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Thursday, 29 March 2018

चांद कटोरा

.          चांद कटोरा
चंचल किरणें  शशी की
झांक रही थी पत्तियों से 
उतर आई अब मेरे आंगन
जी करता इनसे अंजलीे भर लूं
या फिर थाली भर भर रख लूं
सजाऊं घर अपना इन रजत रश्मियों से
ये विश्व सजाती मन को भाती
धरा पे बिखरी -बिखरी जाती
खेतों, खलियानो ,पनघट , राहें ,
दोराहे , छत , छज्जै ,पेड़, पोधे
वन उपवन डोलती फिरती
ये चपल चंद्रिकाऐं  बस अंधेरों से खेलती
पूर्व मे लाली फैलने से पहले 
लौट जाती अपने चंदा के पास
सिमटती एक कटोरे मे चांद कटोरे मे ।
             कुसुम कोठारी ।

8 comments:

  1. वाह वाह!! अद्भुत
    चांद कटोरे में भरी चन्द्रिकायें सजा दिया है कोना कोना
    बस गई मन के आंगन में बन कर सुखद सपन सलोना
    कुसुम जी यूंही अपनी काव्यकिरणें चहुँओर फैलाती रहें

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    1. पूजा जी आपकी अभिव्यक्ति सिर्फ सराहना नही एक काव्य है मनमोहक, बहुत सुंदर पंक्तियाँ आपकी, और ब्लाग पर आपकी प्रतिक्रिया से मन अभिभूत हुवा।
      ढेर सा आभार

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  2. सुन्दर भाव सौन्दर्य और अभिराम बिम्ब लालित्य!!!

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    1. बहुत सा आभार विश्व मोहन जी आप जैसे प्रतिष्ठित प्रबुद्ध रचनाकारों से सराहना पाना रचना की सार्थकता है।
      मन अभिभूत हुवा

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  3. शानदार चाँद कटोरा....
    वाह!!!!
    चपल चन्द्रिकाओं का आँगन में उतरना....
    एक खूबसूरत ख्याल...!!

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  4. बहुत सुंदर पंक्तियाँ

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    1. स्नेह आभार नीतू जी

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