वक्त बदला
वक्त बदला तो संसार ही बदला नज़र आता है
उतरा मुलम्मा फिर सब बदरंग नज़र आता है।
दुरूस्त ना की कस्ती और डाली लहरों में
फिर अंजाम ,क्या हो साफ नज़र आता है ।
मिटते हैं आशियाने मिट्टी के ,सागर किनारे
फिर क्यों बिखरा औ परेशान नज़र आता है।
ख्वाब कब बसाता है गुलिस्तां किसीका
ऐसा उजड़ा कि बस हैरान नज़र आता है।
कुसुम कोठारी ।
वक्त बदला तो संसार ही बदला नज़र आता है
उतरा मुलम्मा फिर सब बदरंग नज़र आता है।
दुरूस्त ना की कस्ती और डाली लहरों में
फिर अंजाम ,क्या हो साफ नज़र आता है ।
मिटते हैं आशियाने मिट्टी के ,सागर किनारे
फिर क्यों बिखरा औ परेशान नज़र आता है।
ख्वाब कब बसाता है गुलिस्तां किसीका
ऐसा उजड़ा कि बस हैरान नज़र आता है।
कुसुम कोठारी ।






