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Wednesday, 1 September 2021

कल्पना और कल्पक


 नवगीत मेरा।

कल्पना और कल्पक


कुछ छुपे अध्याय भी है

कह रही है रात ढलती।

क्यों तमस की कालिमा में

भोर की है आस पलती।


नील आँगन खेलते हैं

ऋक्ष अंबक टिमटिमाते

क्षीर की मंदाकिनी में

स्नान  करके झिलमिलाते

चन्द्र भभका आग जैसे

चाँदनी दिखती पिघलती।।


कल्पना कविता बने तो

क्या नहीं कुछ हो सकेगा

सूर्य भी करवट बदलता

रात शय्या सो सकेगा

स्वर्ण काया पर सुनहरी 

धूप की बाँहें मचलती ।।


औघड़ी है रात रानी

जाग के सौरभ लुटाती 

भोर लाली टोहती तो

स्वागतम पाँखें बिछाती

देह से आभूषणों को

ज्यों विरह में वो अहलती ।।


अहलती =हिलना.


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

28 comments:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (03-09-2021) को "बैसाखी पर चलते लोग" (चर्चा अंक- 4176) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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    1. बहुत बहुत आभार आपका मीना जी चर्चा पर अपनी रचना को देखना सदा सुखद लगता है।
      मैं चर्चा पर उपस्थित रहूंगी।
      सादर सस्नेह।

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  2. प्रकृति और मानव मन कितनी खूबसूरती से अपने मोहपाश में बांध लेते हैं,उसका अनुपम उदाहरण है आपका ये उत्कृष्ट सृजन । बहुत सुंदर मनभावन कविता ।

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    1. आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से सदा मेरे लेखन को नई ऊर्जा मिलती है जिज्ञासा जी ।
      सस्नेह आभार आपका।

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  3. उत्कृष्ट सृजन सदा की भांति प्रिय कुसुम

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    1. बहुत बहुत आभार आपका प्रिय दी।
      बस आपका आशीर्वाद मिलता रहे।
      सादर सस्नेह।

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  4. क्यों तमस की कालिमा में
    भोर की है आस पलती।

    वाह!!!

    चन्द्र भभका आग जैसे
    चाँदनी दिखती पिघलती।।

    अद्भुत एवं लाजवाब नवगीत...
    आपकी नवगीतों में बिम्ब आश्चर्य चकित करते हों कुसुम जी!
    लाजवाब लेखन हेतु बधाई एवं शुभकामनाएं ।

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    1. आपने सराहा सुधा जी आपकी विहंगम दृष्टि से काव्य सदा नये प्रतिमान पाता है।
      बहुत बहुत सा आभार।
      सस्नेह।

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  5. बहुत बहुत सुन्दर मधुर गीत |

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    1. जी बहुत बहुत आभार आपका आलोक जी ।
      ब्लॉग पर आपकी उपस्थिति सदा उत्साहवर्धन करती है।

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  6. आप विदुषी हैं कुसुम जी। कल्पना कविता बने तो क्या नहीं कुछ हो सकेगा। कुछकुछ समझ रहा हूं मैं इस काव्य-रचना के भाव को। इसे पूर्णतः आत्मसात् करने का प्रयास करूंगा।

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    1. जी सादर आभार आपका,आपकी प्रशंसा में अतिशयोक्ति ही सही मन भावन है जितेंद्र जी।
      बहुत बहुत आभार आपका ।
      सादर।

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  7. बहुत सुंदर नवगीत है। उत्कृष्ट सृजन के लिए आपको बहुत-बहुत शुभकामनाएं।

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    1. बहुत बहुत आभार आपका विरेंद्र जी, नवगीत को नवगीत प्रबुद्ध जन मानले तो लेखन सार्थक समझती हूं।
      सादर।
      सुंदर उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए।

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  8. वाह!वाह!गज़ब दी 👌
    न जाने कितनी ही बार पढ़ा आपका यह नवगीत हर बार नया सा लगा।
    सराहना से परे।
    सादर

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    1. बहुत बहुत सा आभार आपका अनिता,आपकी मोहक प्रतिक्रिया से रचना मुखरित हुई,और उत्साहवर्धन भी।
      सस्नेह।

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  9. सुन्दर रचना... पहला छन्द बहुत ही सुन्दर! बहुत अच्छा लिख गई हैं कुसुम जी आप 👍!

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    1. बहुत बहुत आभार आपका आदरणीय,आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से रचना प्रवाहित हुई।
      सादर।

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  10. सुन्दर सृजन , बहुत शुभकामनाएं ।

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    1. जी बहुत बहुत आभार आपका दीपक जी उत्साह वर्धन हुआ।
      सादर।

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  11. बहुत सुंदर रचना, नवबिम्ब बिम्बित...

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    Replies
    1. जी बहुत बहुत आभार आपका उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया के लिए।
      सादर।

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  12. बहुत सुंदर बिम्ब, बेहद खूबसूरत नवगीत सखी।

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    1. बहुत बहुत आभार आपका सखी,आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से रचना गतिमान हुई।
      सस्नेह।

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  13. अत्यन्त सुन्दरतम काव्य शिल्प । प्रगाढ़ भावों का मुखर प्रस्फुटन । अति सुन्दर कृति के लिए हार्दिक बधाई ।

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    1. बहुत सुंदर अमृता जी आपकी मोहक प्रतिक्रिया ने रचना को नये आयाम दिये।
      सस्नेह आभार आपका।

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  14. Replies
    1. जी बहुत बहुत आभार आपका।
      सस्नेह।
      ब्लॉग पर सदा स्वागत है आपका।
      सस्नेह।

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