कवि और सृजन
जब मधुर आह्लाद से भर
कोकिला के गीत चहके
शुष्क वन के अंत पट पर
रक्त किंशुक लक्ष दहके।
कल्पना की ड़ोर थामें
कवि हवा में चित्र भरता
लेखनी से फूट कर फिर
चासनी का मेघ झरता
व्यंजना के पुष्प दल पर
चंचरिक सा चित्त बहके।।
जब सुगंधित से अलंकृत
छंद लय बध साज बजते
झिलमिलाते रेशमी से
उर्मियों के राग सजते
सोत बहते रागनी के
पंच सुर के पात लहके।।
वास चंदन की सुकोमल
तूलिका में ड़ाल लेता
रंग धनुषी सात लेकर
टाट को भी रंग देता
शब्द धारण कर वसन नव
ठाठ से नभ भाल महके।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






