खण्डित वीणा
क्लांत हो कर पथिक बैठा
नाव खड़ी मझधारे
चंचल लहर आस घायल
किस विध पार उतारे।
अर्क नील कुँड से निकला
पंख विहग नभ खोले
मीन विचलित जोगिणी सी
तृषित सिंधु में डोले
क्या उस घर लेकर जाए
भ्रमित घूम घट खारे।।
डाँग डगमग चाल मंथर
घटा मेघ मंडित है
हृदय बीन जरजर टूटी
साज सभी खंडित है
श्रृंग दुर्गम राह रोकते
संग न साथ सहारे।।
खंडित बीणा स्वर टूटा
राग सरस कब गाया
भांड मृदा भरभर काया
ठेस लगे बिखराया
मूक हुआ है मन सागर
शब्द लुप्त हैं सारे ।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा '।






