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Tuesday, 8 May 2018

हल की खिडकीयां

मुश्किल हो कैसी भी दीवारें न चुन लो
हल की कुछ छोटी खिड़कियां खोल लो

नेकियाँ करते चलो दरिया मे डाल दो
जीवन को बहती मौजों मे ढाल दो

जहाँ दिखावे करने तय हो तो करते चलो
जहाँ मौन से काम हो वहां मौन रहो

हौसलों की कस्तियों पर सवार चलो
छोटी सी जिंदगी है भाई हंसी खुशी जीलो।
            कुसुम कोठारी।

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना।.........
    मेरे ब्लाॅग पर आपका स्वागत है ।

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  2. जी आभार ,
    जरुर।

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  3. वाह दीदी जी
    बेहतरीन सुंदर रचना

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    1. स्नेह आभार आंचल बहन

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