गीतिका:- चाँद अब निकोर है।
लो चाँद अब निकोर है।
ये मन हुआ विभोर है।
सागर प्रशांत दिख रहा।
लहरें करें टकोर है।।
हर सिंधु के बहाव पर।
कुछ वात की झकोर है।।
पावस उमंग भर रहा
शाखा सुमन अकोर है।।
सूरज उगा उजास ले
सुंदर प्रवाल भोर है।।
मन जब निराश हो चले
तब कालिमा अघोर है।
सहचर सुमित्र साथ हो।
आनंद तब अथोर है।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






