विरहन की पाती
पिव आने की आशा मन में
मृगनयनी छत पर चढ़ आती।
नख सिख तक श्रृंगार रचाए
लेकर हाथ कलम अरु पाती।।
चाँद किरण से बातें करती
खंजन आँखें राह निहारे
थोड़ी सी आहट पर चौंकी
पिया दरश को नैना हारे
बदरी ने आँसू छलकाये
नन्हीं बूँदे आस दिलाती।।
सुनो कलापी मेरे भाई
सजना को दे दो संंदेशा
पत्र लिखूँ कुछ मन की बातें
उपालंभ भी अरु अंदेशा
पवन झकोरा चला मचल कर
उड़ा ले गया लेख अघाती।।
स्वामी के बागों में जाकर
पीहू पीहू तान सुनाना
नाच नाचना मोहक ऐसे
उन को मेरी याद दिलाना
साथ उन्हें लेकर घर आना
नहीं याद अब मन से जाती।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






