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Monday, 28 October 2019

मधुरागी

मधुरागी

सुंदर सौरभ यूं
बिखरा मलय गिरी से,
उदित होने लगा
बाल पंतग इठलाके,
चल पड़ कर्तव्य पथ
का राही अनुरागी
प्रकृति सज उठी है
ले नये शृंगार मधुरागी
पुष्प सुरभित
दिशाएँ रंग भरी
क्षितिज व्याकुल
धरा अधीर
किरणों की रेशमी डोर
थामे पादप हंसे
पंछी विहंसे
विहंगम कमल दल
शोभित सर हृदी
भोर सुहानी आई
मन भाई।

    कुसुम कोठारी ।

Friday, 25 October 2019

शुभ भावों से दिपित दीवाली

शुभ भावों से दिपित दीवाली

घर का हर कोना चमकाया
कुड़ा करकट भी  निसराया
अब बारी है सोचों की
उन को भी दुरस्त कुछ कर लें
बेकार की बातें  बिसरायें
सुंदर भावों से मन चमकायें
स्नेह से दिल की दिवारें रंग लें
सकारात्मकता की सजावट करलें
प्यार विश्वास का दीप जला लें ।

             कुसुम कोठारी ।

Tuesday, 22 October 2019

देह दीप में सन्मति का तेल

जलते दीप को देख,
दूर एक दीपक बोला
क्यों जलते औरों की खातिर
खुद तल में तेरे है अंधेरा ,
दीपक बोला गर नीचे ही देख लेता
तो वहाँ नही अंधेरा होता ,
बस मैं हूं केवल कलेवर
मैं कहां कब जला,
जले तो मिल तेल,बाती
और भ्रमित संसार ये बोले
देखो दीप जला,
सच-मुच जग को
गर करना रौशन ,
तो ऐ ! मानव सुन
देह दीप में सन्मति का तेल
और ज्ञान की बाती से
बस ज्योति जला
बस एक ज्योति जला ।

             कुसुम कोठारी ।

Friday, 18 October 2019

दीवाली

दीपमालिका दीप ज्योति संग
भर-भर खुशियां लायी
नवल ज्योति की पावन आभा 
प्रकाश पुंज ले आयी
प्रज्वलित करने मन प्रकाश को
दीपशिखा लहरायी
पुलकित गात,मुदित उर बीच
ज्यों स्नेह धारा बह आयी
अमावस के अंधियारे पर
दीप  चांदनी  छायी
मन तारों ने झंकृत हो
गीत  बधाई  गायी
चहूं ओर उल्लास प्रदिप्त
घर-घर खुशियां छायी
मन मयूर कर नृतन कहे
लो दीपमालिका आयी ।

    कुसुम कोठारी ।

Thursday, 17 October 2019

तुम्ही छविकार चित्रकारा



          तुम्ही छविकार चित्रकारा 

तप्त से इस जग में हो बस तुम ही अनुधारा
तुम्ही रंगरेज तुम्ही छविकार, मेरे चित्रकारा,
रंग सात नही सौ रंगो से रंग दिया तूने मुझको
रंगाई ना दे पाई तेरे पावन चित्रों की तुझको।

हे सुरभित बिन्दु मेरे ललाट के अविरल
तेरे संग ही जीवन मेरा प्रतिपल चला-चल,
मन मंदिर में प्रज्जवलित दीप से उजियारे हो
इस बहती धारा में साहिल से बांह पसारे हो।

सांझ ढले लौट के आते मन खग के नीड़ तुम्ही
विश्रांति के पल- छिन में हो शांत सुधाकर तुम्ही,
मेरी जीवन नैया के सुदृढ़ नाविक हो तुम्ही 
सदाबहार खिला रहे उस फूल की शाख तुम्ही।।

                     कुसुम कोठारी।

Sunday, 13 October 2019

शरद पूर्णिमा का चांद

धवल ज्योत्सना पूर्णिमा की 
अंबर रजत चुनर ओढ, मुखरित
डाल-डाल चढ़ चंद्रिका  डोलत
पात - पात पर  रमत  चंदनिया
तारक दल  सुशोभित  दमकत
नील कमल पर अलि डोलत यूं
ज्यों श्याम मुखबिंद काले कुंतल
गुंचा महका ,  मलय  सुवासित
चहुँ ओर उजली किरण सुशोभित
नदिया  जल चांदी  सम चमकत
कल छल कल मधुर राग सुनावत
हिम गिरी  रजत  सम  दमकत
शरद  स्वागतोत्सुक मंयक की
आभा अपरिमित सुंदर शृंगारित
 शोभा न्यारी अति भारी सुखकारी।
             कुसुम  कोठारी।

Saturday, 12 October 2019

प्रेम के हरे रहने तक

पलाश का मौसम अब आने को है,
जब खिलने लगे पलाश
संजो लेना आंखों में
सजा रखना हृदय तल में
फिर सूरज कभी ना डूबने देना
चाहतों के पलाश का
बस यूं ही खिले-खिले रखना,
हरी रहेगी अरमानों की बगिया
प्रेम के हरे रहने तक।

           कुसुम कोठारी ।