मन की वीणा - कुसुम कोठारी।

Friday, 29 October 2021

मन: स्थिति

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 ग़ज़ल (गीतिका) २१२२×४ मन: स्थिति आज जीने के लिये लो चेल कितने ही सिए हैं। मान कर सुरभोग विष के घूँट कितनों ने पिए हैं।। दाग अपने सब छुपाते ...
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Monday, 25 October 2021

पीड़ा कैसे लिखूँ

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 पीड़ा कैसे लिखूँ पीड़ा कैसे लिखूँ दृग से बह जाती है, समझे कोई न मगर कुछ तो ये कह जाती है, तो फिर हास लिखूँ, परिहास लिखूँ, नहीं कैसे जलते उप...
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Friday, 22 October 2021

'कह मुकरी छंद' कुसुम की 108 मुकरियों की माला।

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  1)श्याम वर्ण वो मन को भाये चले फिरे वो मुझे लुभाये शोभा उसकी मोहे तन-मन  हे सखि साजन? ना सखि वो घन।। 2)कद का छोटा वेश छबीला बातों में भी ह...
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Thursday, 21 October 2021

कह बतियाँ

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कह बतियाँ चल सखी ले घट पनघट चलें  राह कठिन बातों में निकले। अपने मन की कह दूँ कुछ तो कुछ सुनलूँ तुमसे भी घर की साजन जब से परदेश गये परछाई सी...
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Monday, 18 October 2021

कह मुकरी ...... सहेलियों की पहेलियां ..... कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

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                                               शीश चढ़ा कर उसको रखती                      बड़े प्यार से ...
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Saturday, 16 October 2021

कह मुकरी छंद

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 कह मुकरी 1)शीश चढ़ा कर उसको रखती बड़े प्यार से उस सँग रहती खरा कभी लगता वो खोटा क्या सखि साजन? ना सखि गोटा।। 2)पेट दिखाता इतना मोटा पर समझो...
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Wednesday, 13 October 2021

कवि और सृजन

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 कवि और सृजन जब मधुर आह्लाद से भर कोकिला के गीत चहके शुष्क वन के अंत पट पर रक्त किंशुक लक्ष दहके। कल्पना की ड़ोर थामें कवि हवा में चित्र भरत...
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