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Wednesday, 16 May 2018

एक वृक्ष की मनो व्यथा

मां को काट दोगे
माना जन्म दाता नही है
पर पाला तुम्हे प्यार से
ठंडी छांव दी प्राण वायु दी
फल दिये
पंछीओं को बसेरा दिया
कलरव उनका सुन खुश होते सदा
ठंडी बयार का झोंका
जो लिपटकर उस से आता
अंदर तक एक शीतलता भरता
तेरे पास के सभी प्रदुषण को
निज मे शोषित करता
हां काट दो बुड्ढा भी हो गया
रुको!! क्यों काट रहे बताओगे?
लकडी चहिये हां तुम्हे भी पेट भरना है
काटो पर एक शर्त है
एक काटने से पहले
कम से कम दस लगाओगे।
ऐसी जगह कि फिर किसी
 विकास की भेट ना चढूं मै
समझ गये तो रखो कुल्हाड़ी
पहले वृक्षारोपण करो
जब वो कोमल सा विकसित होने लगे
मुझे काटो मै अंत अपना भी
तुम पर बलिदान करुं
तुम्हारे और तुम्हारे नन्हों की
आजीविका बनूं
और तुम मेरे नन्हों को संभालना
कल वो तुम्हारे वंशजों को जीवन देगें
आज तुम गर नई पौध लगाओगे
कल तुम्हारे वंशज
फल ही नही जीवन भी पायेंगे।
            कुसुम कोठारी।

एक पेड काटने वालों पहले दस पेड़ लगाओ फिर हाथ मे आरी उठाओ

12 comments:

  1. बिल्कुल सही कुसुम जी, विकास की अंधी दौड़ में लोग प्रकृति को अनदेखा कर रहे हैं.

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    1. आपकी सुंदर व्याख्या और समर्थन का बहुत बहुत आभार सुधा जी ।

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  2. पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती उम्दा कविता

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    1. सादर धन्यवाद लोकेश जी ।

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  3. एक वृक्ष काटो दस उगाओ
    बहुत सुन्दर संदेश देती रचना...
    वाह!!!!

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  4. सादर आभार सुधा जी आपकी समर्थन देती प्रतिक्रिया का।

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  5. वाह दीदी जी बिलकुल पेड़ भी हमारे माता पिता सा आदरणीय है
    हमारे जीने का आधार है
    बहुत सुंदर लाजवाब रचना और उत्तम संदेश

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    1. सार्थक सुंदर टिप्पणी आंचल आपकी ।
      स्नेह आभार।

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  6. कल वो तुम्हारे वंशजों को जीवन देगें
    आज तुम गर नई पौध लगाओगे
    कल तुम्हारे वंशज
    गहन भाव समेटे यह पंक्तियां ...बहुत ही बढि़या अभिव्‍यक्ति ।

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    1. जी सादर आभार, रचना का सारांश हैं आपने बखूबी पकडा लेखन सार्थक हुवा ।

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  7. पर्यावरण तो सबकी साझा समस्या है ... सिंकिंग चिंतन करना होगा ... सुंदर सामयिक रचना है ...

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  8. सादर आभार आदरणीय सिर्फ चिंतन ही नही कार्यान्वित करने होंगे सक्रिय साझेदारी के साथ।
    आपकी सार्थक प्रतिक्रिया के लिये पुनः आभार ।

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