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Monday, 4 October 2021

खण्डित वीणा

खण्डित वीणा


क्लांत हो कर पथिक बैठा

नाव खड़ी मझधारे 

चंचल लहर आस घायल

किस विध पार उतारे।


अर्क नील कुँड से निकला

पंख विहग नभ खोले

मीन विचलित जोगिणी सी

तृषित सिंधु में डोले

क्या उस घर लेकर जाए

भ्रमित घूम घट खारे।।


डाँग डगमग चाल मंथर

घटा मेघ मंडित है

हृदय बीन जरजर टूटी

साज सभी खंडित है 

श्रृंग दुर्गम राह रोकते

संग न साथ सहारे।।


खंडित बीणा स्वर टूटा

राग सरस कब गाया

भांड मृदा भरभर काया

ठेस लगे बिखराया 

मूक हुआ है मन सागर

शब्द लुप्त हैं सारे ।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा '।

 

Saturday, 2 October 2021

लाल


 लाल


देह छोटी बान ऊंची

वस्त्र खद्दर डाल के

हल सदा देते रहे वो

शत्रुओं की चाल के।


भाव थे उज्ज्वल सदा ही

देश का सम्मान भी

सादगी की मूर्त थे जो

और ऊंची आन भी

आज  गौरव गान गूँजे

भारती के लाल के।


थे कृषक सैना हितैषी

दीन जन के मीत थे

कर्म की पोथी पढ़ाई

प्रीत उनके गीत थे

पाक को दे पाठ छोड़ा

मान भारत भाल के।।


वो धरा के वीर बेटे

त्याग ही सर्वस्व था

बोल थे संकल्प जैसे

देश हित वर्चस्व था

फिर अचानक वो बने थे 

ग्रास निष्ठुर काल के।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 30 September 2021

आज नया इक गीत लिखूँ


 आज नया इक गीत लिखूँ


गूँथ-गूँथ शब्दों की माला 

आज नया इक गीत लिखूँ मैं।।


वीणा का जो तार न झनके 

सरगम की धुन पंचम गाएँ

मन का कोई साज न खनके

नया मधुर सा राग सजाएँ

कुछ खग के कलरव मीठे से

पीहू का संगीत लिखूँ मैं।।


हीर कणों से शोभित अम्बर

ज्यों सागर में दीपक जलते

टिम-टिम करती निहारिकाएं

क्षितिज रेख जा सपने पलते

चंद्रिका से ढकी वसुंधरा

चंद्र प्रभा की प्रीत लिखूं मैं।।


मिहिका से अब निकल गया मन

धूप सुहानी निकल रही है

चटकन लागी चंद्र मल्लिका

नव दुल्हन का रूप मही है

मुखरित हो संगीत भोर का

तम पर रवि की जीत लिखूं मैं।।


             कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

Friday, 24 September 2021

स्मृति पटल पर गाँव

स्मृति पटल पर गाँव 


बैठ कर मन बाग मीठी 

मोरनी गाने लगी है 

हर पुरानी बात फिर से 

याद अब आने लगी है।।


कर्म पथ बढ़ते रहे थे 

छोड़ आये सब यहाँ हम 

बात अब लगती अनूठी 

सोच में अभिवृद्धि थी कम 

स्मृति पटल पर गाँव की वो

फिर गली छाने लगी है।।


भ्रान्ति में उलझे शहर के 

त्याग सात्विक ग्राम जीवन 

यूँ भटकते ही चले फिर 

सी रहे हर जून सीवन 

कैद छूटी बुलबुलें फिर

उड़ वहाँ जाने लगी है।।


कोड़ियों से खेल रचते 

धूल में तन थे महकते 

पाँव में चप्पल न जूते 

दौड़ते बेसुध चहकते 

डूबकर कब रंग गागर  

फाग लहराने लगी है।।


 कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।

 

Wednesday, 22 September 2021

निज पर विश्वास

निज पर विश्वास


निजता का सम्मान

निराशा में जिसने खोया।

राही भटका राह

निशा तम में घिरकर सोया।।


रे चेतन ये सोच

जगत में तू उत्तम कर्ता

पर जो खेले खेल 

वही तो होता है भर्ता

भावों का विश्वास 

जहाँ भी टूटा वो रोया।


निज भीतर की शक्ति

अरे जानो तोलो झांको

अज्ञानी मृग कौन

तुम्हीं सृष्टा हो मन आंको

जागेगा अब भाग

विवेकी का दाना बोया।।


दृष्टा बनके देख

अजा का अद्भुत है लेखा

जिसने लेली सीख

बदल ली हाथों की रेखा

उलझा रेशम छोड़

बटे तृण में मोती पोया।।


अजा=प्रकृति


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Saturday, 18 September 2021

नीरव मुखरित


 

नीरव मुखरित


खिलते उपवन पात

महक मकरंदी बहजाती।

फूलों की रस गंध

सखे अलि को लिखती पाती।


शोभा कैसी आज 

धरा ओढ़े चुनरी धानी

मधुमासी है वात

जलाशय कंचन सा पानी

मोहक रूपा काल

बहे नदिया भी बलखाती।।


चंचल मन के भाव

झनक स्वर में बोले पायल 

सुन श्यामा की राग

पपीहा होता है घायल 

मधुरिम  झीना हाथ

हवा धीरे से सहलाती।।


छेड़े मन के राग

सुरों की मुरली बहकी सी

नीरव तोड़े मौन

पुहुप की डाली महकी सी।

घर के पीछे बड़बेर

सुना बेरों से बतियाती।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 16 September 2021

अवसरवादी


 अवसरवादी


अवसर का सोपान बना कर 

समय काल का लाभ लिया। 

रीति नीति की बातें थोथी 

निज के हित का घूँट पिया।


कौन सोचता है औरों की 

अपना ही सिट्टा सेके 

झुठी सौगंध तक खा जाते 

हाथों गंगाजल लेके 

गूदड़ कर्मों की अति भारी 

जाने क्या-क्या पाप सिया।।


क्या होता तो दिखता क्या है 

भरम यवनिका डाल रहे 

लाठी वाले भैंस नापते 

निर्बल अत्याचार सहे 

दूध फटे का मोल लगाया 

ऐसा भी व्यापार किया।। 


पोल ढोल की छुपी रहे है 

लगती जब तक चोट नही  

खुल जाये तो बात बदल दे 

जैसे कोई खोट नहीं 

फटे हुए पर खोल चढ़ाकर 

अनृत आवरण बाँध दिया।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'