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Saturday, 13 January 2018

अलाव
अच्छा लगता है ना, जाडे मे अलाव सेकना
खुले आसमान के नीचे बैठ सर्दियों से लडना
हां कुछ देर गर्माहट का एहसास
तन मन को अच्छा ही लगता है
पर उस अलाव का क्या
जो धधकता रहता हर मौसम
अंदर कहीं गहरे झुलसते रहते जज्बात
बेबसी,बेकसी और भुखे पेट की भट्टी का अलाव
गर्मीयों मे सूरज सा जलाता अलाव
धधक धधक खदबदाता
बरसात मे सिलन लिये धुंवा धुंवा अलाव
बाहर बरसता सावन, अंदर सुलगता
पतझर मे आशाओं के झरते पत्तों का अलाव
उडा ले जाता कहीं उजडती अमराइयों मे
सर्दी मे सुकून भरा गहरे तक छलता अलाव।
                 कुसुम कोठारी।

3 comments:

  1. अलाव हमारी सांस्कृतिक धरोहर का एक हिस्सा है, और सदियों से इसे खुशियों का प्रतीक मान "केम्प फायर" "बोन फायर" के रूप मे सर्दियों मे सांस्कृतिक उत्सवों के साथ जोड कर सारे संसारिक प्रारब्धो से कुछ समय दूर हो एक गहरा सकून और पुनः तरोताजा सा महसूस कर नई सांसारिक भुल भुलैया मे स्वयं को बेहतर तरीके से फिर से स्थापित कर जीवन युद्ध मे चल पडते की नव उर्जा है।
    पर गरीब और भुख के लिये अलाव गर्मी देने का या भोजन पकाने का साधन मात्र बन कर रह जाता है रद्दी कागज और जलाने लायक कुछ भी जलाकर ठिठुरती ठंड से निजात का भ्रम है और एक पंथ दो काम उसी मे रोटी खिचड़ी शकरकंद आलु और मुंगफली भुन कर अपनी अपनी पहुंच के हिसाब से आनंद लेते है और साथ ही समूह मे बैठ गर्मा गरम गपशप और नोकझोंक का मजा, सब विस्मृत करके।

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  2. बहुत बहुत बधाई ब्लॉग पर आप की पहली रचना ...बहुत ही सुन्दर दिन मन को भा गई आप की रचना...एक शब्द को बहुत विस्तार से लिखा है आपने ...सब कुछ समादिया चंद पंक्तियो में ...ये आप ही कर सकती है

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    1. +Nitu Thakur जी आभार नीतू जी ।
      पर पहली नही ये तीसरी रचनि है अभी पांच दिन पहले ही ब्लॉग बनाया था आपका स्नेह सहयोग बना रहे नीतू जी मेरी रचना के मर्म तक जाने के लिये शुक्रिया आप एक प्रबुद्ध सहरचनाकारा हो।
      शुभ दिवस।

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