भोर विभोर
उदयांचल पर फिर से देखो
कनक गगरिया फूटी
बहती है कंचन सी धारा
चमकी मधुबन बूटी
दिखे सरित के निर्मल जल में
घुला महारस बहता
हेम केशरी फाग खेल लो
कल कल बहकर कहता
महारजत सी मयूख मणिका
दिनकर कर से छूटी।।
पोढ़ रही हर डाली ऊपर
उर्मि झूलना झूले
स्नेह स्पर्श जो देती कोरा
बंद सुमन भी फूले
रसवंती सी सभी दिशाएं
नीरव चुप्पी टूटी।।
नील व्योम पर कलरव करती
उड़े विहग की टोली
कितनी मधुर रागिनी जैसी
श्याम मधुप की बोली
कुंदन वसन अरुण ने पहने
बीती रात कलूटी।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






