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Sunday, 5 September 2021

श्वास रहित है तन पिंजर


 श्वास रहित है तन पिंजर 


तड़प मीन की मन मेरे 

श्याम नही अंतर जाने 

गोकुल छोड़़ जावन कहे

बात नेह की कब माने।


अमर लतिका स्नेह लिपटी

छिटक दूर क्यों कर जाए।

बिना मूल मैं तरु पसरी

जान कहाँ फिर बच पाए।


श्वास रहित है तन पिंजर 

साथ सखी देती ताने।

तड़प मीन की मन मेरे 

श्याम नही अंतर जाने ।।


बिना चाँद चातक तरसे

रात रात जगता रहता

टूट टूट मन इक तारा

सिसक सिसक आहें भरता।


कौन सुने खर जग सारा।

बात बात देता ताने।

तड़प मीन की मन मेरे 

श्याम नही अंतर जाने ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

12 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सोमवार 06 सितम्बर 2021 शाम 3.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. जी बहुत बहुत आभार आपका मुखरित मौन पर रचना को शामिल करने के लिए।
      सादर।

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  2. बहुत बहुत सुन्दर

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    Replies
    1. जी बहुत बहुत आभार आपका ।
      सादर।

      Delete
  3. बिना चाँद चातक तरसे
    रात रात जगता रहता
    टूट टूट मन इक तारा
    सिसक सिसक आहें भरता।
    वाह!!!!
    अद्भुत शब्दसंयोजन लाजवाब सृजन।

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  4. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार(०७ -०९-२०२१) को
    'गौरय्या का गाँव'(चर्चा अंक- ४१८०)
    पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  5. इस हाहाकारी विरह को कौन जान पाया है ? जिसके लिए है वो तो सबसे ज्यादा अनजान बना रहता है । तो भी उसी के लिए पुकार है , मनुहार है । अति सुन्दर कृति ।

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  6. श्वास रहित है तन पिंजर
    साथ सखी देती ताने।
    तड़प मीन की मन मेरे
    श्याम नही अंतर जाने ।
    कृष्ण के प्रति अथाह आसक्ति के भाव को अभिव्यक्ति करता अत्यंत हृदयस्पर्शी सृजन ।

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  7. बिना चाँद चातक तरसे

    रात रात जगता रहता

    टूट टूट मन इक तारा

    सिसक सिसक आहें भरता। विरह की वेदना का अनुपम भाव व्यक्त करती सुंदर लड़ियों जैसे रचना । बहुत शुभकामनाएं कुसुम जी ।

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  8. बढ़िया भावपूर्ण विरह गीत। अद्भुत काव्य सृजन के लिए आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

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