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Monday, 23 July 2018

दर्द यूंही दम तौड़ता है

.  दर्द यूंही दम तोड़ता

     चाँद रोया रातभर
   शबनमी अश्क बहाये
 फूलों का दिल चाक हुवा
    खिल न पाये खुल के
 छुपाते रहे उन अश्को को
     अपने पंखुरियों तले
  धूप ने फिर साजिश रची
होले से उन को खुद मे समेटा
    और अभिमान से इतराई
      कह रही ज्यों यूं ही दर्द
       दम तोडता है थककर
      और छुप जाता न जाने
    किन परदों तले होले होले।

            कुसुम कोठारी।

6 comments:

  1. खूबसूरत शब्दों से सजी हुई रचना

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    1. आभार मित्र जी ढेर सा।

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  2. अनुपम... कमाल का मानवीकरण,
    धूप ने फिर साजिश रची
    होले से उन को खुद मे समेटा
    और अभिमान से इतराई
    कह रही ज्यों यूं ही दर्द
    दम तोडता है थककर...
    बेहतरीन सृजन आदरणीया, चाँद रोया रात भर, प्रथम पंक्ति ही मन में आशातीत हलचल मचा रही है, वाह

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    1. सादर आभार भाई अमित जी आप एक अच्छे रचनाकार ही नही अच्छे समीक्षक भी हैं आपने रचना पर जो प्रतिक्रिया दी है वो असाधारण हैं
      बिंबों के माध्यम से मानवीय करण को आपने सहज व्याख्यात्मक ढंग से पेश किया सच कहूं तो ऐसी टिप्पणी से रचना और रचना कार का ही सिर्फ मान नही बढ़ता अपितु टिप्पणी कर्ता की प्रबुद्धता ज्यादा प्रशंसनिय हो जाती है।
      पुनः अशेष आभार।

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  3. वाह 👌👌👌बहुत खूब लिखा सखी
    दर्द में भी खूबसूरती बिखरने लगी
    अंदाज बेहद शानदार है 👏👏👏

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  4. सखी आपकी प्रतिक्रिया सदा कितना उत्साहित करती है मै बता नही सकती ढेर सा स्नेह।

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