मन की वीणा - कुसुम कोठारी।
Monday, 30 April 2018
श्रम ही जीवन है
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तीन क्षणिकाएं। 1 कीचड़ से बीन कमल हम लाते हैं पंक मे रह के भी पंकज से मुस्कुरातये हैं ।। 2 ओ नाव के अकेले मुसाफिर तूं क्यों है फ...
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अस्तित्व
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अस्तित्व और अस्मिता बचाने की लडाई खूब लडो जुझारू हो कर लड़ो पर रुको सोचो ये सिर्फ अस्तित्व की लड़ाई है या चूकते जा रहे संस्कारों की प्र...
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Tuesday, 24 April 2018
कोई कब तक सुनेगा
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रो रो के सुनाते रहोगे दास्ताने गम भला कोई कब तक सुनेगा देते रहोगे दुहाई उजडी जिंदगी की भला कोई कब तक सुनेगा आशियाना तुम्ह...
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Sunday, 22 April 2018
कदम रुकने न पाए
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कदम जब रुकने लगे तो मन की बस आवाज सुन गर तुझे बनाया विधाता ने श्रेष्ठ कृति संसार मे तो कुछ सृजन करने होंगें तुझ को विश्व उत्थान मे,...
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Friday, 20 April 2018
दूर कदमों के निशाँ
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राहें ना कारवाँ है दूर मंजिल के निशाँ है। ना जाने कैसे होगा जाना पर इन कदमों को है मंजिल पाना, साथ हौसला है बस न जाने कहां होगा रा...
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Thursday, 19 April 2018
सूरज का विश्राम
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अपनी तपन से तपा अपनी गति से थका लेने विश्राम ,शीतलता देखो भास्कर उतरा सिन्धु प्रांगन मे करने आलोल किलोल , सारी सुनहरी छटा समेटे नि...
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Monday, 16 April 2018
मेरा डर
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आजकल डर के कारण सांसे कुछ कम ले रही हूं अगली पीढ़ी के लिये कुछ प्राण वायु छोड़ जाऊं, डरती हूं क्या रहेगा उनके हिस्से बिमार वातावरण...
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