Wednesday, 10 June 2020

चांद का गम

चाँद रोया  रातभर
शबनमी अश्क बहाए,
फूलों का दिल चाक हुवा
खुल के खिल न पाए।।

छुपाते रहे उन अश्को को
अपनी ही पंखुरियों तले ,
धूप ने फिर साजिश रची
उन को  समेटा उठा हौले‌ ।।

फिर अभिमान से इतराई बोली
यूं ही दम तोडता थककर दर्द।
और छुप जाता न जाने कहां
जाकर हौले हौले किसी गर्द।।

        कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

10 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर रचना ...
    चाँद का दर्द ... कवि की कल्पना का वोस्तार ...

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  2. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार
    (12-06-2020) को
    "सँभल सँभल के’ बहुत पाँव धर रहा हूँ मैं" (चर्चा अंक-3730)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

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  3. छुपाते रहे उन अश्को को
    अपनी ही पंखुरियों तले ,
    धूप ने फिर साजिश रची
    उन को समेटा उठा हौले‌ ।।
    खूबसूरत कविता ,आपका तहे दिल से शुक्रियां प्यारी सी टिप्पणी के लिए ,आपकी टिप्पणी चेहरे पर हंसी बिखेर गई,बहुत खूब कहा ,

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  4. नाज़ुक खूबसूरत भावों से सजी सुंदर अभिव्यक्ति अपना मर्म तलाशती हुई.

    चाँद रोया रातभर
    शबनमी अश्क बहाए,
    फूलों का दिल चाक हुवा
    खुल के खिल न पाए।।..वाह !

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  5. ग़म चाँद का कोई समझ न पाता
    चटख चाँदनी से भ्रमित रात मुस्कुराता
    खिलखिलाते तारों के बीच तन्हा चाँद
    मौन सिसकता किसे अपनी व्यथा सुनता
    -----
    प्रकृति पर आपकी लिखी आपकी रचनाएँ सदैव अति सुंदर होती है दी।
    अप्रतिम रचना।

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  6. बहुत सुंदर रचना सखी

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  7. नये बिम्बों के साथ, बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति।

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  8. सुन्दर कविता कोमल भाव ..

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  9. ओह ये रचना कपड़ने से कैसे चूक गयी मैं , आज अचनाक ही नज़र गयी सिडेबार में , चाँद का गम , तो ख्याल आया ये तो नहीं पढ़ी
    चाँद की ही तरह सुंदर रचना

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