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Friday, 10 April 2020

मीत मिले

मीत मिले

लहरों की मधुरिम सी हलचल
सरस किनारा सागर का ।
छलक रहा मधुरस भी ऐसा
भरी रसवंति गागर का।।

समय बांटता मुक्ता अविरल
चुनने वाला है चुनता ।
रेशम डांड हृदय पंकज की
सुंदर सी अवली बुनता।
मीत मिले निलाम्बर अतल पर
हर्षित मन जलआगर का।।

नम सैकत पांवों के नीचे
थिरक थिरक तन मन घूमे।
एक ताल पर लहरें मटकी
एक ताल दो  दिल झूमे।
समय बीत का भान नही सुध
नभ डेरा कोजागर का ।।

नील सिंधु में रमती उर्मिल
मौसम भर भर मद प्याला।
वितान अम्बर पर खुशियों का
मद्यप  दर्पित सुर बाला।
जीवन इसी घड़ी पर ठहरा
निश्चय निशांत जागर का।।

कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

सैनिक

सैनिकों !ओ मेरे देश के वीर सैनिकों ,
नमन तुम्हें, हर देश वासी का ।
खड़े हो तुम चट्टानों से देश के बन प्रहरी।
जलती धूप सहते, जमने वाली सर्दी मे डटे रहते।
भूख प्यास सभी तजते, रात दिन जुटे रहते।
घर से दूर ,परिवार से बिछड़, असमय प्राण तजते ।
पत्थरों का सामना करके भी, देश रक्षा हित चुप रहते।
अपना लहू बहाते ,सब की सहायता में लगे रहते।
तुम्हारी कुर्बानीयों से उन्नत है, भाल देश का ।
औ सैनिकों, मेरे वीर सैनिकों, नमन तुम्हें हम प्रतिपल करते।

             कुसुम कोठारी।

Thursday, 9 April 2020

प्रतीक्षा

प्रतीक्षा

हृदय मरूस्थल मृगतृष्णा सी,
भटके मन की हिरणी।
सूखी नदिया तीर पड़ी ज्यों
ठूंठ काठ की तरणी।।

कब तक राह निहारे किसकी,
सूरज डूबा जाता।
काया झँझर मन झंझावात,
हाथ कभी क्या आता।
अंतर दहकन दिखा न पाए
कृशानु तन की अरणी।।

रेशम धागा उलझ रखा है,
गांठ पड़ी है पक्की।
भँवर याद के चक्कर काटे
जैसे चलती चक्की।
जाने वाले जब लौटेंगे
तभी रुकेगी दरणी।‌।

सुधि वन की मृदु कोंपल कच्ची,
पोध सँभाल रखी है।
सूनी गीली साँझ में पीर ,
एक घनिष्ठ सखी है।।
दिन विहान औ रातें बीती,
वहीं रुकी अवतरणी ।।

कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

Friday, 3 April 2020

'विज्ञात नव गीत माला' द्वारा प्रदत्त उपनाम ' प्रज्ञा ''

"कलम की सुगंध" एंव उसके कई सहायक मंच आदरणीय श्री संजय कौशिक 'विज्ञात' जी के द्वारा स्थापित काव्य मंच है ,जहां नवांकुरों को हिंदी काव्य की अनेक विधाओं को सीखने एवं उनमें लिखने का अवसर मिलता है ।
उन्ही में एक "विज्ञात नवगीत माला" नव गीत सृजन मंच है।
उस मंच पर सृजन काल में, आदरणीय श्री संजय कौशिक 'विज्ञात' जी द्वारा रामनवमी के शुभ अवसर उपनाम देने का अभिनव आयोजन किया गया जिसमें मुझे साहित्यिक उपनाम ' प्रज्ञा 'प्रदान किया गया।
किसी रचनाकार को हिंदी साहित्य के प्रबुद्ध मंच से साहित्यिक उपनाम  प्रदत किया जाना उसे प्रेरणा एवंआत्मविश्वास प्रदान करता है।
इस सम्मान  के लिए मैं आदरणीय संजय कौशिक "विज्ञात "जी को हृदय तल से आभार व्यक्त करती हूं।
उनका प्रोत्साहन एवं दिशानिर्देश सदा यूं ही मिलता रहे। आपके द्वारा दिया गया स्नेह एवं मार्गदर्शन कभी भुलाया नही जा सकता।
पुनः अशेष आभार ।
कुसुम कोठारी "प्रज्ञा"

युद्ध पर जाते सैनिकों के मनों भाव

युद्ध पर जाते सैनिकों के मनोभाव।

आओ साथियों दो घड़ी विश्राम कर लें ,
ठंडा गरम रोटी चावल जो मिले पेट भर लें ।

मंजिल दूर राह प्रस्तर हौसला बुलंद कर लें ,
मां का श्रृंगार न उजड़े ऐसा दृढ़ निश्चय करलें ।

कंधों पर दायित्व बड़े, राह में पर्वत खड़े  ,
देश की रक्षा हित हो प्राण भी देना पड़े ।

मां-बाबा,भगिनी-भ्राता, प्रिया को याद कर लें,
आंगन बिलखते छोड़े,नन्हो को दिल में धर लें।

फिर ये क्षण ना जाने आ पायेंगे क्या जीवन में ,
दुश्मन घात लगाते बैठा सरहद के हर कोने में।

एक-एक सौ को मारेगें शीश रखेगें हाथों में ,
पैरों से चल कर आयें या लिपट कर तिरंगे में।

कुसुम कोठारी।

"पलाश "प्रेम के हरे रहने तक

प्रेम के हरे रहने तक

पलाश का मौसम अब आने को है।
जब खिलने लगे पलाश
संजो लेना आंखों में।
सजा रखना हृदय तल में
फिर सूरज कभी ना डूबने देना।
चाहतों के पलाश को
बस यूं ही खिले-खिले रखना।
हरी रहेगी अरमानों की बगिया
प्रेम के हरे रहने तक।

           कुसुम कोठारी ।

पलाश भी लगे झरने

नैना रे अब ना बरसना

शीत लहरी सी जगत की संवेदना,
आँसू अपने आंखों में ही छुपा रखना ।
नैना रे अब ना बरसना।

शिशिर की धूप भी आती है ओढ़  दुशाला ,   
अपने ही दर्द को लपेटे है यहाँ सारा जमाना।
नैना रे अब ना बरसना।

देखो खिले खिले पलाश भी लगे  झरने,
डालियों को अलविदा कह चले पात सुहाने।
नैना रे अब ना बरसना।

सलज कुसुम ओढ़ तुषार दुकूल प्रफुल्लित ,
प्रकृति के सुसुप्त नैसर्गिक द्रव्य है मुखलित।
नैना रे अब ना बरसना।

जो कल न कर सका उस से न हो अधीर ,
है जो आज उसे कर इष्ट मुक्ता सम स्वीकार ।
नैना रे अब ना बरसना ।

              कुसुम कोठारी।