एक गुलाब की वेदना
कांटो में भी हम महफूज़ थे।
खिलखिलाते थे ,सुरभित थे ,
हवाओं से खेलते झुलते थे ,
हम मतवाले कितने खुश थे ।
कांटो में भी हम महफूज़ थे ।
फिर तोड़ा किसीने प्यार से ,
सहलाया हाथो से , नर्म गालों से ,
दे डाला हमे प्यार की सौगातों में ।
कांटो में भी हम महफूज़ थे ।
घड़ी भर की चाहत में संवारा ,
कुछ अंगुलियों ने हमे दुलारा ,
और फिर पंखुरी पंखुरी बन बिखरे ।
कांटो में भी महफूज थे हम ।
हां तब कितने खुश थे हम।।
कुसुम कोठारी ।
कांटो में भी हम महफूज़ थे।
खिलखिलाते थे ,सुरभित थे ,
हवाओं से खेलते झुलते थे ,
हम मतवाले कितने खुश थे ।
कांटो में भी हम महफूज़ थे ।
फिर तोड़ा किसीने प्यार से ,
सहलाया हाथो से , नर्म गालों से ,
दे डाला हमे प्यार की सौगातों में ।
कांटो में भी हम महफूज़ थे ।
घड़ी भर की चाहत में संवारा ,
कुछ अंगुलियों ने हमे दुलारा ,
और फिर पंखुरी पंखुरी बन बिखरे ।
कांटो में भी महफूज थे हम ।
हां तब कितने खुश थे हम।।
कुसुम कोठारी ।






