दूध मुंहा दौड़ चला ।
जन्म लेते ही साल दौड़ने लगा !!
हाँ वो गोड़ालिया नहीं चलता, नन्हें बच्चों की तरह,
बस सीधा समय की कोख से अवतरित होकर समय के पहियों पर चढ़ कर भागने लगता है।
उसे भागना ही पड़ता है वर्ना इतने ढेर काम सिर्फ ३६५ दिन में कैसे पूरा करें पायेगा।
वह स्वस्थ हो या अस्वस्थ उसे बस इतना ही जीवन काल मिलता है।
वो जाते जाते अपनी प्रतिछाया छोड़ जाता है फिर उतने ही काल के लिए।
वह रोगी हो, असाध्य रोगों से ग्रसित हो तो भी स्वयं मृत्यु को वरण करने का उसे हक नहीं।
उसे सारा ज़माना कोसता है,
चाहता है कि ये कलमुंहा चला जाए जल्दी , पर उसे दुआ बददुआ दोनों नहीं लगती।
चिर शाप या वरदान से ग्रसित है, ये जन्मा अजन्मा न जाने किस देव या ऋषि से।
बस समय से इसका नाता हर पल रहता है, ये समय की पुस्तक में इतिहास बन कर रहता है। या फिर लोगों के दिल में खुशी की सौगात या ग़मो का अंधकार बनकर।।
अलविदा!
सुस्वागतम !!
कुसुम कोठारी'प्रज्ञा '