कृष्ण कहाँ है!
जन्म दिवस तो नंद लाल का
हम हर वर्ष मनाते है।
पर वो निष्ठुर यशोदानंदन
कहाँ धरा पर आते हैं।
भार बढ़ा है अब धरणी का
पाप कर्म इतराते हैं।
वसुधा अब वैध्व्य भोगती
कहाँ सूनी माँग सजाते हैं।
कण-कण विष घुलता जाता
संस्कार बैठ लजाते हैं।
गिरावट की सीमा टूटी
अधर्म की पौध उगाते हैं।
विश्वास बदलता जाए छल में
धोखे की धूनी जलाते हैं।
मान अपमान की बेड़ी टूटी
लाज छोड़ भरमाते हैं।
नैतिकता और सदाचार का
फूटा ढ़ोल बजाते हैं।
शरम हया के गहने को
बीते युग की बात बताते हैं।
चीर द्रोपदी का अब छोटा
दामोदर कहां बढ़ाते हैं।
काम बहुत ही टेढ़ा अब तो
भरे सभी के खाते हैं।
स्वार्थ लोलुपता ऐसी फैली
भूले रिश्ते और नाते हैं।
ढोंग फरेब का जाल बिछा
झुठी भक्ति जतलाते हैं।
मँच चढ़े और हाथ में माइक
शान में बस इठलाते हैं।
तृषित है जग सारा अब तो
दर्द की चरखी काते है।
आ जाओ करूणानिधि
हम हाथ जोड़ बुलाते हैं ।।
कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'






