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Friday, 13 April 2018

एक यवनिका गिरने को है

एक यवनिका गिरने को है।
जो सोने सा दिख रहा वो
अब माटी का ढेर होने को है
लम्बे सफर पर चल पङा
नींद गहरी सोने को है।
एक यवनिका .....।.
जो समझा था सरुप अपना
वो सरुप अब खोने को है
अब जल्दी से उस घर जाना
जहाँ देह नही सिर्फ़ रूह है
एक यवनिका ....
डाल डाल जो फूदक रहा
वो पंक्षी कितना भोला है 
घात लगाये बैठा बहेलिया
किसी पल बिंध जाना है ।
एक यवनिका .....
जो था खोया रंगरलियों मे
राग मोह मे फसा हुवा
मेरा मेरा कर जो मोहपास मे बंधा हुवा
आज अपनो के हाथों भस्म अग्नि मे होने को है ।
एक यवनिका  ......
           कुसुम कोठारी ।

Wednesday, 11 April 2018

एक छोटी सी खुशी

एक छोटी खुशी अंतर को छूले
तो कविता बनती है
आज एक झंकार सी हुई
रूकी पायल छनक उठी
एक हल्की सी आहट
दस्तक दे रही दिल के दरवाजे पर
कैसी रागिनी बज उठी
मानो कान्हा की बंसी गूंज उठी
सब कुछ नया सा लगता है
सभी रिश्तो मे ताजगी सी लगती है
समय की गति मध्यम हो जाती है
होटों पर  गीत और
पांव मे थिरकन समा जाती है
एक छोटी सी खुशी भी
कविता बन जाती है।
        कुसुम कोठारी।

Tuesday, 10 April 2018

अलंकृत रस काव्य

ढलती रही रात,
चंद्रिका के हाथों
धरा पर एक काव्य का
सृजन होता रहा
ऐसा अलंकृत रस काव्य
जिसे पढने
सुनहरी भास्कर
पर्वतों की उतंग
शिखा से उतर कर
वसुंधरा पर ढूंढता रहा
दिन भर भटकता रहा
कहां है वो ऋचाएं
जो शीतल चांदनी
उतरती रात मे
रश्मियों की तूलिका से
रच गई
खोल कर अंतर
दृश्यमान करना होगा
अपने तेज से
कुछ झुकना होगा
उसी नीरव निशा के
आलोक मे
शांत चित्त हो
अर्थ समझना होगा
सिर्फ़ सूरज बन
जलने से भी
क्या पाता इंसान
ढलना होगा
रात  का अंधकार
एक नई रौशनी का
अविष्कार करती है
वो रस काव्य सुधा
शीतलता का वरदान है
सुधी वरण करना होगा।
        कुसुम कोठारी।

Sunday, 8 April 2018

उड़ान का हौसला

रोने वाले सुन आंखों मे
आंसू ना लाया कर
बस चुपचाप रोया कर
नयन पानी देख अपने भी
कतरा कर निकल जाते हैं।

जिंदगी की आंधियां बार बार
बुझाती रहती है जलते चराग
पर जो दे चुके भरपूर रौशनी
उनका एहसान कभी न भूल
उस के लिए दीप बन जल।

जिस छत तले बसर की जिंदगी
तूफानों ने उजाड़ा उसी गुलशन को 
गुल ना कली ना कोई महका गूंचा
बिखरी पंखुरियों का मातम ना कर
फिर एक उड़ान का हौसला रख ।

सुख के वो बीते पल औ लम्हात
नफासत से बचाना यादों मे
खुशी की सौगातें बाधं रखना गांठ
नाजुक सा दिल बस साफ रहे
मासूमियत की हंसी होंठों पे सजी रहे।
                कुसुम कोठारी।

सप्तम सुर है सरगम मे

मौत की शै पे हर एक फना होता है,
जज्बातो की ठोकर मे क्यों
 फिर रुसवा होता हैं,
इंसा है नसीब का पायेंगे ही,
बस इस  बात से क्यों अंजा होता है,
ख्वाब देखो कुछ बुरा नही
पर हर ख्वाब पुरा हो यही मत देखो
सब की किस्मत एक नही होती
एक ही गुलिस्ता के हर फूल का
 अंजाम अलग होता है
एक कली सेहरे मे गूंथती
एक मयत पर सजती है
एक फूल चढता श्रद्धा से
दूजा बाजारों में रौदा जाता है
एक बने गमले की शोभा
एक कचरे मे फैंका जाता है
कुछ तो कुछ भी नही सहते
पर डाली पर मुरझा जाते है
बस जीने का एक बहाना
 ढूंढलो कोई अच्छा सा
एक ढूंढोगे लाख मिलेगे
सप्तम सुर है सरगम मे
...........कुसुम कोठारी

Wednesday, 4 April 2018

उड़ान जान ले कठिन

उड़ान  जान ले बड़ी कठिन है
कोई तेरे साथ नही है
इन राहों में धूप गरम है
दूर तक कोई छांव नही है
सहारे की भी उम्मीद ना रखना
निज हौसलों पर तूं उड़ना
अपनी राह तुम स्वयं बनाना
अपने आप को पाना हो जो
बनी राह पर ना तूं चलना
कितनी भी कठिनाई हो
बस तूं  हरदम आगे बढ़ना
तेरी राहें स्वयं बनेगी
दरिया ,बाधा सब निपटेंगी
तूं अपना नूर जगाये रखना
रोक ना पाये कोई तुझ को
यह निश्चय बस ठान के चलना
उड़ान जान ले......
         कुसुम कोठारी ।
                                   (चित्र सौजन्य गूगल)

Sunday, 1 April 2018

देखो घिर आई घटायें भी

ये वादियां ये नजारे, देखो घिर आई घटायें भी
पहाड़ो की नीलाभ चोटियों पर झुकने लगा आसमां भी।

झील का शांत जल बुला रहा,कुदरत मुस्कान बिखेर रही
ये लुभावनी घूमती घाटियां हरित रंग रंगी धरा भी।

किसी कोने से झांक रही सुनहरी सूर्य किरण
हरी दूब पर इठलाती लजीली धूप की लाली भी ।

छेड़ी राग मधुर, मस्त, सुरभित हवाऔं ने
प्रकृति के रंग रंगा देखो आज मन आंगन भी।
                    कुसुम कोठारी ।