सो जाते
उठकर प्रभात में
कनक के पहनते
वसन आलोकित
छटा फैलाते
ब्रहमाण्ड से धरा तक
कभी मिहिका का
ओढ आंचल
गोद में माँ के
सो जाते
जैसे कोई
दिव्य कुमार
कभी देते सुकून
कभी झुलसाते
कभी बादलों
की ओट में
गुम हो जाते
ये तो बताओ
पहाड़ी के पीछे
क्यों तुम जाते
नाना स्वांग रचाते
अपनी प्रखर
रश्मियों से
कहो क्या
खोजते रहते
दिन सारे ?

ओ विधाता के
अनुपम ! खिलौने।
    कुसुम कोठारी।

Thursday, 2 May 2019

फुरसत ए जिंदगी


फुरसत -ए ज़िंदगी कभी तो हो रू-ब-रू
ढल चला आंचल अब्र का भी हो  सुर्ख़रू ।

पहरे बिठाये थे आसमाँ पर आफ़ताब के
वो ले  गया इश्राक़ आलम हुवा बे-आबरू ।

चलो चाँद पर कुछ क़समे उठा देखा जाए
चमकता रहा माहताबे अल शब-ए आबरू।

इश्राक़=चमक
अल =कला

               कुसुम कोठारी।

Wednesday, 1 May 2019

श्रमिक दिवस पर एक चिंतन

एक चिंतन

कवि काव्य, साहित्यकार साहित्य और भी लेखन कला में हम श्रमिक और गरीब को भर-भर लिखते हैं पर एक मजदूर को उससे कितना सरोकार है ? सोचें !!

मजदूर नाम से ही एक कर्मठ पर बेबस लाचार सा व्यक्तित्व सामने आ खड़ा होता है जिसकी सारी जिंदगी बस अपना और परिवार का पेट भर जाय इतनी जुगाड़ में निकल जाता है ।सारा परिवार बच्चों सहित लगा रहता है मजदूरी में पर वो भी सदैव मयस्सर नहीं होती। आधे दिन  फाके की नौबत रहती है, बिमारी में उधारी और पास का सब कुछ बिक जाता है फिर भी सब कुछ सापेक्ष नही होता।
बस एक मजदूर के नाम पर एक साधन हीन चेहरा उभर कर आता है जिसे हम गरीब कहते हैं।

और उसी गरीब  पर *राष्ट्रपिता* के कुछ उद्दगार हृदय-स्पर्शी मर्म को भेदते ....

"गरीबों का काव्य ,समाज ,और रचनात्मकता कितनी?"

"भारत के विस्तृत आकाश के नीचे मानव -पक्षी रात को सोने का ढ़ोंग करता है, भुखे पेट उसे जरा भी नींद नही आती और जब वह सुबह बिस्तर से उठता है तब उसकी शक्ति पिछली रात से कम हो जाती है।

लाखों मानव-पक्षियों को रात भर भूख प्यास  से पीड़ित रहकर जागरण करना पड़ता है अथवा जाग्रत सपनों में उलझे रहना पड़ता है ।
यह अपने अपने अनुभव की, अपनी समझ की, अपनी आँखों देखी  अकथ दुखपूर्ण अवस्था और कहानी है।
कबीर के गीतों से इस पीड़ित मानवता को सान्त्वना दे सकना असम्भव है ।
यह लक्षावधि भूखी मानवता हाथ फैलाकर, जीवन के पंख फड़फड़ाकर कराहकर केवल एक कविता माँगती है _पौष्टिक भोजन ।"

श्री विष्णुप्रभाकर जी के एक उपन्यास
" तट के बंधन " से लिया ये एक पत्र है जो महात्मा गांधी ने रविन्द्र नाथ टैगोर को लिखा था ।

एक संकलन......

Tuesday, 30 April 2019

कैसी शुभकामनाएं


आज विश्व श्रमिक दिवस किस को दूं शुभकामनाएं?

मेहनतकश आज भर की
जुगाड़ नही कर पाता
कल की क्या सोचे,
भुखा बिलखता बचपन
पेट भी नही भर पाता
पढने की क्या सोचे ,
कैसी विडम्बना है कि कोई
महल दो महले पाकर भी खुश नही   
और कोई एक वक्त का
काम मिलते ही खुश हो जाता
यही है सत्य का बिलखता चेहरा
पर कोई देखना नही चाहता  ।

          कसुम कोठारी ।

Monday, 29 April 2019

सभी को कुछ तलाश है


निशिगंधा की भीनी
मदहोश करती सौरभ
चांदनी का रेशमी
उजला वसन
आल्हादित करता
मायावी सा मौसम
फिर झील का अरविंद
उदास गमगीन क्यों
सूरज की चाहत
प्राणो का आस्वादन है
रात कितनी भी
मनभावन हो
कमल को सदा चाहत
भास्कर की लालिमा है
जैसे चांद को चकोर
तरसता हर पल
नीरज भी प्यासा बिन भानु
पानी के रह अंदर,
ये अपनी अपनी
प्यास है  देखो
बिन शशि रात भी
उदास है देखो।

  कुसुम कोठरी

Thursday, 25 April 2019

एक गुलाब की वेदना

एक गुलाब की वेदना

कांटो में भी हम महफूज़ थे।

खिलखिलाते थे ,सुरभित थे ,
हवाओं से खेलते झुलते थे ,
हम मतवाले कितने खुश थे ।

कांटो में भी हम महफूज़ थे ।

फिर तोड़ा किसीने प्यार से ,
सहलाया हाथो से , नर्म गालों से ,
दे डाला हमे प्यार की सौगातों में ।

कांटो में भी हम महफूज़ थे ।

घड़ी भर की चाहत में संवारा ,
कुछ अंगुलियों ने हमे दुलारा ,
और फिर पंखुरी पंखुरी बन बिखरे ।

कांटो में भी महफूज थे हम ।
हां तब कितने  खुश थे हम।।

            कुसुम कोठारी ।

मौजों सा बचपन

पानी पर  चलता है वो मौजों सा बचपन।

ना डर ना फिकर,मदमाता सा बचपन
सागर नापले हाथों से,वो भोला सा  बचपन।

लहरों का खिलौना, थामले हाथ में मस्त सा बचपन
जल परी बन तंरगित हो,नाचता गाता  बचपन ।

लहरों सा थिरकता, अल्हड सा बचपन
फूलों सा खिलता,वो खिलखिलाता बचपन।

तितलियों सा उडता, वो इठलाता बचपन
सब कुछ दे दूं ,गर मिल जाय वो बीता बचपन।

                कुसुम कोठारी।