दुर्दिन
काले बादल निशि दिन छाये
चाबुक बरसाता काल खड़ा।
सूखी बगिया तृण तृण बिखरी
आशाओं का फूल झड़ा।।
चूल्हा सिसका कितनी रातें
उदर जले दावानल धूरा
राख ठँडी हो कंबल माँगे
सूखी लकड़ी तन तम्बूरा
अंबक चिर निद्रा को ढूंढ़े
धूसर वसना कंकाल जड़ा।।
पोषण पर दुर्भिक्ष घिरा है
खंखर काया खुडखुड़ ड़ोले
बंद होती एकतारा श्वांसे
भूखी दितिजा मुंँह है खोले
निर्धन से आँसू चीत्कारे
फिर देखा हर्ष अकाल पड़ा।।
आर्द्र विहिन सूखा तन पिंजर
घोर निराशा आँखे खाली
लाचारी की बगिया लहके
भग्न भाग्य की फूटी थाली
अहो विधाता कैसा खेला
पके बिना ही फल शाख सड़ा।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






