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Tuesday, 17 November 2020

कवि के स्वर पन्नों पर


 कवि के स्वर पन्नों पर


नयन मुकुर हो आज बोलते

बंद होंठ में गीत हुए।।


अव्यक्त लेखनी में रव है

कौन मूक ये शब्द पढ़े

जब फड़फड़ा बुलाते पन्ने

मोहक लेख मानस गढ़े

फिर उभरती व्यंजनाएं कुछ

भाव शल्यकी मीत हुए।।


रूखे मरू मधुबन बनादे

काव्य सार बह के बरसे

खिले कुसुम आकाश मधुरिमा

तम पर चंदनिया सरसे

मृदुल थाप बादल पर बजती

मारुत सुर संगीत हुये।।


कविता जो रुक जाये तो फिर

कल्पक कब जीवित रहता

रुकी लेखनी द्वंद हृदय में

फिर कल्पना कौन कहता

मौन गूँजते मन आँगन में

कंपित से भयभीत हुये।।


   कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 11 November 2020

दीपमाला


 दोहा छंद- दीप माला

1

नीले निर्मल व्योम से, चाँद गया किस ओर।

दीपक माला सज रही, जगमग चारों छोर।


2 दीप मालिका ज्योति से, झिलमिल करता द्वार।

आभा बिखरी सब दिशा, नही हर्ष का पार।


3 पावन आभा ज्योति का, फैला  पुंज प्रकाश।

नाच रहा मन मोर है, सभी दिशा उल्लास।। 


4दूर हुआ जग से तमस छाया है उजियार।

जन जन में बढ़ता रहे, घनिष्ठता औ प्यार।


5 स्वर्ण रजत सा दीप है, माँ के मंदिर आज।

 रिद्धि-सिद्धि घर पर रहे, करना पूरण काज।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 8 November 2020

आज नया एक गीत लिखूं


 आज नया एक गीत लिखूँ मैं । 


           वीणा का गर

           तार न झनके 

           मन  का कोई

           साज लिखूँ मैं।

आज नया एक गीत लिखूँ मैं।


            मीहिका से

        निकला है मन तो 

          सूरज की कुछ

          किरण लिखूँ मैं।

 आज नया एक गीत लिखूँ मैं।


              धूप सुहानी

            निकल गयी तो  

               मेहनत का

           संगीत  लिखूँ मैं।

   आज नया एक गीत लिखूँ मै।


             कुछ खग के

           कलरव लिख दूँ

           कुछ कलियों की

           चटकन लिख दूँ

   आज नया एक गीत लिखूँ मैं।


           क्षितिज मिलन की

                मृगतृष्णा है 

               धरा मिलन का

              राग लिखूँ मैं ।

  आज नया एक गीत लिखूँ मैं ।


                 चंद्रिका ने

              ढका विश्व को 

              शशि प्रभा की

            प्रीत  लिखूँ मैं ।

    आज नया एक गीत लिखूँ मैं।


            कसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Thursday, 5 November 2020

ऐ चाँद


 ऐ चाँद तुम...


ऐ तुमचाँद

कभी किसी भाल पर

बिंदिया से चमकते हो 

कभी घूँघट की आड़ से

झाँकता गोरी का आनन 

कभी विरहन के दुश्मन 

कभी संदेश वाहक बनते हो

क्या सब सच है 

या है कवियों की कल्पना 

विज्ञान तुम्हें न जाने 

क्या क्या बताता है

विश्वास होता है 

और नहीं भी 

क्योंकि कवि मन को  

तुम्हारी आलोकित 

मन को आह्लादित करने वाली 

छवि बस भाती 

भ्रम में रहना सुखद लगता

ऐ चांद मुझे तुम 

मन भावन लगते 

तुम ही बताओ तुम क्या हो

सच कोई जादू का पिटारा 

या फिर धुरी पर घूमता 

एक नीरस सा उपग्रह बेजान।।

ऐ चांद तुम.....


      कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 3 November 2020

अनासक्त निर्झर

 अनासक्त निर्झर


शैल खंड गिर चोटिल होते

फिर भी मोती झरते जैसे

चोट लगे कभी हृदय स्थल पर

सह जाते सब पीड़ा ऐसे।


किस पर्वत की ऊंची चोटी

बर्फ पसर कर लम्बी सोती

रेशम जैसे वस्त्र पहनती

धूप मिले तो कितना रोती

जन्म तुम्हारा हुआ पीर से

और बने निर्झर तुम तैसे।।


पथरीले सोपान उतरकर

रुकता नही निरंतर चलता

प्रचंड़ कभी गंभीर अथाह

धूप ताप में हरपल जलता

पर्वत का आँसू है झरना

नदी हर्ष की गाथा कैसे ।।


झील पोखरा सरिता बनकर

निज आख्या तक भी छोड़ जिये

एक पावनी गंगा बनकर 

फिर जाने कितने त्याग किये

लेना चाहे ले सकता है

नही नीर के कोई पैसे ।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'


Sunday, 1 November 2020

एक ऐसा गीत

 कोई ऐसा गीत सुना दूँ

सुन के जिस को हर दिल झूमें

एक ऐसा गीत सुना दूँ।


बंद कली घूंघट पट खोले

भँवरे भी घायल हो डोले

कुहुक उठे  कोयलिया

ठहरी पायल बोले।


कोई ऐसा गीत सुना दूँ। 


जिन होठों से गीत हैं छूटे

उन पर तान सजा दू़

जिन आँखों से सपने रुठे

सपने सरस सजा दूँ।


कोई ऐसा गीत सुना दूँ ।


 


कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Wednesday, 28 October 2020

लालसा

 लालसा


है छलावा हर दिशा में 

धुंध के बादल उमड़ते 


दिन सजाता कामनाएं 

वस्त्र बहु रंगीन पहने 

श्याम ढ़लते लाद देते 

रत्न माणिक हीर गहने 

स्वप्न नित बनकर पखेरू 

बादलों के पार उड़ते।


बाँध कर के पाँख मोती 

मन अधीरा फिर भटकता 

नापता है विश्व सारा 

मोह जाले में अटकता 

भूलता फिर सब विवेकी 

ज्ञान के तम्बू उखड़ते।।


लालसा का दास मानव 

नाम की बस चाह होती 

अर्थ के संयोग से फिर 

भावना की डोर खोती 

द्वेष की फिर आँधियों में 

मूल्य के उपवन उजड़ते।।


कुसुम कोठारी'प्रज्ञा'