एक दिवस हिन्दी लगे, गंगा जल का पान।
सच्चे मन से आँकिए, कहाँ है इसकी आन।।
उपेक्षिता
देव नागरी भाषा उत्तम
गुणी जनो ने भी गुण गाया।
अनंत शब्द भंडार सुशोभित
अलंकार से निखरी काया।
विविध रंग की रंगोली में
शुभ्र वर्ण लेकर खिलती है
अभ्यागत को गले लगा कर
सागर में गंगा मिलती है
संस्कृत ने जो पौधा सींचा
उस हिन्दी की शीतल छाया।।
दो अक्षर भी भाव समेटे
सौम्य सुघड़ सुंदर गहरे
विश्व कोष में और कौनसी
भाषा इसके आगे ठहरे
आंग्ल मोहिनी पाश फसा जन
निजता छोड़ झूठ भरमाया।।
दाँव घात में ऐसे उलझी
शैशव से न तरुण हो पाई
प्राची उगते बाल सूर्य पर
काल घटा गहरी लहराई
देव वंशजा भाषा मंजुल
पूरा मान कहाँ कब पाया।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






