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Wednesday, 13 October 2021

कवि और सृजन


 कवि और सृजन


जब मधुर आह्लाद से भर

कोकिला के गीत चहके

शुष्क वन के अंत पट पर

रक्त किंशुक लक्ष दहके।


कल्पना की ड़ोर थामें

कवि हवा में चित्र भरता

लेखनी से फूट कर फिर

चासनी का मेघ झरता

व्यंजना के पुष्प दल पर 

चंचरिक सा चित्त बहके।।


जब सुगंधित से अलंकृत

छंद लय बध साज बजते

झिलमिलाते रेशमी से

उर्मियों के राग सजते

सोत बहते रागनी के

पंच सुर के पात लहके।।


वास चंदन की सुकोमल

तूलिका में ड़ाल लेता

रंग धनुषी सात लेकर

टाट को भी रंग देता

शब्द धारण कर वसन नव

ठाठ से नभ भाल महके।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 8 October 2021

अविरल अनुराग


 अविरल अनुराग।


नेह स्नेह की गागरिया में

सुधा लहर सा बहता जाऊँ

खिले प्रीत फुलवारी सुंदर

गीत मधुर से आज सुनाऊँ।


हरित धरा तुम सरसी-सरसी

मैं अविरल सा अनुराग बनूँ

कल-कल बहती धारा है तू

मैं निर्झर उद्गम शैल बनूँ

कभी घटा में कभी जटा में

मनहर तेरी छवि को पाऊँ।।


महका-महका चंदन पीला

सिलबट्टे पर घिसता जाता ‌

तेरे भाल सजा जो घिसकर 

अंतस पुलकित हो लहराता

दीपक की ज्योति तू उज्जवल

मैं बाती बनकर लहराऊँ।।


सूरज की हेमांगी किरणें

वसुधरा को ज्यों रंग जाती 

तमसा के प्रांगण को जैसे

चंदा की चंदनिया भाती

नीली सी  चुनरी फहराना

मैं टिमटिम तारा बन जाऊँ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Monday, 4 October 2021

खण्डित वीणा

खण्डित वीणा


क्लांत हो कर पथिक बैठा

नाव खड़ी मझधारे 

चंचल लहर आस घायल

किस विध पार उतारे।


अर्क नील कुँड से निकला

पंख विहग नभ खोले

मीन विचलित जोगिणी सी

तृषित सिंधु में डोले

क्या उस घर लेकर जाए

भ्रमित घूम घट खारे।।


डाँग डगमग चाल मंथर

घटा मेघ मंडित है

हृदय बीन जरजर टूटी

साज सभी खंडित है 

श्रृंग दुर्गम राह रोकते

संग न साथ सहारे।।


खंडित बीणा स्वर टूटा

राग सरस कब गाया

भांड मृदा भरभर काया

ठेस लगे बिखराया 

मूक हुआ है मन सागर

शब्द लुप्त हैं सारे ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा '।

 

Saturday, 2 October 2021

लाल


 लाल


देह छोटी बान ऊंची

वस्त्र खद्दर डाल के

हल सदा देते रहे वो

शत्रुओं की चाल के।


भाव थे उज्ज्वल सदा ही

देश का सम्मान भी

सादगी की मूर्त थे जो

और ऊंची आन भी

आज  गौरव गान गूँजे

भारती के लाल के।


थे कृषक सैना हितैषी

दीन जन के मीत थे

कर्म की पोथी पढ़ाई

प्रीत उनके गीत थे

पाक को दे पाठ छोड़ा

मान भारत भाल के।।


वो धरा के वीर बेटे

त्याग ही सर्वस्व था

बोल थे संकल्प जैसे

देश हित वर्चस्व था

फिर अचानक वो बने थे 

ग्रास निष्ठुर काल के।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 30 September 2021

आज नया इक गीत लिखूँ


 आज नया इक गीत लिखूँ


गूँथ-गूँथ शब्दों की माला 

आज नया इक गीत लिखूँ मैं।।


वीणा का जो तार न झनके 

सरगम की धुन पंचम गाएँ

मन का कोई साज न खनके

नया मधुर सा राग सजाएँ

कुछ खग के कलरव मीठे से

पीहू का संगीत लिखूँ मैं।।


हीर कणों से शोभित अम्बर

ज्यों सागर में दीपक जलते

टिम-टिम करती निहारिकाएं

क्षितिज रेख जा सपने पलते

चंद्रिका से ढकी वसुंधरा

चंद्र प्रभा की प्रीत लिखूं मैं।।


मिहिका से अब निकल गया मन

धूप सुहानी निकल रही है

चटकन लागी चंद्र मल्लिका

नव दुल्हन का रूप मही है

मुखरित हो संगीत भोर का

तम पर रवि की जीत लिखूं मैं।।


             कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

Friday, 24 September 2021

स्मृति पटल पर गाँव

स्मृति पटल पर गाँव 


बैठ कर मन बाग मीठी 

मोरनी गाने लगी है 

हर पुरानी बात फिर से 

याद अब आने लगी है।।


कर्म पथ बढ़ते रहे थे 

छोड़ आये सब यहाँ हम 

बात अब लगती अनूठी 

सोच में अभिवृद्धि थी कम 

स्मृति पटल पर गाँव की वो

फिर गली छाने लगी है।।


भ्रान्ति में उलझे शहर के 

त्याग सात्विक ग्राम जीवन 

यूँ भटकते ही चले फिर 

सी रहे हर जून सीवन 

कैद छूटी बुलबुलें फिर

उड़ वहाँ जाने लगी है।।


कोड़ियों से खेल रचते 

धूल में तन थे महकते 

पाँव में चप्पल न जूते 

दौड़ते बेसुध चहकते 

डूबकर कब रंग गागर  

फाग लहराने लगी है।।


 कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

 

Wednesday, 22 September 2021

निज पर विश्वास

निज पर विश्वास


निजता का सम्मान

निराशा में जिसने खोया।

राही भटका राह

निशा तम में घिरकर सोया।।


रे चेतन ये सोच

जगत में तू उत्तम कर्ता

पर जो खेले खेल 

वही तो होता है भर्ता

भावों का विश्वास 

जहाँ भी टूटा वो रोया।


निज भीतर की शक्ति

अरे जानो तोलो झांको

अज्ञानी मृग कौन

तुम्हीं सृष्टा हो मन आंको

जागेगा अब भाग

विवेकी का दाना बोया।।


दृष्टा बनके देख

अजा का अद्भुत है लेखा

जिसने लेली सीख

बदल ली हाथों की रेखा

उलझा रेशम छोड़

बटे तृण में मोती पोया।।


अजा=प्रकृति


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'