मन की वीणा - कुसुम कोठारी।

Monday, 24 August 2020

प्रारब्ध

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 प्रारब्ध चंचल चाँद रजत का पलना   मंदाकिनी गोद में सोता । राह निहारे एक चकोरी   कब अवसान दिवस का होगा बस देखना प्रारब्ध ही था सदा विरह उसने ...
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रात सदा रात होती है

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 रात सदा रात होती है। रोशनी होना ही तो दिन नही है रात सदा रात होती है, चाहे चंद्रमा अपने शबाब पर हो  प्रकाश की अनुपस्थिति अँधेरा है, पर प्रक...
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Monday, 17 August 2020

समय औचक कोड़ा

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 समय औचक कोड़ा गूंज स्वरों की मौन हुई जब पाहन हुवा धड़कता तन। मानस से उद्गार गये तो चमन बना ज्यों उजड़ा वन। नित नव सरगम रचता अंतस हर इक सुर ...
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Sunday, 16 August 2020

बस एक मुठ्ठी आसमां

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 बस एक मुठ्ठी आसमां आकर हाथों की हद में सितारे छूट जाते हैं हमेशा ख़्वाब रातों के सुबह में टूट जाते हैं।  मंजर खूब लुभाते हैं, वादियों के मग...
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Friday, 14 August 2020

तिरंगे की शान में

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          तिरंगे की शान में सिर्फ अब न वादे होंगे  जीत की आशा फलेगी। ठान ले हर देश वासी रात तब गहरी ढलेगी। लाखों की बलिवेदी पर  तिरंगे का इत...
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Wednesday, 12 August 2020

हरि कब आवोगे

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  जन्म दिवस तो नंद लाल का हर वर्ष हम मनाते हैं, पर वो निष्ठुर यशोदानंदन कहां धरा पर आते हैं , भार बढ़ा है अब धरणी का पाप कर्म इतराते हैं, वस...
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Sunday, 9 August 2020

विसंगतियाँ

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विसंगतियाँ कहीं उजली,  कहीं स्याह अंधेरों की दुनिया , कहीं आँचल छोटा, कहीं मुफलिसी की दुनिया।  कहीं  दामन में चाँद और  सितारे भरे हैं , कहीं...
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