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Friday, 2 March 2018

उदास

शाम का ढलता सूरज
उदास किरणे थक कर
पसरती सूनी मूंडेर पर
थमती हलचल धीरे धीरे
नींद केआगोश मे सिमटती
वो सुनहरी चंचल रश्मियां
निस्तेज निस्तब्ध निराकार
सुरमई संध्या का आंचल
तन पर डाले मुह छुपाती
क्षितिज के उस पार अंतर्धान
समय का निर्बाध चलता चक्र
कभी हंसता कभी  उदास
ये प्रकृति का दृश्य है या फिर
स्वयं के मन का परिदृश्य
वो ही प्रतिध्वनित करता जो
निज की मनोदशा स्वरूप है
भुवन वही परिलक्षित करता
जो हम स्वयं मन के आगंन मे
सजाते है खुशी या अवसाद
शाम का ढलता सूरज क्या
सचमुच उदास....... ?
         कुसुम कोठारी ।

4 comments:

  1. वाह !!! बहुत सुन्दर रचना

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  2. वाह सत्य मीता
    मन ही परिलक्षित होता
    हर मौसम हर भाव
    खुशी उदासी तो बस हिय मैं
    मन का बहता भाव

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