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Sunday, 5 August 2018

धरा का स्वर्ग

देव लोक से अनुठी नगरी

विधाता ने जब रचा
कश्मीर धरा पर
स्वयं भी अचम्भित रह गया
ये क्या बना ङाला मैने ,
सुर और सुरपति भी थे रोष में
देवलोक से अनुठी ये नगरी
क्यों मानव लोक में ,
सुर बालायें भ्रमित
कहां रहना हो उनका
अपने सुर लोक में
या स्वर्ग से सुंदर इस लोक में ।

        कुसुम कोठारी ।

6 comments:

  1. Replies
    1. जी सादर आभार ।

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  2. सुन्दर सृजन कुसुम जी ।

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    1. सादर आभार मित्र जी।

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  3. सुर और सुरपति भी थे रोष में
    देवलोक से अनुठी ये नगरी
    क्यों मानव लोक में ,
    बहुत बढ़िया

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    1. जी सादर आभार ।

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