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Thursday, 14 March 2019

जीवन के रंग - क्षणिकाएं

क्षणिकाएं

यूं उतंग शिखरों पर
बसेरे थे जिनके
आज जहाँ में
नामो निशां नहीं उनके।
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गुमान जो आईने को था
सब बिखर गया
देख के सूरत गुलनार की
सारा भ्रम उतर गया ।
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निशां कदमों के कल
आंधियां उडा ले जायेगी
कुछ यादें ही दिलों में
बस शेष रह जायेगी।

कुसुम कोठारी।

Tuesday, 12 March 2019

तितली तेरे रंग


तितली तेरे रंग

चहुँ ओर नव किसलय शोभित
बयार बसंती मन भाये,
देख धरा का गात चम्पई
उर में राग, मोह जगाये,
ओ मतवारी चित्रपतंगः
तुम कितनी मन भावन हो,
कैसा सुंदर रूप तुम्हारा
कैसे मन  लुभावन हो,
वन माली करता जतन
रात दिन फूलों की रखवाली करता,
 पर तुम कितनी चतुर सुजान
आंखों के काजल के जैसे
चुरा ले जाती सौरभ सुमनों से,
चहुँ ओर विलसत पराग दल
पर ओ रमती ललिता  तुम,
थोड़ा-थोडा लेती  हो
नही मानव सम लोभी तुम,
संतोष धन से पूरित हो
तित्तरी रानी फूलों सी सुंदर तुम
फिर भी फूल तुम्हें भरमाते
प्रकृति बदल बदल कर
सजती  रूप हर मौसम,
पर तुम्हारा  सुंदर गात
इंद्रधनुष के रंग सात,
मधुर पराग रसपान कर
उडती रहती पात पात।।

   कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 10 March 2019

मधुरस मनभावन होली मनाएं 

मधुरस मनभावन होली मनाएं

आवन आतुर मधुमास सखी पवन झकोरा खाए
ऐसो  सुंदर  चाँद  गगन पर  बादल डोली सजाए

छाई  फागुन  रुत मनभावन पात- पात मुस्काए
अली भ्रमित हो डोले व्याकुल कोयल गीत सुनाए

स्वर्णिम सूर्य उदय मुलकित, अन्न धन लाभ बधाए
मां लक्ष्मी मां  सरस्वती  वरदहस्त रखन को आए

प्राणी मात्र हृदय तल बसे सदा सुंदर भाव सुहाए
पर हित खातिर स्नेह बसे उर में अंतर  मन हर्षाए

सभी पुराने बैर  भूलादें मन में प्रेम ज्योति जलाएं
स्नेह प्रेम की सुंदर मधुरस मनभावन होली मनाएं।

                    कुसुम कोठारी ।



Friday, 8 March 2019

बन तस्वीर संवरी हूं मैं

हार्दिक शुभकामनाएं

हां कतरा कतरा पिघली हूं मैं
फिर सांचे सांचे ढली हूं मैं
हां जर्रा जर्रा बिखरी हूं मैं
फिर बन तस्वीर संवरी हूं मैं 
अपनो को देने खुशी
अपनो संग चली हूं मैं
अपना अस्तित्व भूल
सब का अस्तित्व बनी हूं मैं
कुछ हाथ आंधी से बचा रहे थे
तभी रोशन हो शमा सी जली हूं मैं
छूने को  उंचाइयां
रुख संग हवाओं के बही हूं मैं।

           कुसुम कोठारी।

Wednesday, 6 March 2019

फाग पर ताँका

फाग पर ' ताँका 'विधा की रचनाएँ ~

१. आओ री सखी
       आतुर मधुमास
       आयो फागुन
       बृज में होरी आज
       अबीर भरी फाग।

२. शाम का सूर्य
       गगन पर फाग
       बादल डोली
      लो सजे चांद तारे
      चहका मन आज।

३. उड़ी गुलाल
       बैर भूलादे मन
       खेलो रे खेलो
       सुंदर मधुरस
       मनभावन फाग ।
               कुसुम कोठारी ।


ताँका (短歌) जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य विधा है। इस विधा को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी के दौरान काफी प्रसिद्धि मिली। उस समय इसके विषय धार्मिक या दरबारी हुआ करते थे। हाइकु का उद्भव इसी से हुआ।

इसकी संरचना ५+७+५+७+७=३१ वर्णों की होती है।

Tuesday, 5 March 2019

नशेमन इख़लास

नशेमन इख़लास

ना मंजिल ना आशियाना पाया
वो  यायावर सा  भटक गया ।

तिनका तिनका जोडा कितना
नशेमन इ़खलास का उजड़ गया ।

वह सुबह का भटका कारवाँ से
अब तलक सभी से बिछड़ गया ।

सीया एहतियात जो कोर कोर
क्यूं कच्चे धागे सा उधड़ गया ।

         कुसुम कोठारी।

Sunday, 3 March 2019

शाम का ढलता सूरज

शाम का ढलता सूरज

शाम का ढलता सूरज
उदास किरणें थक कर
पसरती सूनी मुंडेर पर
थमती हलचल धीरे धीरे
नींद के आगोश में सिमटती
वो सुनहरी चंचल रश्मियाँ
निस्तेज निस्तब्ध निराकार
सुरमई संध्या का आंचल
तन पर डाले मुँह छुपाती
क्षितिज के उस पार अंतर्धान
समय का निर्बाध चलता चक्र
कभी हंसता कभी  उदास
ये प्रकृति का दृश्य है या फिर
स्वयं के मन का परिदृश्य
वो ही प्रतिध्वनित करता
जो निज की मनोदशा स्वरूप है
भुवन वही परिलक्षित करता
जो हम स्वयं मन के आगंन में
सजाते हैं खुशी या अवसाद
शाम का ढलता सूरज क्या
सचमुच उदास....... ?

         कुसुम कोठारी ।