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Friday, 8 June 2018

तुम्ही पे तुम्ही से

तुम्ही पे तुम्ही से

संचित जलाशय सा जीवन
कहो किस काम का
कुछ तो गति हो जीवन मे
स्थिर जल मे जन्म लेती हैं
शैवालिका जो
पानी का अमरत्व हर लेती
सहज झरना बन बहो
हां गिरना तो होगा
अचल अटल श्रेणीयों से
पर एक मधुर जीवन राग
गूंजेगा वादियों मे
कितनी नई राहें
बनेगी पद चिंहों से
हरितिमा मुस्कुरायेगी
बाहुपाश मे
संचित जलाशय भी
तो निर्भर होगें
तुम्ही पे तुम्ही से।

 कुसुम कोठारी।

Wednesday, 6 June 2018

जीवन की दहलीज

जीवंत होने का अर्थ है
जीवन की दहलीज पर
चुनौती ताजी रखें
कुछ नया खोजते रहे
क्योंकि नए की खोज में ही
हमारे भीतर जो छिपे हैं स्वर
उन्हें मुक्त कर पायेंगे
नई राग, नई धुन,
नया संगीत दे पायेंगे
नए की खोज में ही
हम  स्वयं नये रह पायेंगे
जैसे ही नया अन्वेषण बंद होता है
हम पुराने हो जाते,
जर्जर् खंडहर,
जो गिरने की राह तकने लगते हैं
रुकती है जब जब भी नदी
धार मलीन होने लगती है
शुरू हो जाती है पंक उत्पत्ति
पावनता तो सतत बहते रहने का नाम है
तभी तक धार पवित्र और निर्मल रहती है
जब तक बहती रहती है
सदा बहते रहो
निरन्तर गतिमान रहो
और सदा मन दहलीज पर
चुनौतियां ताजी रखो।
     कुसुम कोठरी।

Tuesday, 5 June 2018

गूजरिया

ओ सुनयनी सरोजिनी गूजरिया
चंचल चपल नैन सोहे कजरिया
ज्यों बादर बीच चमके बिजुरिया
ललाट शोभित चंदा सी रखरिया।

तीखी नासिका दमके नथनिया
अधर गुलाब  मधुर मुस्कनिया
ग्रीवा सुडौल सजत नौलखिया
कान सुघड़ झुमका झनकईया।

बांह चम्पई खन खनकत  चूरियां
लचकत कमर बांध करधनिया
केशरी लहंगा रतनार  चुनरिया
चलत  छमकत  पांव पैजनिया ।

पनिया भरन  आई पनघटिया
शीश कलश माटी की झरिया
ताल पोखरे रीते, सूखी दरिया
अब तो पानी बरसा मन हरिया।
                  कुसुम कोठारी।

दस्तक दहलीज पर

दस्तक दे रहा दहलीज पर कोई
चलूं उठ के देखूं कौन है
कोई नही दरवाजे पर
फिर ये धीरे धीरे मधुर थाप कैसी
चहुँ और एक भीना सौरभ
दरख्त भी कुछ मदमाये से
पत्तों की सरसराहट
एक धीमा राग गुनगुना रही
कैसी स्वर लहरी फैली
फूल कुछ और खिले खिले
कलियों की रंगत बदली सी
माटी महकने लगी है
घटाऐं काली घनघोर,
मृग शावक सा कुचाले भरता मयंक
छुप जाता जा कर उन घटाओं के पीछे
फिर अपना कमनीय मुख दिखाता
फिर छुप जाता
कैसा मोहक खेल है
तारों ने अपना अस्तित्व
जाने कहां समेट रखा है
सारे मौसम पर मद होशी कैसी
हवाओं मे किसकी आहट
ये धरा का अनुराग है
आज उसका मनमीत
बादलों के अश्व पर सवार है
ये पहली बारिश की आहट है
जो दुआ बन दहलीज पर
बैठी दस्तक दे रही है
चलूं किवाडी खोल दूं
और बदलते मौसम के
अनुराग को समेट लूं
अपने अंतर स्थल तक।
         कुसुम कोठारी।

कभी ना कभी (दहलीज )

" कभी न कभी "
मन की दहलीज पर
स्मृति का चंदा उतर आता
यादों के गगन पर,

सागर के सूने तट पर
फिर लहरों की हलचल
सपनो का भूला संसार
फिर आंखों मे ,

दूर नही सब
पास दिखाई देते हैं
न जाने उन अपनो के
दरीचों मे भी कोई
यादों का चंदा
झांकता हो कभी,

हां भुला सा कल सभी को
याद तो आता ही होगा
यादों की दहलीज पर
कोई मुस्कुराता ही होगा
कभी न कभी ।
       कुसुम कोठारी ।

Saturday, 2 June 2018

नई दुल्हन और उषा सौन्दर्य

नई दुल्हन और उषा सौन्दर्य   
         
दुल्हन ने अपनी
तारों जड़ी चुनरी
समेटी नींद से उठ के
चाँद से आभूषण
सहेज रख दिये संदूक मे
बादलों से निकलता
भास्कर ज्यों
उषा सी नवेली दुल्हन का
चमकता चेहरा
फैलती लालीमा
जैसे  मांग का
दमकता सिंदूर
धीरे धीरे धूप धरा पे
यों बिखरती ज्यों
कोई नवेली
लाज भरे नयन लिये
मन्द कदम उठाती
अधर अधर आगे बढती
पंक्षियों की मनभावन
चिरिप चिरिप
यूं लगे मानो
धीर धीरे बजती
पायल के रुनझुन की
स्वर लहरी
ओस से भीगे फूल
जैसे अपनो का
साथ छुटने की
नमी आंखों मे
खिलती कलियाँ
ज्यों मंद हास
नव जीवन की
शुरुआत का उल्लास।
            कुसुम कोठारी ।

अंधो के शहर मे आईना बेचने आया हूं

फिर से आज एक कमाल करने आया हूं
अंधो के शहर मे आईना बेचने आया हूं।

संवर कर सुरत तो देखी कितनी मर्तबा शीशे मे
आज बीमार सीरत का जलवा दिखाने आया हूं।

जिन्हें ख्याल तक नही आदमियत का
उनकी अकबरी का पर्दा उठाने आया हूं।

वो कलमा पढते रहे अत्फ़ ओ भल मानसी का
उन के दिल की कालिख का हिसाब लेने आया हूं।

करते रहे उपचार  किस्मत ए दयार का
उन अलीमगरों का लिलार बांच ने आया हूं।
       
                        कुसुम कोठारी।

अकबरी=महानता  अत्फ़=दया
किस्मत ए दयार= लोगो का भाग्य
अलीमगरों = बुद्धिमान
लिलार =ललाट(भाग्य)