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Tuesday, 12 January 2021

रू-ब-रू


 फुरसत-ए-ज़िंदगी 


फुरसत-ए-ज़िंदगी कभी तो हो रू-ब-रू।

ढल चला आँचल अब्र का भी हो  सुर्ख़रू । 


पहरे बिठाये थे आसमाँ पर आफ़ताब ने

वो ले  गया इश्राक़ आलम हुवा बे-आबरू ।


चलो चाँद पर कुछ क़समे उठा देखा जाए।

रौशन रहा माहताब-ए-अल शब-ए-आबरू।


इश्राक़=चमक

अल =कला


               कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 9 January 2021

साँझ ढ़ले


 विज्ञात छंद आधारित नव गीत 


साँझ ढ़ली


साँझ ढ़ली विभा छाई 

चँद्र रचे नयी क्रीड़ा ।

मादक सा उजाला है

अंतर चातकी पीड़ा।।


आँचल में खिला तारा

स्वप्न झड़े कड़ी टूटी।

आस रिती रही सारी 

प्रीत उसी घड़ी फूटी।

काल बिता फिरे खाली

हाथ उठा लिया बीड़ा।।


जीवन नीर का तोड़ा

बूंद रसा गिरी सारी

रिक्त हुआ झुठी माया

बीत गयी रही खारी

अंतर भीगती काया 

राग वृतांत का छेडा।।


रात नमी सिली भीगी

दारुण भाव सी बीती।

वांछित था अभी आना

अद्भुत काल की रीती।

आज न घाव दे जाना

लाख अभी रखी व्रीड़ा।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 7 January 2021

मेरी भावना


 चार क्षणिकाएं ~ मेरी भावना 


भोर की लाली लाई 

आदित्य आगमन की बधाई ।


रवि लाया एक नई किरण 

संजोये जो सपने हो पूरण

पा जायें सच में नवजीवन 


उत्साह की सुनहरी धूप का उजास 

भर दे सबके जीवन मे उल्लास ।




साँझ ढले श्यामल चादर 

जब लगे ओढ़ने विश्व!


नन्हें नन्हें दीप जला कर

प्रकाश बिखेरो चहुँ ओर

दे आलोक हरे हर तिमिर


त्याग अज्ञान मलीन आवरण

पहन ज्ञान का पावन परिधान ।




मानवता भाव रख अचल

मन में रह सचेत प्रतिपल


सह अस्तित्व समन्वय समता 

क्षमा सजगता और परहितता

हो रोम रोम में संचालन 


हर प्राणी पाये सुख आनंद

बोद्धित्व का हो घनानंद।




लोभ मोह जैसे अरि को हरा 

दे जीवन को समतल धरा


बाह्य दीप मालाओं के संग 

प्रदीप्त हो दीप मन अंतरंग

जीवन में जगमग ज्योत जले


धर्म ध्वजा सुरभित अंतर मन

जीव दया का पहन के वसन


          कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 5 January 2021

निसर्ग मनोहर


 चौपाई छंद आधारित गीत।


निसर्ग मनोहर

चंदन वन महके महके से

पाखी सौरभ में बहके से

लिपट व्याल बैठे हैं घातक

चाँद आस में व्याकुल चातक।।


रजनी आई धीरे धीरे

इंदु निशा का दामन चीरे

नभ पर सुंदर तारक दल है

निहारिका झरती पल पल है।।


निशि गंधा से हवा महकती 

झिंगुर वाणी लगे चहकती

नाच रही उर्मिल उजियारी

खिली हुई है चंपा क्यारी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

आँसू क्षणिकाएं


 आँसू क्षणिकाएं


बह-बह नैन परनाल भये

दर्द ना बह पाय

हिय को दर्द रयो हिय में

कोऊ समझ न पाय।

~~

अश्क  बहते  गये

हम दर्द  लिखते  गये

समझ न  पाया  कोई

बंद किताबों में दबते गये ।

~~

रोने वाले सुन आँखों में

आँसू ना लाया कर

बस चुपचाप रोया कर

नयन पानी देख अपने भी

कतरा कर निकल जाते हैं।

~~

दिल के खजानों को

आँखों से न लुटाया कर

ये वो दौलत है जो रूह में

महफूज़ रहती है।

~~

दर्द को यूँ सरेआम न कर

कि दर्द अपना नूर ही खो बैठे।

~~

आँखों  से मोती गिरा

हिय को हाल बताय।

लब कितने खामोश रहे

आँखें हाल सुनाय।

~~

   कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 3 January 2021

दूध मुंहा दौड़ चला


 दूध मुंहा दौड़ चला ।


जन्म लेते ही साल  दौड़ने लगा !!

हाँ वो गोड़ालिया नहीं चलता, नन्हें बच्चों की तरह,

बस सीधा समय की कोख से अवतरित होकर समय के पहियों पर चढ़ कर भागने लगता है।

उसे भागना ही पड़ता है वर्ना इतने ढेर काम सिर्फ ३६५ दिन में कैसे पूरा करें पायेगा।


वह स्वस्थ हो या अस्वस्थ उसे बस इतना ही जीवन काल मिलता है।


वो जाते जाते अपनी प्रतिछाया छोड़ जाता है फिर उतने ही काल के लिए।


वह रोगी हो, असाध्य रोगों से ग्रसित हो तो भी स्वयं मृत्यु को वरण करने का उसे हक नहीं।

उसे सारा ज़माना कोसता है,

चाहता है कि ये कलमुंहा चला जाए जल्दी , पर उसे दुआ बददुआ दोनों नहीं लगती। 


चिर शाप या वरदान से ग्रसित है, ये जन्मा अजन्मा न जाने किस देव या ऋषि से।


बस समय से इसका नाता हर पल रहता है, ये समय की पुस्तक में इतिहास बन कर रहता है। या फिर लोगों के दिल में खुशी की सौगात या ग़मो  का अंधकार बनकर।।


अलविदा!

सुस्वागतम !!


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा '

Friday, 1 January 2021

नारी काम पड़े तलवार


 आल्हा छंद आधारित गीत


नारी काम पड़े तलवार


नारी को मत समझो कोमल

काम पड़े बनती तलवार

संबल बनती दीन दुखी की

खल दुर्जन पर करती वार।


चंदन बन महकाती है तो

ज्वाला सी दहकाती फाग 

चंदा की शीतलता उसमें

सूरज जैसी जलती आग

प्रेम रखो तो सबसे न्यारी 

दुष्ट जनो से रखती खार।।


आंख उठे जो ले बेशर्मी

उन आँखों से नोचे ज्योत

बन कर दुर्गा सी संहारक

पापी जन की बनती मौत

शंभू सा ताण्ड़व कर सकती

काली जैसे काल सवार।। 


शोणित नाश करें कंसों का

धारण कर वो अम्बा रूप

जाग उठी है जो थी निर्बल 

तोड़ चुकी वो गहरे कूप

बोझ उठाती धरती जैसे

और किसी पर कब वो भार।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'।