मन की वीणा - कुसुम कोठारी।

Sunday, 31 May 2020

तपिश

›
तपिश सूरज की बेशुमार झुलसी धरती मुरझाई लताऐं सुलगा अंबर, परिंदों को ठौर नही प्यासी नदियाँ कृषकाय झरने तृषित  घास पानी की आस, सून...
5 comments:
Friday, 29 May 2020

शमा और शलभ

›
शमा और शलभ आवाज दी शमा ने सुन शलभ तूं क्यों नाहक जलता है। मेरी तो नियति ही जलना , तूं क्यों मुझसे लिपटता है  ।           शलभ बोला ...
5 comments:

सिसकती मानवता

›
तीन क्षणिकाएँ सिसकती मानवता सिसकती मानवता कराह रही है , हर ओर फैली धुंध कैसी है, बैठे हैं एक ज्वालामुखी पर सब सहमें से डरे-डरे, ब...
7 comments:
Thursday, 28 May 2020

एकलव्य की मनोव्यथा

›
एकलव्य की मनो व्यथा > तुम मेरे द्रोणाचार्य थे, मैं तुम्हारा एकलव्य ‌ मैं तो मौन गुप्त साधना में था , तुम्हें कुछ पता भी न था । फ...
21 comments:
Tuesday, 26 May 2020

लहकी नागफणी

›
लहकी नागफणी महक उठे है मधुबन जैसे पात हृदय के जो लूखे। अक्षि पार्श्व दर्शन जो होते पतझड़ खिल जाते रूखे। व्याकुल होकर मोर नाचता आस...
20 comments:
Sunday, 24 May 2020

विधु का सागर स्नान

›
विधु का सागर स्नान वायु वेग में विचलित विचि क्षीरनिधि को भा रही है। तरंग मोहित हो शशि पर तट कुलांचे खा रही है। रूप यूं निखरा निशा ...
18 comments:
Saturday, 23 May 2020

मेहनतकश

›
मेहनतकश मेहनतकश आज भर की जुगाड़ नही कर पाता कल की क्या सोचे भुखा बिलखता बचपन पेट भी नही भर पाता पढने की क्या सोचे, कैसी विडम्बना ह...
16 comments:
‹
›
Home
View web version

About Me

मन की वीणा
View my complete profile
Powered by Blogger.