नीरव मुखरित
खिलते उपवन पात
महक मकरंदी बहजाती।
फूलों की रस गंध
सखे अलि को लिखती पाती।
शोभा कैसी आज
धरा ओढ़े चुनरी धानी
मधुमासी है वात
जलाशय कंचन सा पानी
मोहक रूपा काल
बहे नदिया भी बलखाती।।
चंचल मन के भाव
झनक स्वर में बोले पायल
सुन श्यामा की राग
पपीहा होता है घायल
मधुरिम झीना हाथ
हवा धीरे से सहलाती।।
छेड़े मन के राग
सुरों की मुरली बहकी सी
नीरव तोड़े मौन
पुहुप की डाली महकी सी।
घर के पीछे बड़बेर
सुना बेरों से बतियाती।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






