सतरंगी होली
नव बसंत नव मधुबन है
नया नया ऋतुराज।
नव अंकुर को आस जगी है
प्रस्फुटन की आज।।
नवल टेसू से पादप शोभित
सजने लगी रंग होली
चंग झनक चौपाल बजे
थिरके मिल हमजोली।
नव्य सुमन मुस्कान लिए
फुनगी चढ़ बल खाये
मधुप रसी रस ढूंढ रहे
भर-भर लेकर जाये।
नव गुलाल अबीर बसंती
धानी वसना हुई धरा
बहु रंगी शृंगार किए हैं
लता गुल्म नव ओज भरा।
केसर रंग छलका नभ से
भर-भर रखो कटोरी
गुलनारी सौरभ तो जैसे
ले उड़ी नवल चटोरी।
जा रही है फाग खेलने
नव युवको की टोली
शुभ्र वसन कुमकुमी छींटे
पाग बँधी है मोली।
आज नवेली उड़ी चले
हाथ लिए पिचकारी
अंग रंगे गुलाबी आभा
सतरंगी रंग रंगी सारी।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






