Followers

Saturday, 6 June 2026

माँ भारती


 माँ भारती के सम्मान में


अब ले तिरंगा हाथ में चल मान से।

भू सज रही अब केसरी परिधान से।


जयकार की गूंजे सुहानी आ रही।

ऊँचा रखेगें भाल भी सम्मान से।।


गाथा कहें माँ भारती की हम सदा।

हर ओर गौरव गान हो अभिमान से।।


रख स्वावलंबी आज अपना ध्येय भी।

पूरा न हो कोई प्रयोजन दान से।।


करते रहे हम शोध हर दिन ही नवल।

ये विश्व सारा मुग्ध हो पहचान से।


हों विश्व गुरु हम ये प्रतिष्ठित भाव हो ।

होगा सफल विज्ञान अपने ज्ञान से।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 23 February 2025

व्योम


 गीत:  व्योम


व्योम का रूप ज्यों, कृष्ण की नीलिमा।

अंक तारे भरे, फूल ज्यों चंद्रिमा।


चंचला चाँदनी, चाँद से झाँकती।

नीलिमा नील से,व्योम को आँकती।

रत्न झोली लिए, कौन बाला खड़ी

रात की ओढ़नी, शुभ्र हीरों जड़ी

गंग है रौप्य की, मोहिनी  चाल है।

पुर्णिमा की धवल, ज्योति है आशिमा।


रात यूँ भागती, कौन से देश को,

साथ जो ले चली,श्यामला वेश को।

चाँद भी जा रहा, नीम तारे छटे,

पूर्व है जागता, कालिमा अब घटे।

शुभ्र आभा झरे, भोर में राग है

व्योम के भाल पर,सूर्य की अरुणिमा।


शुभ्र अब मेदिनी, ध्वांतता खो रही,

अंशुमाली जगा, ओस ज्यों सो रही।

कौस्तुभी रंग है, रूप में तेज है,

पूर्ण वो जब तपे, आग की सेज है।

व्योम में शोभते, मेदिनी के देव तुम,

प्राण हो आभ हो, तीक्ष्ण है भंगिमा।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 17 July 2024

सावन मनभावन


 सावन मनभावन 


ऋतु का सुंदर रूप उजागर

सावन आतुर है आने को।

मन वीणा में सरस रागिनी 

गान खुशी का अब गाने को।


ओस कणों के संग सुनहली,

उर्मिल देखो क्रीड़ा करती।

सूरज की चमकीली बाँहें,

वसुधा आँगन आभा भरती।

हवा चली है, मन मुकुलित सा

मचल रहा सब कुछ पाने को।


आज पवन है भीगी भीगी,

पात-पात निखरा-निखरा।

हर बिरवे की डाली मुखरित, 

कानन का आँगन हरा-भरा।

श्याम सलौने मचल रहे हैं,

आकाश रेख तक छाने को।।


माटी महकी सौरभ बिखरा,

सरित कूल दादुर का खेला‌

विहग टोलियाँ कलरव करती,

खुशियों का सजता है मेला।

कवि के उर  में कविता मचली

भावों के दीप जलाने को।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 7 April 2024

गीतिका


 गीतिका 


हार गले में फूलों के हो श्रम से मोती लाना होगा।

कठिन नहीं होगा अब कुछ भी गीत जीत का गाना होगा।


दृढ़ता से आगे बढ़लें तो राहें सदा मिला करती है।

तजकर अंतस का आलस बस उद्यम से सब पाना होगा।


दुख के काले बादल छाए हाथों से सब छूटा जाए।

जो बीता वो बीत गया अब नवल हमारा बाना होगा।।


आत्म साधना करते रहना ध्येय मोक्ष का रखना शाश्वत । 

पुण्य गठरिया बाँध रखो तुम सदन छोड़ कब जाना होगा। 


पर्यावरण स्वच्छ रखना है इससे ही मानव हित समझो।

दानी बड़ी प्रकृति अपनी हर चिड़िया को दाना होगा।


मातृभूमि पर प्राण वार दें प्रज्ञा से यह निश्चय कर लें।

एक साथ मिलकर ही सब को बैरी पर अब छाना होगा।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 21 February 2024

निसर्ग अद्भुत


 चामर छंद आधारित गीत


चातकी गुहार भी सदैव मोह में ढली।

बीतती हुई निशा बड़ी लगे भली- भली।


नीलिमा अनंत की वितान रूप नील सी।

मंजुला दिखे निहारिका विशाल झील सी‌।

आसमान शोभिनी प्रकाश भंगिमा भरी।

वो विभावरी चली लगे निवेदिता खरी।

झींगुरी प्रलाप गूंज खंद्दरों गली-गली।


चातकी गुहार भी सदैव मोह में ढली।


काल अंधकार का महा वितान छोड़ता। 

शंख नाद भी बजा प्रमाद ऊंघ तोड़ता।

पूर्व के मुखारविंद स्वर्ण रूप सा जड़ा।

पक्ष-पक्ष भानु का प्रकाश पूंज है झड़ा।

मोहिनी सरोज की खिली लगे कली-कली।।


चातकी गुहार भी सदैव मोह में ढली।


भोर नन्दिनी उठी अबोध रूप भा गया।

कोकिला प्रमोद में कहे बसंत आ गया‌‌

मोह में फँसा विमुग्ध भृंग है प्रमाद में।

हंस है उदास सा मरालिनी विषाद में।

हो उमंग में विभोर मोद से हवा चली।।


चातकी गुहार भी सदैव मोह में ढली।

कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Tuesday, 6 February 2024

निशा की ओर


अरविंद सवैया

निशा की ओर

ढलता  रवि साँझ हुई अब तो, किरणें पसरी चढ़ अंबर छोर।
हर कोण लगे भर मांग रहा, नव दुल्हन ज्यों मन भाव विभोर।
खग लौट रहे निज नीड़ दिशा, अँधियार भरे अब सर्व अघोर।
तन क्लांत चले निज गेह सभी, श्रम दूर करे अब श्रांन्ति अथोर।।

कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Sunday, 21 January 2024

निशा के कौतुक


 निशा के कौतुक


नव पल्लव की सेज सजी है

पसरी उनपर उर्मिल शीतल

विटप शाख का सरस झूलना

प्रभाकीट का मचल रहा दल।।


सुमन सो रहे नयन झुकाए

तारक दल करते मन मोहित

ओपदार बादल के टुकड़े

नभ पर इधर उधर सोहित

सरिता बहती सरगम बजती

मनभावन सी लगती कल-कल।।


विटप शाख का सरस झूलना

प्रभाकीट का मचल रहा दल।।


झींगुर झीं झीं करते भागे

बोले बुलबुल बोल रसीले

वहाँ पपीहा पी तब गाए

कलझाते जब बादल नीले

लो थम-थम के पवमान चले 

खड़ी सौम्य रजनी भी  निश्चल।।


विटप शाख का सरस झूलना

प्रभाकीट का मचल रहा दल।।


दूर श्रृंग के पीछे छुपकर

चाँद खेलता लुकछिप खेला

चट्टानों के भूरे तन पर

रजत चाँदनी का है मेला

गहरे सागर के पानी में

मची हुई है भारी खलबल।।


विटप शाख का सरस झूलना

प्रभाकीट का मचल रहा दल।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 13 January 2024

सूरज की संक्रांति


 मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।


रवि ने ओढ़ी आज रजाई

मुंह ढाप कर सोए।

कितने दिवस बाद कश्यप सुत

सुख सपने में खोए।


पोष मास में सूर्य देव जब

मकर राशि में आते

सरिता में नाहन होता है

पर्व मनाए जाते

त्याग शीत का भय भक्तों ने

पाप गंग में धोए।।


ठंडी ठंडी चले हवाएं

पादप पात गिराते

गुड़  तिल के मिष्ठान अनूठे

सभी चाव से खाते

तभी ठंड फिर करवट लेती

गंगा चीर भिगोए।


दान स्नान का लाभ कमाए

आस्था सह नर नारी

अलग-अलग प्रांतों में मनता

मेले लगते भारी

पुण्य मिले संक्रांति काल में

शुभ दाने जो बोए।


किया अगर शुचिता परिवर्तन 

फिर क्यों भव-भव रोए।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Friday, 12 January 2024

युवा दिवस


 राष्ट्रीय युवा दिवस पर समस्त युवा शक्ति को हार्दिक शुभकामनाएँ 🌹

युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद जी की शिक्षाएं 


उठो युवाओं नींद से, बढ़ो चलो हो दक्ष।

जब तक पूरा कार्य हो, लगे रहो प्रत्यक्ष।।


जीवन में संयम रखो, रखो ध्यान पर ध्यान।

दृष्टि रखो बस चित्त पर, तभी बढ़ेगा ज्ञान।।


अनुभव जग में श्रेष्ठ है, यही शिक्षक महान।

अनुभव से सब सीख लो, यहीं दिलाता मान।।


उद्यम धैर्य पवित्रता, तीन गुणों को धार।

जग में हो सम्मान भी, यही आचरण सार।।


निज पर हो विश्वास तो, पूरण होते काम।

निज पर निज अवलंब ही, कार्य सरे अविराम।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 3 January 2024

मदी जा रही निशा

गीतिका:मदी जा रही निशा


लहर आ करे खेल तट पर उछल कर।

कभी सिंधु हिय में बसे फिर मचल कर।।


हवा कर रही क्यों यहाँ छेड़खानी।

लगे आ रही अब दिशाएँ बदल कर।।


बजे रागिनी ये मधुर वृक्ष डोले।

सरस गा रहा है पपीहा बहल कर।।


धरा पर नमी है उधर चा़ँद भीगा।

झटक वो गिरी चाँदनी भी सँभल कर।।


किरण सो रही है लता पर पसर अब।

मदी जा रही है निशा भी खजल कर।।


गगन आँगने में चमक जो बिखेरे‌

कई एक तारे जगे हैं पटल कर।।


स्वरचित 

कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Tuesday, 19 December 2023

स्वार्थी मतियाँ

स्वार्थी मतियाँ


पौढ़ शिखर के तुंग 

खरी थी पावन निर्मला

सिंधु से मिली गंग

बनी खारी सकल अमला


गोद भरा अब गाद

हमारी मूढ़ मतियों ने

सदा किया था गर्व

अनोखी वीर सतियों ने

बन बहती वरदान

कभी था रूप भी उजला।।


मनुज बड़ा ही ठूंठ 

पहनकर स्वार्थ की पट्टी

खेले भारी खेल

उथलकर काल की घट्टी

दलदल बनाता और

निशाना भी बने पहला।।


गहरे हैं अवगाह

भयानक आपदा होगी

होंगे सकल अनिष्ट 

निरपराधी भुगत भोगी

पिघल रहे मुख ज्वाल

पत्थर हृदय नहीं दहला।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Thursday, 30 November 2023

सूरज के बदलते रूप


 सूरज के बदलते रूप (सवैया छंद)


यामा जब आँचल नील धरे, सविता जलधाम समाकर सोता।

आँखे फिर खोल विहान हुई, हर मौसम रूप पृथक्कृत होता।

गर्मी तपता दृग खोल बड़े, पर ठंड लगे तन दे सब न्योता। 

वर्षा ऋतु में नभ मेघ घने, तब देह जली अपनी फिर धोता।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 16 November 2023

कुछ जो शाश्वत है

कुछ जो शाश्वत है 

खार ही खार हो अनंत सागर के अपरिमित अंबू में।
मोती हृदय में धारण करके शीपियाँ तो मुस्कुराएँगी।

तुषार पिघले कितना भी धीरे मौनी साधक सा चाहे।
अचल की कंकरियाँ तो सोत संग सुरीले गीत गाएँगी।

चाहे साँझ सुरमई सी चादर बिछा दे विश्व आँगन पर।
तम की यही राहें उषा के सिंदूरी आँचल तक जाएँगी।

भग्न हृदय की भग्न भीती पर उग आई जो कोंपलें।
जूनी खुशियों के चिर परिचित गीत तो गुनगुनाएँगी।

नाव टूटी ही सही किनारे बंधी हो चाहे निष्प्राण सी।
फिर भी सरि की चंचल लहरें तो आकर टकराएँगी।

दीप है तेल और बाती भी पर प्रकाश नहीं दिखता।
जलती अंगारी ढूंढ लो जो बातियों में जीवन लाएँगी।

स्वरचित
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'
 

Wednesday, 8 November 2023

दुर्दिन

दुर्दिन


काले बादल निशि दिन छाये

चाबुक बरसाता काल खड़ा।

सूखी बगिया तृण तृण बिखरी

आशाओं का फूल झड़ा।।


चूल्हा सिसका कितनी रातें

उदर जले दावानल धूरा

राख ठँडी हो कंबल माँगे

सूखी लकड़ी तन तम्बूरा

अंबक चिर निद्रा को ढूंढ़े

धूसर वसना कंकाल जड़ा।।


पोषण पर दुर्भिक्ष घिरा है

खंखर काया खुडखुड़ ड़ोले

बंद होती एकतारा श्वांसे 

भूखी दितिजा मुंँह है खोले

निर्धन से आँसू चीत्कारे

फिर देखा हर्ष अकाल पड़ा।।


आर्द्र विहिन सूखा तन पिंजर

घोर निराशा आँखे खाली

लाचारी की बगिया लहके

भग्न भाग्य की फूटी थाली

अहो विधाता कैसा खेला

पके बिना ही फल शाख सड़ा।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

 

Monday, 30 October 2023

कार्तिक मास का स्वागत


 कार्तिक मास का स्वागत


आया कार्तिक मास है, ऋतु ने बदला वेश।

त्योंहारों की आन ये, पुल्कित सारा देश।।


हवा चले मनभावनी, मुदित हुआ मन आज।

कार्तिक महीना आ गया, सुखद लगे सब काज।।


दीपमालिका आ रही, सजे हाट बाजार।

कार्तिक तेरी शान में, दीप जले दिशि चार।।


झिलमिल झालर सज रहे, हर्षित है नर नार।

कार्तिक लेकर आ गया, खुशियों के त्यौहार।।


गर्मी भागी जोर से, पहन ठंड के चीर।

बादल भी अब स्वच्छ हैं, नहीं बरसता नीर।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 18 October 2023

नेता ऐसे ऐसे


 नेता ऐसे ऐसे 


मौका आया रंग दिखा कर

बिना बात ही अंगद बनिए

टाँग जमा दें अपनी ऐसे

बिदकी घोड़ी बन कर अड़िए।


चोरी डाका भी डालें तो

अपना चोला रखें बचाकर

साम दाम की अधम कटारी

बात -बात में चले नचाकर

अपना कपटी मन कब हारा

छल बल से सौ-सौ कपट किए।।


अपनी सोचें जग को गोली

तेली के घर जाए निष्ठा

गाँठ टका हो मोटा भइया

माला आती लिए प्रतिष्ठा

मन दिगम्बरी खोट छिपे तो

जाली को ही वस्त्र समझिए।।


ऐसे गुणी प्रतापी बाँधव

अगर देश की शान सँवारे

ढोल पीटते मानवता का

राह भ्रमित से करते नारे

भरपाई करने को नित ही

सौ आश्वासन उपहार दिए।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 12 October 2023

श्याम का प्रस्थान


 श्याम का प्रस्थान


मन पर मेघ घिरे कुछ ऐसे

चुप है पायल की छनछन

गोकुल छोड़ चले गिरधारी 

आज विमोहित सा तनमन।।


पशुधन चुप-चुप राह निहारे

माँ का खाली उर तरसे

लता विलग सी राधा रानी

नयन गोपियों के बरसे

खेद खड़ा प्रस्फुटित राग का

बाँसुरिया से कुछ अनबन।।


रवि का जैसे तेज मंद हो

ठंडी निश्वासें छोड़े

निज प्रकृति भूलकर मधुकर

कलियों से ही मुख मोड़े

सूने पथ है सूनी गलियाँ

नही हवाओं में सनसन।।


पर्वत जैसी पीड़ा पसरी

बहे वेदना का सोता

सुगबग सुगबुग करता मानों 

यमुना का पानी रोता

सभी दिशाए़ मौन खड़ी ज्यों 

लूट चुका निर्धन का धन।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Saturday, 7 October 2023

जीवन जैसे युद्ध


 जीवन जैसे युद्ध 


जीवन जैसे युद्ध बना है

सुख बैठा पर्वत चोटी।

क्या धोए अब किसे निचोड़े

तन बस एक लँगोटी।।


कल्पक तेरी कविता से कब

दीन जनों का पेट भरा।

आँखे उनकी पीत वरण सी

स्वप्न अभी तक नहीं मरा।

रोटी ने फिर चाँद दिखाया

चाँद कभी दिखता रोटी।।


दग्ध हृदय में श्वांस धोकनी

खदबद खदबद करती है

बुझती लौ सा दीपक जलता

बाती तेल तरसती है

दृश्य देख अनदेखे करके

मानवता होती छोटी।।


झूठा करें दिखावा कुछ तो

हितचिंतक होते कितने

आश्वासन की डोरी थामे 

दिवस बीतते हैं इतने

भाषण करने वालों की

बातें बस मोटी मोटी।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Thursday, 21 September 2023

अद्भुत प्रकृति


 गीतिका:

अद्भुत प्रकृति 

आसमान अब झुका धरा भरी उमंग से।

लो उठी अहा लहर मचल रही  तरंग से।।


शुचि रजत बिछा हुआ यहाँ वहाँ सभी दिशा।

चाँदनी लगे टहल-टहल रही  समंग से।।


वो किरण लुभा रही चढ़ी गुबंद पर वहाँ।

दौड़ती समीर है सवार हो पमंग से।।


रूप है अनूप चारु रम्य है निसर्ग भी ।

दृश्य ज्यों अतुल दिखा रही नटी तमंग से।।


जब त्रिविधि हवा चले इलय मचल-मचल उठे।

और कुछ विशाल वृक्ष झूमते मतंग से।


वो तुषार यूँ 'कुसुम' पिघल-पिघल चले वहाँ।

स्रोत बन सुरम्य अब उतर रहे उतंग से।।


इलय/गतिहीन


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

Wednesday, 13 September 2023

हिन्दी कुशल सखी


 विश्व हिन्दी दिवस पर हार्दिक बधाई 💐💐


हिन्दी कुशल सखी


काव्य मंजूषा छलक रही है

नित-नित मान नवल पाये।

हिन्दी अपने भाष्य धर्म से

डगर लेखनी दिखलाये।।


भाव सरल या भाव गूढ़ हो

रस मेघों से आच्छादित

कविता मन को मोह रही है 

शब्द शक्तियाँ आल्हादित

प्रीत उर्वरक गुण से हिन्दी

संधि विश्व को सिखलाये।।


हिन्दी कवियों को अति रुचिकर 

कितने ग्रंथ रचे भारी

राम कृष्ण आदर्श बने थे

जन मन की हर दुश्वारी 

मंदिर का दीपक यह हिन्दी

विरुदावली भाट गाये ।।


जन आंदोलन का अस्त्र महा

नाट्य मंच का स्तंभ बनी

चित्रपटल संगीत जगत का

हिन्दी ही उत्तंभ बनी

अब नहीं अभिख्यान अपेक्षित 

यश भूमंडल तक छाये।।


कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'।