कवि के स्वर पन्नों पर
नयन मुकुर हो आज बोलते
बंद होंठ में गीत हुए।।
अव्यक्त लेखनी में रव है
कौन मूक ये शब्द पढ़े
जब फड़फड़ा बुलाते पन्ने
मोहक लेख मानस गढ़े
फिर उभरती व्यंजनाएं कुछ
भाव शल्यकी मीत हुए।।
रूखे मरू मधुबन बनादे
काव्य सार बह के बरसे
खिले कुसुम आकाश मधुरिमा
तम पर चंदनिया सरसे
मृदुल थाप बादल पर बजती
मारुत सुर संगीत हुये।।
कविता जो रुक जाये तो फिर
कल्पक कब जीवित रहता
रुकी लेखनी द्वंद हृदय में
फिर कल्पना कौन कहता
मौन गूँजते मन आँगन में
कंपित से भयभीत हुये।।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'






