बिना नाव का नाविक चंदा
बालू कण सागर के तट पर
चाँदनी में झिलमिलाये।
और हवा के झोंकों से ये
पात कैसे सरसराये।
इस रजनी में कोई जादू
हृदय पपीहा बोल रहा
लहर पालने बैठा चंदा
धीरे धीरे डोल रहा
आती जाती सिंधु उर्मियाँ
तट छूने को लहराये।।
बिना नाव का नाविक चंदा
किरण हाथ चप्पू थामा
छप छपाक कर तैर रहा वो
तन पर उजियारी जामा
उठते जब पानी में झूमर
मोती जैसे बरसाये।।
उद्वेग सिंधु में उठा और
निशा कांत थर-थर डोला
भीगा कुर्ता भीगी चादर
भीगा किरणों का झोला
काला पानी उजली साड़ी
रेशम जैसे बलखाये।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






