Followers

Tuesday, 14 September 2021

उपेक्षिता


एक दिवस हिन्दी लगे, गंगा जल का पान।

सच्चे मन से आँकिए, कहाँ है इसकी आन।।


 उपेक्षिता


देव नागरी भाषा उत्तम

गुणी जनो ने भी गुण गाया।

अनंत शब्द भंडार सुशोभित

अलंकार से निखरी काया।


विविध रंग की रंगोली में

शुभ्र वर्ण लेकर खिलती है

अभ्यागत को गले लगा कर

सागर में गंगा मिलती है

संस्कृत ने जो पौधा सींचा

उस हिन्दी की शीतल छाया।।


दो अक्षर भी भाव समेटे

सौम्य सुघड़ सुंदर गहरे

विश्व कोष में और कौनसी 

भाषा इसके आगे ठहरे 

आंग्ल मोहिनी पाश फसा जन

निजता छोड़ झूठ भरमाया।।

 

दाँव घात में ऐसे उलझी

शैशव से न तरुण हो पाई

प्राची उगते बाल सूर्य पर

काल घटा गहरी लहराई 

देव वंशजा भाषा मंजुल

पूरा मान कहाँ कब पाया।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Saturday, 11 September 2021

स्वयं पर शासन


 

स्वयं पर शासन


निज पर जो शासन करते हैं

क्षुद्र भाव का करते सारण

शुभ्र गुणों को विकसित करते

जिससे सुरभित होते भू कण।


आदर्शों को रखें सँभाले

मणियों जैसे अमूल्य विचार

परंपरा में देते जग को

मंजु शुद्ध समदृष्टि आचार

किंचित लेश मात्र भी विचलित

दृश्य नहीं जो करते धारण।।


स्वार्थ त्याग की करे तपस्या  

राग द्वेष औ माया तजकर 

पुरुषार्थ का करते संकल्प 

आत्मानंद मार्ग में रमकर 

ऐसी संत स्वभावी आत्मा

सभी दुखो का करे निवारण।।


साम्यभाव हो दृष्टिपथ जिनका

परहित अर्पित भाव उच्चतम

वसुधा पर प्रकाश फैलाते 

विदेही युगवीर पुरुषोत्तम

बंधन से वे मुक्त सदा जो

निस्पृहता का करे आचरण।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 7 September 2021

श्याम मोहिनी


 श्याम मोहिनी


रजत चाँद की निर्मल आभा

लो लहर पलक पर लहरी हैं ।


वो झांक रहे हैं इधर उधर

टिमटिम कर अंबक मटकाते

नीलाम्बर की बाहों में घिर

मणिकांत मणी से मनभाते

दौड़ धूप से क्लांत शिथिल अब

निर्निमेष आँखें ठहरी है।।


रजनी कर श्रृंगार निकलती

रुनझुन पायल झनकाती

श्याम मोहिनी वो सुकुमारी

नीले कंगन खनकाती

भ्रमण करे जब निशा सुंदरी

तारक दल जैसे पहरी है।।


अलंकार नित नव घड़वाती

रंग रूप उजला सा भरने 

पर जब तक उजली वो होती 

काल नवल सा लगता झरने

जब चलती है धीरे लगता

चाल चले कोई गहरी है।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 5 September 2021

श्वास रहित है तन पिंजर


 श्वास रहित है तन पिंजर 


तड़प मीन की मन मेरे 

श्याम नही अंतर जाने 

गोकुल छोड़़ जावन कहे

बात नेह की कब माने।


अमर लतिका स्नेह लिपटी

छिटक दूर क्यों कर जाए।

बिना मूल मैं तरु पसरी

जान कहाँ फिर बच पाए।


श्वास रहित है तन पिंजर 

साथ सखी देती ताने।

तड़प मीन की मन मेरे 

श्याम नही अंतर जाने ।।


बिना चाँद चातक तरसे

रात रात जगता रहता

टूट टूट मन इक तारा

सिसक सिसक आहें भरता।


कौन सुने खर जग सारा।

बात बात देता ताने।

तड़प मीन की मन मेरे 

श्याम नही अंतर जाने ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 1 September 2021

कल्पना और कल्पक


 नवगीत मेरा।

कल्पना और कल्पक


कुछ छुपे अध्याय भी है

कह रही है रात ढलती।

क्यों तमस की कालिमा में

भोर की है आस पलती।


नील आँगन खेलते हैं

ऋक्ष अंबक टिमटिमाते

क्षीर की मंदाकिनी में

स्नान  करके झिलमिलाते

चन्द्र भभका आग जैसे

चाँदनी दिखती पिघलती।।


कल्पना कविता बने तो

क्या नहीं कुछ हो सकेगा

सूर्य भी करवट बदलता

रात शय्या सो सकेगा

स्वर्ण काया पर सुनहरी 

धूप की बाँहें मचलती ।।


औघड़ी है रात रानी

जाग के सौरभ लुटाती 

भोर लाली टोहती तो

स्वागतम पाँखें बिछाती

देह से आभूषणों को

ज्यों विरह में वो अहलती ।।


अहलती =हिलना.


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 30 August 2021

कृष्ण कहाँ है!


कृष्ण कहाँ है!

जन्म दिवस तो नंद लाल का

हम हर वर्ष मनाते है।

पर वो निष्ठुर यशोदानंदन

कहाँ धरा पर आते हैं।

भार बढ़ा है अब धरणी का

पाप कर्म इतराते हैं।

वसुधा अब वैध्व्य भोगती

कहाँ सूनी माँग सजाते हैं।

कण-कण विष घुलता जाता

संस्कार बैठ लजाते हैं।

गिरावट की सीमा टूटी

अधर्म की पौध उगाते हैं।

विश्वास बदलता जाए छल में

धोखे की धूनी जलाते हैं।

मान अपमान की बेड़ी टूटी 

लाज छोड़ भरमाते हैं।

नैतिकता और सदाचार का

फूटा ढ़ोल बजाते हैं।

शरम हया के गहने को

बीते युग की बात बताते हैं।

चीर द्रोपदी का अब छोटा

दामोदर कहां बढ़ाते हैं।

काम बहुत ही टेढ़ा अब तो

भरे सभी के खाते हैं।

स्वार्थ लोलुपता ऐसी फैली

भूले रिश्ते और नाते हैं।

ढोंग फरेब का जाल बिछा 

झुठी भक्ति जतलाते हैं।

मँच चढ़े और हाथ में माइक

शान में बस इठलाते हैं।

तृषित है जग सारा अब तो

दर्द की चरखी काते है।

आ जाओ करूणानिधि

हम  हाथ जोड़ बुलाते हैं ।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'

Sunday, 29 August 2021

नंद बाबा घर बधाई

नंद बाबा घर बधाई।


बाबा नंद घर आनंद बधाई 

माँ यशोदा विलसत न अघाई ।

नलकुबर सो  श्याम  सलौनो 

आज जन्म  लियो सुखदाई ।

अवनि अंबर डोल गयो ,

जगदीश पधारे बन बालाई ।

दसों दिशाऐं नौबत बाजे 

गोकुल बाजे  शंख  सुहाई ।

इंद्र वरूण घन घोरा गरजत

मन ही मन  हरषाई ।

कुबेर निज भंडार खोल्यो

भर भर रत्न राशि बरसाई‌।

मंगल गावे थाल सजावे

नाचे लोग ,बच्चन,  लुगाई ‌।

रेशम डोर स्वर्ण की ड़ंड़ी

रत्न जड़ित ध्वजा फहराई।

छोटो सो झुलनो ड़ारो

झुले कृष्ण  कन्हाई ।

ऐसो भाग्य जग्यो धरा को 

जन जन मन हरखाई ।


       कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'